Temple of the Sun

About this massive monument, the great poet Rabindranath Tagore said –  “here the language of stone surpasses the language of man”. Situated at the eastern coast of India, the Konark Sun Temple was built by King Narsimhadeva I of Ganga dynasty in the 13th century. It was designed in the form of a gorgeously decorated chariot of Sun god mounted on 24 wheels , each about 10 feet in diameter, and drawn by 7 mighty horses. Sun temple of Konark is a masterpiece of Orissa’s medieval architecture. It is a UNESCO world hertiage monument.

Trivia

  • The Konark temple is also known for its erotic sculptures of maithunas.
  • In one of the panels at the temple, there is a depiction of giraffe being gifted by West Asian traders to the king of Odisha. It shows Odisha’s long history of trade with Africa and Arabia. Some other experts believe that this animal is Okapi or Dromedary (Arabian camel). 
  • In another panel, there is lady wearing Japanese style sandals (Geta Sandals), proving the maritime relation of Odisha with east & south-east Asia.
  • At present it is located two kilometers from the sea, but originally the ocean came almost up to its base. Until fairly recent times, the temple was close enough to the shore to be used as a navigational point by European sailors, who referred to it as the ‘Black Pagoda’.

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Temple is open for public from sunrise to sunset

Entrance Fees are as follows:

Citizens of India and visitors of SAARC (Bangladesh, Nepal, Bhutan, Sri Lanka, Pakistan, Maldives and Afghanistan) and BIMSTEC Countries (Bangladesh, Nepal, Bhutan, Sri Lanka, Thailand and Myanmar) – INR. 30 per head.

Citizen of other countries: US $ 5 or INR. 500/- per head

(children up to 15 years enter free)

How to reach?

Konark is connected by good all weather motorable roads. Regular Bus services are operating from Puri and Bhubaneswar. Besides Public transport Private tourist bus services and taxis are also available from Puri and Bhubaneswar.

 

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ताजदार-ए-हरम

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भारत और पाकिस्तान के बहुत सारे लोगों के दिलों में अगर कोई क़व्वाली बहुत ख़ास जगह रखती है, तो वह ताजदार-ए-हरम  है। ताज़दार-ए-हरम को लिखने वाले थे जनाब ‘पुरनम इलाहाबादी’ (उर्फ़ ‘मुहम्मद मूसा’) और इसे पहली बार पाकिस्तान के मशहूर कव्वाली गायक ‘साबरी भाइयों‘ ने 1990 में गाया था।  काफ़ी अरसे पहले मैंने इस क़व्वाली को पहली बार हमारे पारिवारिक दर्ज़ी अब्दुल चाचा की दुकान पर सुना था। 2015 में कोक स्टूडियो के सीज़न 8 में इसे बड़ी शिद्दत से  आतिफ़ असलम ने फिर से गाया है। ताजदार-ए-हरम  एक नातिया कलाम है जिसमें भरपूर आस्था और मुहब्बत के साथ परमेश्वर को याद किया गया है। एक बेहतरीन इस्लामी भक्ति गीत। लेखक बार-बार यही कह रहा है कि हे परमेश्वर अपनी दया दृष्टि मुझ पर डालिए, आपके दरवाज़े से कोई ख़ाली नहीं जाता।

पवित्र शहर मदीना (सऊदी अरब) के लिए लेखक की भक्ति आत्मसात कर देने वाली है (क्या कहेगा जहाँ, आपके दर से अगर ख़ाली जाएँगे?) 

यह कहना लाज़िमी होगा कि यह कलाम भारत-पाकिस्तान की साझी संस्कृति की एक अमूल्य विरासत है।

इस नातिया कलाम के शुरूवाती बोल हैं – 

 

क़िस्मत में मेरी चैन से जीना लिख दे 
डूबे ना कभी मेरा सफ़ीना लिख दे 
जन्नत भी गवारा है मगर मेरे लिए

ए क़ातिब-ए-तक़दीर मदीना लिख दे 
ताजदार-ए-हरम हो निगाह-ए-करम 
हम ग़रीबों के दिन भी सँवर जायेंगे 
हामीं-ए बेकसाँ क्या कहेगा जहाँ
आपके दर से ख़ाली अगर जायेंगे

ताजदार-ए-हरम, ताजदार-ए-हरम

कोई अपना नहीं ग़म के मारे हैं हम

आपके दर पर फ़रयाद लाये हैं
हो निगाहे-ए-करम, वरना चौखट पे

हम आपका नाम ले-ले मर जाएँगे।

ताजदार-ए-हरम, ताजदार-ए-हरम

 

Romanized with English translation

Kismat me meri chain se jeena likhde
Let a life of peace and contentment be my fate

Doobe nah kabhi mera safeenah likh de
May my ship never sink even in troubled waters – let this be my fate

Jannat bhi gawarah hai magar mere liye
It’s not that heaven would not be acceptable to me, but

Ae kaatib-e taqdeer madina likh de
O write of destiny, let Madina (City to which Prophet Mohammad came from Mecca, PBUH) be my fate

Tajdar-e-haram, ho nigaah-e-karam
O king of the holy sanctuary, bless us with your merciful gaze

Hum ghareebon ke din bhi sanwarjayenge
So that our days of woe may turn for the better

Haami-e-be-kasaan kya kahega jahan
O patron of the poor, what would the world say

Aapke darr se khaali agar jayenge
If we return empty-handed from your door?

Tajdar-e-haram Tajdar-e-haram
O king of the holy sanctuary

Koi apna nahi gham ke maaray hain hum
We have no one to call our own, we are stricken with greif

Aapke darr pe faryaad laaye hain hum
We come and cry for justice at your door

Ho Nigah-e-karam, warna chokhat pe hum
Please spare us a merciful glance, or we will

Aapka naam le le ke marjayenge
Die at your threshold, crying your name

Tajdar-e-haram Tajdar-e-haram
O king of the holy sanctuary

आतिफ़ असलम की आवाज़ में

 

साबरी भाईयों की आवाज़ में

भारतीय प्रोफ़ेसर ने क्रोएशिया को भारतीय संस्कृति का पाठ पढ़वाया

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Imageमध्य युरोप और भूमध्य सागर के बीचो-बीच बसा देश क्रोएशिया अपने लंबे समुद्र तटों के लिए विश्व प्रसिद्ध है। गले में पहनी जाने वाली टाई और हवा में तैरने वाले पैराशूट के आविष्कारक देश क्रोएशिया में 1000 से ज़्यादा द्वीप हैं जिनमें केवल 50 में ही लोग रहते हैं और इसलिए यह देश युरोपीय पर्यटकों के बीच ख़ासा लोकप्रिय है । क्रोएशिया की राजधानी ज़गरेब है जो पश्चिमी और पूर्वी युरोपीय स्थापत्य और वास्तुकला के अनोखे समिश्रण का एक बेजोड़ नमूना है। यहाँ की मुद्रा ’कुना’ है जो लगभग 11 भारतीय रुपयों के बराबर है। यहाँ के लोग ख़रवास्की भाषा बोलते हैं।  क्रोएशिया जुलाई 2013 से युरोपीय संघ का सद्स्य राष्ट्र भी है। वर्ष 2009 से क्रोएशिया के ज़गरेब विश्वविद्यालय के भारतविद्या विभाग (Indology Department) में भारत सरकार एवं क्रोएशिया सरकार के सहयोग से हिन्दी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति के पठन-पाठन के लिए भारतीय विद्वान आचार्यों को प्रतिनियुक्त किया जा रहा है।

वर्तमान में ज़गरेब विश्वविद्यालय के भारतविद्या विभाग में विज़िटिंग प्रोफ़ेसर और हिन्दी शिक्षण और भाषा विज्ञान के लब्धप्रतिष्ठ आचार्य प्रो. भरत सिंह (केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा) ने पिछले महीने  13 दिसंबर 2013 को क्रोएशिया वासियों को भारतीयता और भारतीय संस्कृति से रूबरू करवाया। अवसर था अमेरिका के हारवर्ड विश्वविद्यालय की प्रोफ़ेसर डायना एल. एक की पुस्तक ‘India: a Sacred Geography’ के ख़रवास्की (क्रोएशियन) अनुवाद Indija Sveta Geographija के भव्य लोकार्पण का। पुस्तक का लोकार्पण समारोह  पुस्तक प्रकाशक डबल रेनबो प्रकाशन द्वारा विश्वविद्यालय के विशाल सभागार में आयोजित किया गया था। समारोह में बीज वक्तव्य प्रो भरत सिंह द्वारा ’भारतीय संस्कृति’ विषय पर दिया गया। क्रोएशिया की दिसंबर की भीषण सर्दी में भी सभागार में लगभग छ: सौ लोगों की उपस्थिति थी। इन सब क्रोएशियाई विद्वानों और सुधी-जनों के बीच प्रो. भरत सिंह ने अपने निराले अंदाज़ में लोगों को भारतीयता का पाठ पढ़ाया। हिन्दी भाषा में दिए गए उनके  बीज भाषण का समांतर भाषांतरण क्रोएशिया की राष्ट्रभाषा ख़रवास्की में किया जा रहा था। अपने भाषण की शुरूवात करते हुए प्रो. भरत सिंह ने बताया कि भारत एक जादुई बग़ीचा है जहाँ विश्व भर के मौसम, आबो-हवा, खान-पान, भाषाओं, संस्कृतियों, जातियों, धर्मों आदि के दर्शन एक साथ हो सकते हैं।

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हिन्दू शब्द की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि हिन्दू नाम का संबंध धर्म से नहीं है बल्कि यह उस पूरी संस्कृति का नाम है जो इस देश में आकर बसने वाली द्रविड़, आर्य, हून, आभीर, निग्रो, शक, ऑस्ट्रिक, युची, मंगोल, युनानी, तुर्क आदि जातियों ने हज़ारो सालों में तैयार की है। इन सबसे मिलकर बनी खिचड़ी मुग़लों के आने से पहले ही तैयार हो गई थी जिसमें विभिन्न तत्व इस तरह से रच-बस गए थे कि उनका स्वाद हिन्दू कहलाता था। इस संस्कृति से विकसित होकर जो संस्कृति आज फल-फूल रही है वही है हिन्दू संस्कृति।

जब उन्होंने  महान हिन्दी-उर्दू शायर इकबाल की लिखी यह पंक्तिया पढ़ी तो समूचा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।

“यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रूमा, सब मिट गए जहाँ से ।

अब तक मगर है बाक़ी, नाम-ओ-निशाँ हमारा ।

कुछ बात है कि हस्ती, मिटती नहीं हमारी ।

सदियों रहा है दुश्मन, दौर-ए-ज़माँ हमारा ।”

प्रो सिंह ने फिर विस्तार से बताया कि जहाँ एक तरफ़ दुनिया की अधिकांश प्राचीन संस्कृतियाँ ऐतिहासिक घटनाओं से लुप्त हो गई वहीं, प्रतिकूल परिस्थितियों में भी भारतीय संस्कृति जीवित रही और आज तक विश्व के लिए आदर्श बनी हुई है। भारतीय संस्कृति की जीवंतता का एक बड़ा कारण, इसकी आध्यात्मिकता है जिसने इसे अपने आधार से डिगने नहीं दिया। भारतीय संस्कृति में लौकिक सुखों को जीवन का परम लक्ष्य कभी नहीं समझा गया है, इसलिए बिना एक पैसे के भी संत और साधु मात्र एक लंगोट में महाराज और स्वामी जी की संज्ञा पाते हैं। भारत की आतिथ्य संस्कृति पर बोलते हुए प्रो. सिंह ने कहा कि भारतीय संस्कृति में अतिथि देवताओं के समान है, इसलिए हमेशा इस संस्कृति में बाहर से आनेवालों का न केवल स्वागत किया बल्कि उन्हें आत्मसात कर लिया। अतिथि देव: भव: की भावना इस संस्कृति के हृदय में है। भारतीय जीवन दर्शन पर प्रकाश डालते हुए आचार्य भरत सिंह ने बतलाया कि पुरूषार्थ निरंतर कर्मशील रहते हुए धर्मपरायणता के साथ आशावादी होकर जीवनपथ पर आगे बढ़ते रहने का पाठ भारतीय संस्कृति ने  ही दुनिया को सिखलाया। अंत में मंत्रमुग्ध श्रोताओं को धन्यवाद ज्ञापन करते हुए प्रो सिंह ने अपना भाषण समाप्त किया। प्रश्नोत्तर सत्र में कई क्रोएशियाई विद्वानों ने विभिन्न रोचक प्रश्न पूछ्कर भारतीय संस्कृति के प्रति अपनी रुचि दिखलाई और प्रो भरत सिंह के वक्तव्य की सराहना की। आशा है कि प्रो. सिंह का यह सूत्रपात क्रोएशियाई जनता के बीच भारत की छवि को और अधिक सुदृढ़ बनाएगा।

रिपोर्ट: अभिषेक अवतंस, वरीय प्राध्यापक (हिन्दी भाषा एवं साहित्य), लायडन विश्वविद्यालय, नीदरलैण्ड