ओला डायरी # 1

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सुबह के ठीक साढ़े आठ बज रहे हैं। मैसूरू जानेवाली 11 बजे की शताब्दी एक्सप्रेस लेने के लिए हमने सुबह थोड़ा जल्दी ही निकलने का फ़ैसला किया है। बंगलुरू के ट्रैफ़िक और बसों की हड़ताल का असर सड़कों पर दिखने का अंदेशा है। ओला वालों को उनके एप पर जे.पी. नगर आने का संदेश दे दिया है। मकान से बाहर निकलते देखा कि बाहर ओला टैक्सी हमारा इंतज़ार कर रही है। गाड़ी कोई ख़ास बड़ी नहीं है – इंडिका – वी 2 है।  बहन टैक्सी वाले से कन्नड़ में कुछ कहती है। शायद यह कि हमें कहाँ जाना है, और ट्रेन का समय वग़ैरह। हम लोग टैक्सी में बैठते। बच्चे अपनी माँ के साथ पीछे बैठे हैं और मैं ड्राइवर के साथवाली सीट पर। ड्राइवर मुझसे हिन्दी में पूछता है – आपको मैजिस्टिक जाना है सर? मैंने कहा – जी हाँ – वहीं बैंगलोर सिटी रेलवे स्टेशन। मैसूरु जानेवाली शताब्दी पकड़नी है।

कुछ दूर आगे बढ़ते ही बड़े अपार्टमेन्ट कॉमप्लेक्सों के अहाते से बाहर की दुनिया दिखाई दे रही। लोग चाय-नाश्ते की दुकानों पर खड़े हैं। आज रविवार है ऐसा लग नहीं रहा, सड़क पर काफ़ी भीड़ है। सड़कों के किनारे कचरा फैल रहा है। खाली पड़ी ज़मीन पर लोगों ने कचरे का अंबार लगा दिया है। मैं मन ही मन सोचता हूँ – भारत की तथाकथित सिलिकॉन वैली बैंगलोर में भी वही हाल है कचरे का – स्वच्छ भारत अभियान गया तेल लेने। पत्नी को कहता हूँ – look,  that is the main difference between ‘’here’’ and ‘’there’’.

मैं खिड़की से बाहर देख ही रहा हूँ कि अचानक मेरे कानों में कुछ अलग-सा सुनाई देता है – “तुमी कि कोरी आसे। मोइ ना जानू….

देखा तो ड्राइवर महोदय अपने इयरफ़ोन के द्वारा किसी से से फ़ोन पर बात कर रहे हैं। कुछ देर मैं बातचीत ख़त्म हो जाती है।

मैं पूछता हूँ – भैया आप आसाम से हैं?

ओला ड्राइवर – जी, आपको कैसे मालूम?

मैं कहता हूँ – भाल आसु भाईटी? आजिर बोतोर भाल आसे। हा हा हा, (हँसते हुए) आप फ़ोन पर अहोमिया में बात कर रहे थे न, इसलिए। और यहाँ डैशबोर्ड आपकी आईडी पर भी लिखा है – राज बोड़ो। आप बोड़ोलैंड से हैं। कोकराझार?

ओला ड्राइवर – आप अहोमिया समझते हैं? आपको तो आसाम के बारे में बहुत कुछ मालूम है सर। आप वहाँ गए हैं? मेरा घर कोकराझार के पास है ही है। मेरे मदर-फ़ादर और भाई लोग वहीं रहते हैं।

मैं कहता हूँ – हाँ दो-तीन बार गया हूँ – नोर्थ-ईस्ट के मेरे कई दोस्त रहे हैं। जब दिल्ली में पढ़ता था तब। शिलांग भी आना जाना लगा रहता है। मैं दो बार नागालैंड भी गया हूँ। आप यहाँ बैंगलोर कैसे आए?

ओला ड्राइवर – मेरी बड़ी बहन यहाँ रहती है। उसके पास 7 साल पहले यहाँ आया था। फिर कुछ दिन बाद गाड़ी चलाना सीख लिया। और अब अपनी गाड़ी ले ली। ये गाड़ी अपनी है। दो साल पहले ख़रीदी है। यहाँ नोर्थ ईस्ट के बहुत लोग रहते हैं। ड्राइविंग लाइन में बहुत कम हैं। बोड़ो में मैं शायद अकेला हूँ। मणिपुर के लोग होटेलिंग में बहुत काम करते हैं। ड्राइविंग में लोकल और तमिल ज़्यादा हैं।

मैं: बहुत बढ़िया, अच्छा काम किया। आप गाड़ी सिर्फ़ ओला के लिए चलाते हैं?

ओला ड्राइवर: नहीं नहीं – ओला का काम मैं सिर्फ़ सुबह या रात को लेता हूँ। बाक़ी टाइम में बी.एस.एन.एल के लिए काम करता हूँ। 11 बजे से काम शुरू होता है। मेरा ऑफ़िस मैंजिस्टिक के पास ही है, इसलिए ओला से आपकी भी सवारी ले ली।

मैं: आप बी.एस.एन.एल के दफ़्तर में काम करते हैं? क्या काम करते हैं?

ओला ड्राइवर: नहीं गाड़ी ही चलाता हूँ। बी.एस.एन.एल. को ये गाड़ी लीज़ पर दी है। हर दिन उनके इंजीनियर को लेकर जाना होता है।

मैं: अच्छा यह बहुत बढ़िया है। काफ़ी पैसे मिलते होंगे। इंजीनियर लोग कहाँ जाते हैं?

ओला ड्राइवर: यही टावर –बावर को देखने जाते हैं। कोई प्रोब्लेम होने से जाते हैं। एक दिन एक टावर तो देखते ही हैं। एक महीना का बीस हज़ार देते हैं। गाड़ी और डीज़ल मेरे अपने हैं। ओला और बी.एस.एन.एल जोड़कर एक महीने में 30-32 कमा लेता हूँ।

मैं: यह बहुत अच्छी बात है। आप यंग हैं और बहुत मेहनती हैं। और आप हिन्दी भी बहुत अच्छी बोलते हैं।

ओला ड्राइवर: बी.एस.एन.एल का काम मेरा तीन बजे तक ख़त्म हो जाता है। इंजीनियर लोग एक दिन में एक ही कंप्लेन देखते हैं। वहाँ से आने के बाद छुट्टी। चार बजे तक मैं घर वापिस आ जाता हूँ।

मैं: बहुत लंबा जाना पड़ता होगा आपको? इसमें तो बहुत डीज़ल जाएगा।

ओला ड्राइवर: नहीं बहुत लंबा नहीं। हर ऑफ़िस का अपना सर्किल है। उसी में जाना होता है। वैसे बंगलोर बहुत बड़ा शहर है। लंबा जाने से मुश्किल हो जाएगी।

मैं: अच्छा-अच्छा यह ठीक है। आप कन्नड़ बोल लेते हैं? मैंने सुना आप कन्नड़ बोल रहे थे?

ओला ड्राइवर: जी बोलता हूँ। यहाँ काम करने के लिए लैंग्वेज सीखना ज़रूरी है।

मैं: कन्नड़ कहाँ सीखी आपने?

ओला ड्राइवर: वो पहले जो मेरा मकान मालिक था ना, उन लोगों ने सिखाया मुझे। उसकी फ़ैमिली में सब लोग सिर्फ़ कन्नड़ और तेलुगु ही बोलते-समझते थे। इसलिए बोल-बोल के सीख गया। दो साल तक मेरे मकान मालिक ने मुझसे सिर्फ़ कन्नड़ में बात किया, फिर मैं सीख गया। अब बोल लेता हूँ।

मैं: यह तो कमाल की बात है। बहुत अच्छा। अभी कुछ साल पहले यहाँ लफ़ड़ा हुआ था ना, सब नोर्थ ईस्ट वालों को बैंगलोर से भागना पड़ा था। कुछ ख़ून-खराबा हुआ था। मुझे साल याद नहीं है।

ओला ड्राइवर: ये केस अगस्त 2012  का है सर। सब लोगों को यहाँ से भागना पड़ा था। लेकिन मैं नहीं गया। मेरा पुलिस में एक लोकल दोस्त है। उसने मुझे अपना नंबर देकर कहा कि कोई प्रोब्लेम होने पर फ़ोन करना। मैं वापस नहीं गया लेकिन बहुत सारे लोग भाग गए थे। सबके फ़ोन पर मैसेज आया था कि यहाँ रहने वाले नौर्थ ईस्ट के लोगों को मारना है। रेलवे ने स्पेशल ट्रेन भी चलवाई थी। कुछ मारपीट हुई थी लेकिन ज़्यादा लोग डर गए थे।

मैं: कौन मारना चाहता था?

ओला ड्राइवर : यहाँ के कुछ लोकल मोहम्मडन लोग। वहाँ आसाम में कोकराझार में दंगा हुआ। उसी का बदला यहाँ लेने का बात कर रहे थे। लेकिन ज़्यादा कुछ नहीं हुआ। यहाँ के लोकल कन्नडिगा और पुलिस ने बहुत कंट्रोल किया।  

मैं: चलिए अच्छी बात है। आप सब लोग सेफ़ है यहाँ पर।

ओला ड्राइवर: आप यहाँ घूमने आए हैं सर? कहाँ रहते हैं?

मैं: मेरी बहन यहाँ रहती है। हमलोग उसी से मिलने आए हैं। फ़िलहाल फ़ौरेन में रहते हैं।

ओला ड्राइवर : लीजिए आपका मैजिस्टिक आ गया।

मैं: कितने पैसे हुए? थैंक यू।

 

 

 

 

 

Survival Phrases in Khasi: Walking in the Abode of Clouds

 

Written  by A. Avtans

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In the North-Eastern part of India, there is the state of Meghalaya (in Sanskrit meaning the abode of clouds). Meghalaya is home to primarily three indigenous communities namely Khasi, Garo and Jayantia (Pnar) who are united by their mutual belief in matrilineal lineage i.e the women inherits all the family property . In 1972 Meghalaya state was formed by merging Garo Hills , Khasi Hills and Jayantia Hills. Shillong is the capital city of the Meghalaya state. Because of its famous rolling hills, it is often called as “Scotland of the East”. Since it was the capital of undivided Assam for long during British times, Shillong has developed into a popular hill station and a cosmopolitan city. Apart from being the seat of several governmental and educational institutions, Shillong has a bracing climate throughout the year.

Khasi is an Austro-Asiatic language of the Mon-Khmer branch and is spoken primarily in Meghalaya by the Khasi people. It is the lingua franca in Shillong and the surrounding areas of Khasi and Jayantia hills. According to 2001 Indian census, it is spoken by more than 1,128,575 speakers. It is also spoken in some parts of Bangladesh and neighboring districts of Assam state of India. There are mainly five varieties of Khasi language viz ‘Standard Khasi’ (which is based on a variety called Khynriem spoken in Cherapunji/Sohra area) ‘Langrin’, ‘Lyngngam’, ‘Bhoi’ and ‘Nongtung’.

Khasi is nowadays written in Latin script which was introduced by Welsh missionary Rev. Thomas Jones.  It is used in schools, markets, homes and as a medium of instruction/lecture in the universities. Higher education is also available in Khasi in North-Eastern Hill University, Shillong. Since the official language of the state is English and there is a growing tendency to learn and speak English in the state, Khasi is slowly loosing ground in the area of education.
Some of the survival phrases which might come handy for anyone visiting Shillong (The Rock Capital of India) or any other part of Meghalaya, is presented below. I have been helped in compiling these phrases by a friend Ms Ianosha Majaw who is a native Khasi speaker and lives now in Shillong. Thanks to all !

English Khasi Hindi
Hello kumno Namaskaar
How are you? Phi long kumno? Aap kaise hain?
I am fine Nga biang Main thiik hun
Thank you khublei  
What is your name? Kaei ka kyrteng jong ph Aapkaa naam kyaa hai?
My name is Mary Nga kyrteng ka Mary Mera naam Mary hai
My name is John Nga kyrteng U John Mera naam John  hai
What is …………? Haei ka/u ………..? Yah kyaa hai?
What is the price of this? Katno (ka dor jong une/kane) Iskaa daam kya hai?
I do not want it Ngam kwah kane Yah Mujhe nahi chahiye
I want this Nga kwah kane Yah Mujhe chahiye
Yes Hooid Haan
No em No
How much money will you take Katno pisa phin shim Aap kitne paise lenge?
Who is she/he? Uei / Kaei
Utei/Katei
Vah kaun hai?
I am from London Nga dei na London Main London se hun
I live in Police Bazar Nga sah ha Police Bazar Main Police bazaar mein rahta (m)/rahti (f) hun
What is there to eat Madam? Don aiu ban bam Kong? Khane mein kya hai madam?
See you tomorrow Sa lakynduh lashai Kal milte hain
I am leaving now Ngan leit noh shwa Ab main chaltaa (m)/chalti (f) hun
What is the time now? Katno baje mynta? Abhi samay kyaa ho raha hai?
Please Sngewbha Kripa kar ke
Sorry Sngewbha Maaf kijiye
How much is this? Katno kane? Yah Kitna hai?
Where shano Kahan
Where are you going? Shano phin leit? Aap kahan jaa rahe hain?
I am going to Cinema Ngan leit sha Cinema Main cinema jaa rahaa hun
When are you going? Lano phin leit? Aap kab jaa rahe hain?
Sir/ Mister Bah Sar/ ji
How are you Mr. Peter Kumno phi long Bah Peter? Aap kaise hain Peter ji
Miss/Madam Kong Madam/ ji
How are you Miss Mary? Kumno phi long Kong Mary? Aap kaisi hain Mary ji
Thanks a lot / bye Khublei shibun Bahut shukriya/ bye

 

Angami: the Language of the Enchanting Hills


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Written  by A. Avtans
[This article is copyrighted, please mention author’s name  and article’s name when you are copying/referring content from this page]

Angami (known as Angami Naga in linguistics fraternity) is a language spoken by around 132,225 people (2001 Census) primarily in the enchanting Naga Hills of Kohima district of Nagaland state of India. Angami belongs to the Angami-pochuri sub-branch of Tibeto-Burman family of languages. Though Angami has several varieties, principal varieties are Kohima, Khonoma and Chokri (though it has acquired an independent status over time). Kohima variety is the standard language (popularly known as common language among Angamis) which is used in published religious and academic texts. This common language is known as Tenyidie in Angami.

Earliest writings on Angami language dates back to the days of British in India. Captain J. Butter published his ‘Rough notes on the Angami Nagas and their Language’ in the Journal of the Asiatic Society of Bengal (Vol.44 Part 1) in 1875. Later R.B. McCabe wrote his ‘Outline Grammar of the Angami Naga Language’ in the year 1887 basing his analysis on Khonoma, Mozema and Jotsoma varieties. Some other works includes the likes of Rivenburg (1905), Grierson (1903), Supplee (1930), Haralu (1933) and several significant works by American Baptist Foreign Missionary Society in the early 20th century.

R. Sekhose, probably the first native Angami to write on the language, says –

‘Angami language is a very peculiar language. A word may mean many different things, which can only be distinguished by High and low tones’ (Angami Dictionary with English Equivalent words, 1984). Sekhose has also published significant works such as Angami Idiomatic Expressions (1967) and Angami Naga Folklore (1970).

Angami is written using Roman script together with the conventions adopted by the Angami Language Committee in the year 1939. Tone is not marked in the orthography of Angami.

A brief summary of the linguistic research done on Angami can be cited as follows (in chronological order):

·

Capt. J Butler: Rough notes on the Angami Nagas and their language, Journal of the Asiatic Society of Bengal, Vol. 44 Part 1, 1875.

R.B. McCabe: Outline Grammar of the Angami Naga Language (with vocabulary and illustrative sentences), Calcutta, 1887.

S.W. Rivenburg: Phrases in English and Angami Naga, Kohima, 1905.

George Abraham Grierson: Linguistic Survey of India, Vol.3 Part 2, Calcutta, 1903.

J.E.T.: A Primer of Angami Naga, Kohima, 1915

J.H. Hutton: The Angami Nagas, London, 1921.

Angami Leshü Keriau, American Baptist Foreign Missionary Society, Kohima, 1923.

G.W. Supplee: Kephrüda Keriau – First Reader in Angami Naga, Kohima, 1930.

Hisale Pienünuo: The First Gate into Angami and English, Kohima, 1931.

Haralu: Angami-English Dictionary Part 1, Journal of the Asiatic Society of Bengal, Vol.29, 1933.

Robin Burlings: Angami Naga Phonemics and Word List, Indian Linguistics, Vol. 21, 1960.

G.E. Marrison: The Classification of the Naga Languages of North-East India, Vols 1 & 2, London, 1967.

R. Sekhose Angami: Angami Idiomatic Expressions, Kohima, 1967

R. Sekhose Angami: Angami Naga Folklore, Kohima, 1970

Angami Vyakaran (in Hindi), Nagaland Bhasha Parishad, Kohima, 1970

R. Sekhose Angami: Angami Naga Word Divisions and Spelling, Kohima, 1973

N. Ravindran: Angami Phonetic Reader, CIIL, Mysore, 1974.

R. Sekhose Angami: Angami Dictionary with English Equivalent words, Kohima, 1984.

P.P. Giridhar: Angami Grammar, CIIL, Mysore, 1980.

P.P. Giridhar: Angami-English Dictionary, CIIL, Mysore, 1987.

Ram Kripal Kumar: Hindi-Angami Dwibhashi Kosh (in Hindi), CIH, Agra, 2006.

Angami is not only spoken and understood by Angami people but also by Chakhesang, Zeliang, Pochuri and Rengama people who live in Kohima district. Today Angami Naga is offered as a subject in Nagaland University, Kohima up to the level of Ph.D. Ura Academy is the institution established for the development and propagation of Angami language and is situated in Kohima, Nagaland.

Angami Alphabet Chart:

Angami Alphabet

Phonemic Value

Angami Alphabet

Phonemic Value

Angami Alphabet

Phonemic Value

Angami Alphabet

Phonemic Value

Angami Alphabet

Phonemic Value

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Angami is a sweet language to ears (even though I cannot understand much of it). Especially all the the “Uu”(Exclamation when you see an acquaintance) and ” Hoe” (Yes) expressions. Still you will not regret learning bits and pieces of this quite beautiful and fascinating language of equally endowed and very warm hearted people who live in Naga Hills.

To be continued (I am trying to learn more).

Photo Courtsy: http://www.flickr.com/photos/dagmaraka/

Killing in the name of*……

 

We live in the world of seamless insecurities where life is not a very precious commodity. Though we all believe sincerely in our religions (whether we are Hindu, Christians, Muslims or practice any other form of belief), but we have forgotten the pristine values of life, love and humanity. We fight among ourselves on anything related to our human existence viz language, culture or community. When the Hindu lunatics burned people in Gujarat in 2002, not many of us were shedding tears for the deceased. Then when a terrible earthquake struck Gujarat in which scores of people died, I heard a rickshaw puller in old Delhi saying it was God’s punishment for the carnage happened before.

Some kill for money and some kill in the name of religion, caste, tribe, community or language. In North East of India people are killed for some different reasons too. When the Manipuri insurgents or criminal elements (locally called underground) kill some innocent and poor Hindi speaking people, they have two fold reasons in their minds. Firstly, for creating a sense of fear among the migrant community and people living outside the state. And secondly to create a niche for themselves in the eyes of other such groups and local people. This helps them evolve a false situation of disturbance which in turn tends to fuel insecurity among all and sundry resulting in more extortion. What is surprising is the despite all the calls for stopping the violence, violence is still perpetuating in some parts of North-East India .

In Nagaland’s economic capital Dimapur, when somebody is shot dead in a crowded market, no body runs after the killers to nab them. Everybody pretends as if nothing has happened. Police never investigates the case.Thanks to Indian government stage managed ceasefire, even the security forces stationed there, turn a blind eye to the killings. The parallel federal government of Nagaland (FGN) established by the Naga freedom fighters, has also not evolved any criminal justice system like the Indian Maoist where they hold people’s court and then arrive at any conclusion. It seems that the FGN does not believe in any of the legal systems evolved so far in the world. Their declared ideology of Liberation Theology has not stopped them in indulging in barbaric acts of violence on the streets and shops. When the Indian security forces in 1955-56 burned 645 Naga villages out of the existing 861 villages in Nagaland, the genocide was as atrocious as the guerilla violence perpetuated by the both the underground and the overground elements today.This continued cycle of violence has resulted in ghettoization of the populace even in growing modern cities like Dimapur and Kohima where one can easily identify specific tribe dominated areas. Even after many years this mistrust and misunderstanding among the Nagas, despite sharing the same God, has not withered away. In moments of crisis, these inter-tribal differences become more prominent leading to migration and abandonment of entire localities. The church despite all its sincere efforts has not been able to quell this miserable situation. Recent spurt in fratricidal killings in Nagaland is sure sign of this failure. Nagas are not killing the enemy they are supposedly fighting but their own neighbors and brothers. There is no doubt that in the root of the problem is the insatiable hunger of money and power.The fight among the various factions (NSCN-IM, NSCN-K, GPRN-Unification and others) for a total control over the pie of taxed money and unquestionable dominance over the society, has given rise to lagging growth of Nagaland in all sectors. Nagas of all corners have to realize that when the rest of India is growing at the rate of 9 %, Nagaland is busy making coffins for their own people. They are killing in the name of nobody. Violence can never bring prosperity to any nation or people. Of course India’s democracy is flawed but violence is no answer to it. We all can live with love and peace together. World is a beautiful place.

Post title* courtesy RAGE AGAINST THE MACHINE.