Bhojpuri Translation of Basava Anthology

basava

Pleased to know that Bhojpuri Translation of Basava Vachanamrutha (poems composed by Lord Basaveshwara in Kannada) is recently published by Basava Samithi, Bengaluru. The multilingual translation project was steered under the leadership of late Dr. M.M. Kulburgi. The principal editor of the Bhojpuri version is Late Prof. dr. B.S. Tiwary.
Lord Basava was a 12th-century Indian philosopher, statesman, Kannada poet, and was the founding saint of the Lingayat-Shaivism sect of Hinduism in Karnataka. Basava staunchly believed in a caste-less society where each individual had equal opportunity to rise up in life.

In the Kannada speaking region of India, the Bhakti social movement was started by Basavanna  in the 12th century in a society ridden by caste hierarchy. This Bhakti movement produced a rich treasure of literature that came to be known as Vachana sahitya created by Basava and his disciples (Akkamahadevi, Allama Prabhu, Devara Dasimayya etc.). The poems of this stream of literature contained pithy aphorisms, and conveyed in unambiguous terms precise and astute observations on spiritual and social matters of life.

The Website of Basava Samithi from where you can order the book is here

http://www.basavasamithi.org/

 

Awadhi Language

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Awadhi is an Indo-Aryan language spoken in northern India and is grouped under Purvi Hindi Branch of Hindi (hence classified as a variety of Hindi). Awadhi is primarily spoken in Awadh (Oudh) region but it is also spoken outside Awadh e.g. Fatehpur, Allahabad, Jaunpur and Mirzapur districts of Utter Pradesh (UP) state of India. It is also known as Kausali and Bainswadi.  To the east of west of it Kannoji and Bundeli is spoken and towards the east Bhojpuri is used. Indian census of 2001 enumerates 422,048,642 speakers of this language. It is believed that Awadhi has its origin in Ardha Magadhi Prakrut.

Grierson’s Linguistic survey of India provides this brief grammatical description of Awadhi

Awadhi_Grammar

A tentative list of publications on Awadhi language

1.अवधी शब्दकोश – सूर्यप्रकाश दीक्षित व सजीवनलाल यादव, विश्वविद्यालय प्रकाशन, लखनऊ, 1996

2.वाचिक कविता: अवधी – विद्यानिवास मिश्र, भारतीय ज्ञानपीठ, 2005

3.अवधी लोक कथाएँ – जगदीश पीयूष, लोकभारती प्रकाशन, 2004

4.प्रारंभिक अवधी – विश्वनाथ त्रिपाठी, राधाकृष्ण प्रकाशन, 1975

5.अवधी का विकास – बाबूराम सक्सेना, हिन्दूस्तान एकेडेमी, इलाहाबाद, 1972

6.अवधी बृहत लोकोक्ति कोश – कमला शुक्ल, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ, 2002

7.अवधी लोकगीत: समीक्षात्मक अध्ययन – विद्याविंदू सिंह, परिमल प्रकाशन, 1983

8.अवधी लोकगीत और परम्परा – इन्दूप्रकाश पाण्डेय, प्रवीण प्रकाशन, दिल्ली, 1988

9.लोकगीतों में राम-कथा : अवधी – किरण मराली, साहित्य भवन, इलाहाबाद 1986

10.अवधी का विकासबाबूरामसक्सेना, हिन्दूस्तानीअकादमी, इलाहाबाद, 1972

11.Evolution of Awadhi- Baburam Saksena, Motilal Banarsidas Publishers, 1971

12.अवधीकोशरामज्ञद्विवेदी, हिन्दूस्तानीअकादमी, इलाहाबाद, 1955

13.पूर्वी अवधी: ग्राम्यशब्दावलीआत्मारामत्रिपाठी, आलोकप्रकाशन, इलाहाबाद, 2007

14.अवधी शब्द संपदाहरदेवबाहरी, भारतीप्रेस, इलाहाबाद, 1982

1.अवधी शब्दकोश – सूर्यप्रकाश दीक्षित व सजीवनलाल यादव, विश्वविद्यालय प्रकाशन, लखनऊ, 1996

2.वाचिक कविता: अवधी – विद्यानिवास मिश्र, भारतीय ज्ञानपीठ, 2005

3.अवधी लोक कथाएँ – जगदीश पीयूष, लोकभारती प्रकाशन, 2004

4.प्रारंभिक अवधी – विश्वनाथ त्रिपाठी, राधाकृष्ण प्रकाशन, ?

5.अवधी का विकास – बाबूराम सक्सेना, हिन्दूस्तान एकेडेमी, इलाहाबाद, 1972

6.अवधी बृहत लोकोक्ति कोश – कमला शुक्ल, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ, 2002

7.अवधी लोकगीत: समीक्षात्मक अध्ययन – विद्याविंदू सिंह, परिमल प्रकाशन, 1983

8.अवधी लोकगीत और परम्परा – इन्दूप्रकाश पाण्डेय, प्रवीण प्रकाशन, दिल्ली, 1988

9.लोकगीतों में राम-कथा : अवधी – किरण मराली, साहित्य भवन, 1986

10.अवधीकाविकासबाबूरामसक्सेना, हिन्दूस्तानीअकादमी, इलाहाबाद, 1972

11.Evolution of Awadhi- Baburam Saksena, Motilal Banarsidas Publishers, 1971

12.अवधीकोशरामज्ञद्विवेदी, हिन्दूस्तानीअकादमी, इलाहाबाद, 1955

13.पूर्वीअवधी: ग्राम्यशब्दावलीआत्मारामत्रिपाठी, आलोकप्रकाशन, इलाहाबाद, 2007

14.अवधीशब्दसंपदाहरदेवबाहरी, भारतीप्रेस, इलाहाबाद, 1982

15.प्रारंभिकअवधीविश्वनाथत्रिपाठी, राधाकृष्णप्रकाशन, दिल्ली, 1975

भोजपुरी का पहला त्रिभाषी शब्दकोश केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा द्वारा प्रकाशित

केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा, की महत्त्वाकांक्षी हिंदी लोक शब्दकोश परियोजना की पहली प्रस्तुति है:

भोजपुरी-हिंदी-इंग्लिश लोक शब्दकोश, वर्ष- 2009, मूल्य – 275/- रुपए मात्र

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परियोजना का उद्देश्य है सुसंगिठत संस्थागत स्तर पर हिंदी परिवार की 48 भाषाओं की शब्द संपदा को सुरक्षित करना और भावी विकास के लिए आधुनिक आधार उपकरण तैयार करना। इतने विशद स्तर पर ऐसा कोई प्रयास देश में पहली बार हो रहा है। ये सभी भाषाएँ भारतीय जनगणना 1991 की रिपोर्ट भाषाएँ: भारत और राज्य 1997 (Language: India and States, 1997) में परिगणित हैं। इस परियोजना के अंतर्गत हिंदी परिवार की 48 बोलियों/भाषाओं/उपभाषाओं के (भारतीय जनगणना 1991 की रिपोर्ट: भाषाएँ: भारत और राज्य 1997 के आधार पर) लोक शब्दकोशों का निर्माण 48 खंडो में करने की योजना है। हिंदी की कई बोलियाँ/भाषाएं/उपभाषाएं संकटग्रस्त और विलुप्त-सी हो रही हैं और इनके साथ अद्भुत नाद और अर्थ सौंदर्य वाले शब्द भी खो रहे हैं। यदि आगामी 10-15 वर्षों में सुधि नहीं ली गई तो हम उन्हें पूर्णत: खो देंगे। लोकभाषाओं की इस महत्ता को ध्यान में रखते हुए हिंदी लोक शब्दकोश परियोजना के अंतर्गत कतिपय बोलियों/भाषाओं/उपभाषाओं के लोक शब्दकोशों के प्रकाशन, डिजिटलीकरण एवं इंटरनेट पर उपलब्ध करवाने की योजना है जिससे न केवल एक विशाल शब्द भंडार का संरक्षण होगा, बल्कि हिंदी की सांस्कृतिक जड़ों में भी पुष्टता आएगी और देश-विदेश के हिंदी पाठक लाभान्वित होंगे। परियोजना के प्रथम चरण में कुल सात बोलियों/भाषाओं/उपभाषाओं (भोजपुरी,ब्रजभाषा, राजस्थानी, बुन्देली, अवधी, छ्त्तीसगढ़ी और मालवी) पर कार्य चल रहा है।

भोजपुरी-हिंदी-इंग्लिश लोक शब्दकोश की विशिष्टताएँ –

• भोजपुरी की कुल 4221 प्रविष्टियाँ •

भोजपुरी शब्दो का हारवर्ड-क्योटो प्रोटोकॉल के तहत रोमनीकरण

• सभी भोजपुरी प्रविष्टियों का हिंदी एवं अंग्रेजी में अर्थ अथवा व्याख्या

• सभी भोजपुरी शब्दों के अर्थपूर्ण प्रयोग-उदाहरण

• भोजपुरी व्याकरण और शब्दावली पर परिशिष्ट खंड के अंतर्गत बहुउपयोगी सामग्री

• पूर्णत: वैज्ञानिक और नवीनतम भाषावैज्ञानिक प्रविधियों द्वारा शब्दकोश हेतु शब्दावली संकलन

प्रधान संपाद्क श्री अरविंद कुमार

प्रधान संपाद्क श्री अरविंद कुमार

भोजपुरी-हिंदी-इंग्लिश लोक शब्दकोश की निर्माण समिति के सदस्य निम्नलिखित हैं: दिशा-निर्देश एवं परामर्श – रामवीर सिंह शंभुनाथ ,प्रधान संपादक- अरविंद कुमार,  समन्वयक- मीरा सरीन परमलाल अहिरवाल, भाषा संपादक – राजेंद्र प्रसाद सिंह ,संयोजक संपादक व परियोजना प्रभारी – अभिषेक अवतंस कोशकर्मी- जितेंद्र वर्मा, दिग्विजय शर्मा सुरेशचंद मीणा, शैलेंद्र कुमार सिंह,  तकनीकी सहयोग -राहुल देवरानी, गिरधर सिंह

शब्दकोश खरीदने के लिए संपर्क करें: प्रकाशन विभाग केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा -282005 दूरभाष : 0562-2530683 निदेशक सचिवालय : 0562-2530684 वेबसाईट – http://www.hindisansthan.org → वी.पी.पी. द्वारा पुस्तकें नहीं भेजी जाती। पुस्तकें मँगाने के लिए अग्रिम धनराशि डाक खर्च सहित ‘सचिव, केंद्रीय हिंदी शिक्षण मंडल, आगरा’ के नाम ड्राफ्ट द्वारा भेंजें। डाक खर्च के लिए पुस्तक के मूल्य के साथ 100/- रुपए अलग से जोड़ें।

Developing Lexical Resources for Varieties of Hindi

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Indian linguistic area as envisaged by late Prof MB Emeneau in his seminal paper entitled ‘India as a Linguistic Area’ (1956) is home to a total of 234 mother tongues with over ten thousands speakers (2001 Census) and numerous smaller and lesser known languages belonging to at least five major language families viz the Indo Aryan, Dravidian, Tibeto-Burman, Austro Asiatic and Andamanese spoken by a vast population spread across Indian subcontinent. Not going much deep into the reasons, it is important to mention that the number of mother tongues which are accounted in the census data have seen an increase from 184 in 1991 to 234 in 2001. Notwithstanding the conservative estimate of Ethnologue (2008) that 20 percent of world’s living languages are moribund including the ones spoken in India, this increase in number of mother tongues has shown us the ray of hope by increasingly visible assertion by people to identify with their languages. Surprisingly the situation for Indo Aryan language family with almost 15 languages out of the 22 recognized in the eighth schedule of the constitution of India does not seem to be too well with respect to its smaller and lesser known members. Gradually many of these lesser known languages are losing their speakers in face of bigger and mightier languages and eventually dying an unnatural death resulting in loss of precious bio-cultural knowledge accumulated over many centuries.

One of the measures to counter this unwanted situation is the centuries-old practice of building grammars and dictionaries. It is true that complete language revitalization cannot be achieved by mere preparation of grammars and dictionary. There is lot more which needs to be done in this respect. However it is sure that development of these resources paves the way for wider community involvement and awareness culminating in the preservation of the precious traditional knowledge for future generations. To read more of this article (published by ICFAI books  http://www.iupindia.org/) click below

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