यात्रा के पन्ने (1952) – राहुल सांकृत्यायन

Tibetans

Tibet in 1930.

राहुल सांकृत्यायन का यात्रा संस्मरण ‘यात्रा के पन्ने‘ (1952, साहित्य सदन, देहरादून)

राहुल सांकृत्यायन (1893-1963) मेरे पसंदीदा लेखकों में से एक हैं।  राहुल को हिन्दी में घुमक्कड़ शास्त्र का प्रणेता माना जाता है। उनके लिखे यात्रा वृत्तांत आपको बरबस ही उस प्रदेश के लोगों और उनकी भाषा-संस्कृति से जोड़ते हैं, जहाँ से आप शायद ही गुज़रे हों। राहुल हमेशा घुमक्कड़ ही रहे। सन्‌ 1923 से उनकी विदेश यात्राओं का सिलसिला शुरू हुआ तो फिर उनके सफ़र का अंत उनके जीवन के साथ ही हुआ। ज्ञान की खोज में की गईं उनकी इन यात्राओं में श्रीलंका, तिब्बत, जापान और रूस की यात्राएँ ख़ास हैं। वे चार बार तिब्बत गए। वहाँ लम्बे समय तक रहे और भारत की उस प्राचीन बौद्धिक विरासत का उद्धार किया, जो हमारे लिए अज्ञात, अलभ्य और विस्मृत हो चुकी थी।अध्ययन-अनुसंधान की आभा के साथ वे वहाँ से प्रभूत सामग्री लेकर लौटे जो भारतीय धर्म, दर्शन और भाषाविज्ञान के लिए अमूल्य हैं।भारत के संदर्भ में उनका यह काम चीनी खोजी यात्री ह्वेनसांग से कम नहीं आँका जा सकता।  सूदूर देशों की यात्राओं की तरह उनके जीवन में उनकी एक वैचारिक यात्रा की ओर भी संकेत मिलता है, जो पारिवारिक स्तर पर स्वीकृत वैष्णव मत से शुरू हो, आर्य समाज एवं बौद्ध मतवाद से गुजरती हुई मार्क्सवाद पर जाकर खत्म होती है।

1952 में छपे राहुल सांकृत्यायन के यात्रा संस्मरण संग्रह (‘यात्रा के पन्ने’, कुल 450 पृष्ठ) की एक बहुत पुरानी प्रति मेरे हाथ लगी तो मैं उसे सार्वजनिक रूप से आप सबसे बाँटने का लोभ संवरण नहीं कर सका। आप इस किताब की पी.डी.एफ़ प्रति यहाँ से मुफ़्त डाउनलोड कर सकते हैं। 

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ज़ेन विचारप्रद कथाएँ

Japanese Green Tea fable

चाय का प्याला (The Cup of Tea)

जापान के मेइजी काल में एक बार एक ज़ेन साधु नान-इन के पास एक विश्वविद्यालय के प्रोफेसर ज़ेन बौद्ध दर्शन का ज्ञान लेने के लिए आए। नाइ-इन ने उनके लिए हरी चाय बनाई। उन्होंने प्रोफेसर साहब के प्याले में चाय भर दी और तब तक भरते रहे जब तक प्याले से चाय बाहर न बहने लगी। इसे देख प्रोफेसर साहब ने कहा – बस-बस अब इसमें और चाय नहीं समा पाएगी।
नान-इन ने कहा – आप भी इसी प्याले की तरह हैं, आप भी अपनी विचारधाराओं, अवधारणाओं और मान्यताओं से भरे हुए हैं। पहले अपना प्याला तो खाली कीजिए तब ही ज़ेन का ज्ञान आपके अंदर समा पाएगा।

Zen garden

बोझ (The Burden)

जापान के कामाकुरा शहर में एक शाम दो ज़ेन बौद्ध साधू अपने मठ की ओर वापस जा रहे थे। बारिश होने के कारण जगह-जगह रास्ते में पानी जमा हुआ था। एक स्थान पर एक खूबसूरत औरत उदास होकर खड़ी थी। वह पानी से भरे गढ्ढे को नहीं पार कर पा रही थी। दोनों साधुओं में से बूढ़ा वाला साधू उसके पास गया और उसने औरत को अपनी गोद में उठाकर पानी से भरा गढ्ढा पार करवा दिया। दोनों साधु कुछ देर बाद अपने मठ पहुँच गए।
रात में सोने से पहले जवान साधू ने बूढ़े साधू से पूछा – गुरू जी ….एक साधू के लिए किसी औरत को छूना मना है ना?
बूढ़े साधू ने कहा – हाँ मना है।
फिर जवान साधू ने तपाक से पूछा – फिर शाम को सड़क किनारे आपने उस औरत को अपनी गोद में क्यूँ उठा लिया था?
बूढ़े साधु ने मुस्कुराते हुए कहा – मैंने तो उस औरत को उठाकर वहीं सड़क पर छोड़ दिया था, पर तुम तो अभी तक उसका बोझ उठाए हुए हो।

Japanese Zen Buddhism

ज्ञान (The Knowledge)

जापान में एक युवा बौद्ध भिक्षुक को किसी ने बताया की कामाकुरा शहर के पश्चिम में एक बौद्ध मठ है जहाँ दुनिया का सबसे महान ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। युवा बौद्ध भिक्षुक ने वहाँ जाने का निश्चय किया और अपने मठ से यात्रा पर निकल पड़ा। काफी दूर चलने के बाद तीसरे दिन वह एक नदी के पास पहुँच गया। आगे का रास्ता नदी को पार कर ही पूरा किया जा सकता था। लेकिन नदी में पानी अधिक था और भिक्षुक को तैरना नहीं आता था। भिक्षुक काफी देर तक माथा-पच्ची करता रहा कि किसी तरह वह नदी को पार कर दूसरी तरफ चला जाए। लेकिन उसे सफलता नहीं मिली। अंतत: वह हार मानकर वहीं बैठ गया। तभी उसे नदी के दूसरे किनारे पर एक बूढ़ा बौद्ध साधू बैठा दिखाई दिया। युवा भिक्षुक ने चिल्लाकर उससे पूछा – गुरू जी मुझे महान ज्ञान प्राप्त करने के लिए नदी की दूसरी तरफ जाना है, कोई उपाय बताइए?
बूढ़े साधू ने कुछ देर सोचने- विचारने के बाद जोर से चिल्ला कर कहा –
बेटा तुम दूसरी तरफ ही हो।

(हिंदी अनुवाद – अभिषेक अवतंस)