Temple of the Sun

About this massive monument, the great poet Rabindranath Tagore said –  “here the language of stone surpasses the language of man”. Situated at the eastern coast of India, the Konark Sun Temple was built by King Narsimhadeva I of Ganga dynasty in the 13th century. It was designed in the form of a gorgeously decorated chariot of Sun god mounted on 24 wheels , each about 10 feet in diameter, and drawn by 7 mighty horses. Sun temple of Konark is a masterpiece of Orissa’s medieval architecture. It is a UNESCO world hertiage monument.

Trivia

  • The Konark temple is also known for its erotic sculptures of maithunas.
  • In one of the panels at the temple, there is a depiction of giraffe being gifted by West Asian traders to the king of Odisha. It shows Odisha’s long history of trade with Africa and Arabia. Some other experts believe that this animal is Okapi or Dromedary (Arabian camel). 
  • In another panel, there is lady wearing Japanese style sandals (Geta Sandals), proving the maritime relation of Odisha with east & south-east Asia.
  • At present it is located two kilometers from the sea, but originally the ocean came almost up to its base. Until fairly recent times, the temple was close enough to the shore to be used as a navigational point by European sailors, who referred to it as the ‘Black Pagoda’.

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Temple is open for public from sunrise to sunset

Entrance Fees are as follows:

Citizens of India and visitors of SAARC (Bangladesh, Nepal, Bhutan, Sri Lanka, Pakistan, Maldives and Afghanistan) and BIMSTEC Countries (Bangladesh, Nepal, Bhutan, Sri Lanka, Thailand and Myanmar) – INR. 30 per head.

Citizen of other countries: US $ 5 or INR. 500/- per head

(children up to 15 years enter free)

How to reach?

Konark is connected by good all weather motorable roads. Regular Bus services are operating from Puri and Bhubaneswar. Besides Public transport Private tourist bus services and taxis are also available from Puri and Bhubaneswar.

 

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कुछ बोध कथाएँ

अपनी झोली

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दो आदमी यात्रा पर निकले। दोनों की मुलाकात हुई। दोनों यात्रा में एक साथ जाने लगे। दस दिनों के बाद दोनों के अलग होने का समय आया तो एक ने कहा, ‘भाईसाहब! एक दस दिनों तक हम दोनों साथ रहे। क्या आपने मुझे पहचाना?’ दूसरे ने कहा, ‘नहीं, मैंने तो नहीं पहचाना।’ वह बोला, ‘माफ़ करें मैं एक नामी ठग हूं। लेकिन आप तो महाठग हैं। आप मेरे भी उस्ताद निकले।’

‘कैसे?’ ‘कुछ पाने की आशा में मैंने निरंतर दस दिनों तक आपकी तलाशी ली, मुझे कुछ भी नहीं मिला। इतनी बड़ी यात्रा पर निकले हैं तो क्या आपके पास कुछ भी नहीं है? आप बिल्कुल ख़ाली हाथ हैं?’

‘नहीं, मेरे पास एक बहुत क़ीमती हीरा है और एक सोने का कंगन है ।’

‘तो फिर इतनी कोशिश के बावजूद वह मुझे मिले क्यों नहीं?’

‘बहुत सीधा और सरल उपाय मैंने काम में लिया। मैं जब भी बाहर जाता, वह हीरा और सोने का कंगन तुम्हारी पोटली में रख देता था। तुम सात दिनों तक मेरी झोली टटोलते रहे। अपनी पोटली संभालने की जरूरत ही नहीं समझी। तुम्हें मिलता कहाँ से?’

कहने का मतलब यह कि हम अपनी गठरी संभालने की ज़रूरत नहीं समझते। हमारी निगाह तो दूसरों की झोली पर रहती है। यही हमारी सबसे बड़ी समस्या है। अपनी गठरी टटोलें, अपने आप पर दृष्टिपात करें तो अपनी कमी समझ में आ जाएगी।

 सीमा

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सड़क किनारे एक बुढ़िया अपना ढाबा चलाती थी। एक यात्री आया। दिन भर का थका, उसने विश्राम करने की सोची। बुढिया से कहा, ‘क्या रात के लिए यहाँ आश्रय मिल सकेगा?’ बुढिया ने कहा, क्यों नहीं, आराम से यहां रात भर सो सकते हो।’

यात्री ने पास में पड़ी चारपाइयों की ओर संकेत कर कहा, ‘इस पर सोने का क्या चार्ज लगेगा?’ बुढ़िया ने कहा, ‘चारपाई पर सोने के लिए दस रूपए लगेंगे।’ यात्री ने सोचा रात भर की ही तो बात है। बेकार में दस रूपए क्यों खर्च की जाए। आंगन में काफी जगह है, वहीं सो जाऊंगा।

यह सोचकर उसने फिर कहा, ‘और अगर चारपाई पर न सोकर आंगन की ज़मीन पर ही रात काट लूँ तो क्या लगेगा?’ ‘फिर पूरे सौ रूपए लगेंगे -‘ बुढ़िया ने कहा।

बुढ़िया की बात सुन यात्री को उसके दिमाग पर संदेह हुआ। चारपाई पर सोने के दस रूपए और भूमि पर चादर बिछाकर सोने के लिए सौ रूपए – यह तो बड़ी विचित्र बात है। उसने बुढिया से पूछा, ‘ ऐसा क्यों?’

बुढ़िया ने कहा, ‘चारपाई की सीमा है। तीन फुट चौड़ी, छह फुट लंबी जगह ही घेरोगे। बिना चारपाई सोओगे तो पता नहीं कितनी जगह घेर लो।’ सीमा में रहना ही ठीक है। असीम की बात समस्या पैदा करती है।

भारतीय नरक

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एक बार एक भारतीय व्यक्ति मरकर नरक में पहुँचा,
तो वहाँ उसने देखा कि प्रत्येक व्यक्ति को किसी भी देश के नरक में जाने की छूट है ।
उसने सोचा, चलो अमेरिकावासियों के नरक में जाकर देखें, जब वह वहाँ पहुँचा तो द्वार पर पहरेदार से उसने पूछा – क्यों भाई अमेरिकी नरक में क्या- क्या होता है ? पहरेदार बोला – कुछ खास नहीं, सबसे पहले आपको एक इलेक्ट्रिक चेयर पर एक घंटा बैठाकर करंट दिया जायेगा, फ़िर एक कीलों के बिस्तर पर आपको एक घंटे लिटाया जायेगा, उसके बाद एक यमदूत आकर आपकी जख्मी पीठ पर पचास कोड़े बरसायेगा…
बस! यह सुनकर वह व्यक्ति बहुत घबराया औरउसने रूस के नरक की ओर रुख किया, और वहाँ के पहरेदार से भी वही पूछा, रूस के पहरेदार ने भी लगभग वही वाकया सुनाया जो वह अमेरिका के नरक में सुनकर आया था । फ़िर वह व्यक्ति एक- एक करके सभी देशों के नर्कों के दरवाजे जाकर आया, सभी जगह उसे एक से बढकर एक भयानक किस्से सुनने को मिले । अन्त में थक- हार कर जब वह एक जगह पहुँचा, देखा तो दरवाजे पर लिखा था “भारतीय नरक” और उस दरवाजे के बाहर उस नरक में जाने के लिये लम्बी लाईन लगी थी, लोग भारतीय नरक में जाने को उतावले हो रहे थे, उसने सोचा कि जरूर यहाँ सजा कम मिलती होगी…
तत्काल उसने पहरेदार से पूछा कि यहाँ के नरक में सजा की क्या व्यवस्था है ? पहरेदार ने कहा – कुछ खास नहीं…सबसे पहले आपको एक इलेक्ट्रिक चेयर पर एकघंटा बैठाकर करंट दिया जायेगा, फ़िर एक कीलों के बिस्तर पर आपको एक घंटे लिटाया जायेगा, उसके बाद एक यमदूत आकर आपकी जख्मी पीठ पर पचास कोड़े बरसायेगा… बस !

चकराये हुए व्यक्ति ने उससे पूछा – यही सब तो बाकी देशों के नरक में भी हो रहा है, फ़िर यहाँ इतनी भीड क्यों है ? पहरेदार बोला – इलेक्ट्रिक चेयर तो वही है, लेकिन बिजली नहीं है, कीलों वाले बिस्तर में से कीलें कोई निकाल ले गया है, और कोड़े मारने वाला यमदूत सरकारी कर्मचारी है, आता है, दस्तखत करता है और चाय-नाश्ता करने चला जाता है…औरकभी गलती से जल्दी वापस आ भी गया तो एक-दो कोड़े मारता है और पचास लिख देता है…चलो आ जाओ अन्दर !!

 

लोग कहते हैं मेरी आँखें मेरी माँ जैसी हैं।

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19 मई 2013 की वह सुबह याद करके आज भी मन सिहर उठता है। आज फिर वह दिन है। मम्मी को गए हुए आज पूरे तीन साल हो गए। कितना कुछ तुम छोड़ गई। मेरी पत्नी मुझसे हमेशा पूछती है कि तुम हमेशा फोन करके यह क्यों पूछते हो कि खाना खाया कि नहीं, इलिका-औरस ने कुछ खाया कि नहीं? मैं उससे कहता हूँ – मेरी माँ भी मुझसे यही सवाल कई बार पूछती थी। अपनापन है, प्यार है इसमें।

जब आगरे से सीधा विदेश में रहने आया तो कई बार फ़ोन पर पूछती कि रात का खाना खाया कि नहीं, मैं कहता – अरे नहीं मम्मी अभी तो यहाँ तो दोपहर के तीन बज रहे हैं। फिर कहती ऐसा …तुम तो दूसरी दुनिया में चले गए। फिर बोलती कि कुछ खा लेना ठीक। बारहवीं के पश्चात घर से बाहर निकल दिल्ली आने के बाद माँ से बातचीत फ़ोन पर और साथ रहना विश्वविद्यालय की छुट्टियों में ही हो पाता था। एस.टी.डी करने के लिए पैसे भी कम थे और शायद वह समय भी ऐसा था जब अल्हड़पन का ज्वर अपने उफान पर था। जब आगरे में नौकरी करनी शुरू की तब मैं काफ़ी गंभीर और संयमित हो चला था। बाद में ईश्वरीय संयोग (अस्वस्थता) से आगरे में माँ का सानिध्य भरपूर मिला। कई-कई महीने हम लोग साथ रहे। मैंने खाना पकाना माँ से वहीं सीखा (जो आज बहुत मददगार साबित हो रहा है)। और चाय के साथ घंटों बातचीत – दफ़्तर से जुड़ी बातें, किस्से-कहानियाँ , चुटकुले, मेरे विश्वविद्यालय के दिनों की घटनाएँ, अंदमान की स्मृतियाँ, वृंदावन के मेरे अनुभव, मेरी प्रेम गाथाएँ और बहुत कुछ। इन सबके बीच एक बेहतरीन श्रोता और फ़ीडबैक देने के लिए मौज़ूद थी माँ।

उन दिनों मैं हिन्दी संस्थान के भोजपुरी-हिन्दी-अंग्रेज़ी शब्दकोश पर काम भी कर रहा था। हर दिन कुछ अनोखे शब्द मिलते और हमारी बातचीत उनके सही मतलब और प्रयोग पर होती रहती। मैंने पाया कि माँ पिताजी से कहीं ज़्यादा प्रभावशाली भोजपुरी जानती थी। शायद यह उनकी ठेठ ग्रामीण पॄष्ठभूमि से भी वास्ता रखता था जबकि पिताजी सदैव राजधानी में ही रहे थे। आगरे में हमारे निवास की बालकोनी में सूखने के लिए फैलाईं साड़ियाँ देखकर सब मुहल्ले वाले समझ जाते थे कि अभिषेक की माताजी आ गईं है, फिर लोगों का आना शुरू होता। सबलोगों से मिलना और उन्हें चाय पिए बगैर न जाने देने की रस्म निभाई जाती।

माँ को आगरा बहुत रास आता था, कभी-कभी अस्वस्थ रहती थी, लेकिन आगरे का ठेठ देसीपना उन्हें बहुत भाता था। दिन बीतते देर न लगी। फिर मैं विदेश आ गया, माँ अस्वस्थ रहती थी, मेरा भारत आना-जाना हर छह महीनों में लगा रहता था। जनवरी 2013 में जब आखिरी बार मिला तो माँ ने आँसुओं से भरी आँखों से मुझे विदाई दी। ठीक पाँच महीनों में वे चली गईं। मैं असहाय यहीं पड़ा रहा। माँ ने उसके पिछले हफ़्ते ही मुझसे फ़ोन पर कहा था कि बेटा मैं अब तुमसे नहीं मिल पाऊँगी, कुछ खा लेना। 19 मई की उस सुबह मैं परदेश में ही था, जब यह ख़बर मुझे मिली कि वह सच कह रही थी। जाने किस जल्दी में थी। लोग कहते हैं मेरी आँखें मेरी माँ जैसी हैं, यूँ ही भरी हैं पानी से मगर तुम्हारी राह देखती हैं।

दाँतों की सफ़ाई

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Indian Dentist

दाँतों की सफ़ाई का ध्यान रखना कितना ज़रुरी है, यह हम सब जानते हैं। पर आपको यह जानकर आश्चर्य होगा मेरे जैसे कई आम भारतीय अपने जीवन में कभी किसी दाँत के डाक्टर के पास नहीं गए होंगे। देश से बाहर जाने के बाद पता चला कि यहाँ साल में दो बार दाँत के डाक्टर के पास जाना अनिवार्य है। इसके लिए आपको अलग से बीमा भी करवाना पड़ता है। बच्चे-वयस्क, बूढ़े-जवान सभी को अपने दाँतो की देखभाल के लिए दाँतों के डाक्टर के जाना पड़ता है। भारत में लोग सिर्फ़ दाँतों की बीमारी या दर्द होने पर दाँतों के डाक्टर के पास जाते हैं।

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An Indian Datun Seller

बहुत साल पहले से भारत के लोग दाँत माँजने  के लिए दातुन का इस्तेमाल करते आ रहे हैं। इसके लिए ख़ास तौर से नीम या बबूल  या मिसवाक की  ताज़ी टहनी इस्तेमाल की जाती है। लेकिन अब शहरों में इसका इस्तेमाल कम होता जा रहा है। लोग टूथब्रश और टूथपेस्ट का इस्तेमाल ज़्यादा करते हैं।

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Datun Sahib

इसी प्रसंग में मैं आपको दातुन साहिब के बारे में बताना चाहता हूँ। दातुन साहिब लद्दाख (जम्मू-कश्मीर, भारत) के मुख्यालय लेह में स्थित एक मिसवाक के पेड़ का नाम है। इस पेड़ को नारंगी रंग के कपड़े में लपेटा गया है। यह जगह लेह के मुख्य बाज़ार के बिल्कुल करीब है। पास में रोटियाँ बनानेवालों की दुकानें है। कथा यह है कि 1517 ईसवी में जब सिख धर्मगुरू गुरूनानक देव जी अपनी दूसरी प्रचार यात्रा ( द्वितीय उदासी) के दौरान लेह पहुँचे थे। यहाँ उन्होंने अपनी दातुन से मिसवाक का पेड़ लगाकर लेह के पहाड़ी रेगिस्तान में हरियाली और सदभाव का संदेश दिया था।

एक बात और कि आमतौर पर भारतीय लोग सुबह-सुबह ही दाँत माँजते हैं, लेकिन पाश्चात्य संस्कृति में सोने से पहले भी दाँतों को माँजना बेहद ज़रूरी है। उसी तरह मैंने अपनी ज़िन्दगी में (अन्य भारतीयों की तरह) कभी फ़्लॉस (दाँत साफ करने का धागा) का इस्तेमाल नहीं किया था। लेकिन अब करने लगा हूँ। अगर आपके दाँत तंदुरुस्त रहेंगे, तो आपकी सेहत अच्छी होगी और आप ज़िंदगी का पूरा-पूरा लुत्फ उठा पाएँगे। अगर यही बात है, तो फिर, क्यों न दाँतों के डॉक्टर के पास जाएँ?

अंत में 1980 के दशक का दूरदर्शन का विज्ञापन। यह विज्ञापन ’डाबर लाल दंत मंजन’ का है। यह आयुर्वेदिक दंतमंजन पहले भारत में काफ़ी लोकप्रिय था। मुझे याद है कि मेरी माँ और दादी भी इसका रोज़ाना इस्तेमाल करती थीं

 

भारतीय प्रोफ़ेसर ने क्रोएशिया को भारतीय संस्कृति का पाठ पढ़वाया

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Imageमध्य युरोप और भूमध्य सागर के बीचो-बीच बसा देश क्रोएशिया अपने लंबे समुद्र तटों के लिए विश्व प्रसिद्ध है। गले में पहनी जाने वाली टाई और हवा में तैरने वाले पैराशूट के आविष्कारक देश क्रोएशिया में 1000 से ज़्यादा द्वीप हैं जिनमें केवल 50 में ही लोग रहते हैं और इसलिए यह देश युरोपीय पर्यटकों के बीच ख़ासा लोकप्रिय है । क्रोएशिया की राजधानी ज़गरेब है जो पश्चिमी और पूर्वी युरोपीय स्थापत्य और वास्तुकला के अनोखे समिश्रण का एक बेजोड़ नमूना है। यहाँ की मुद्रा ’कुना’ है जो लगभग 11 भारतीय रुपयों के बराबर है। यहाँ के लोग ख़रवास्की भाषा बोलते हैं।  क्रोएशिया जुलाई 2013 से युरोपीय संघ का सद्स्य राष्ट्र भी है। वर्ष 2009 से क्रोएशिया के ज़गरेब विश्वविद्यालय के भारतविद्या विभाग (Indology Department) में भारत सरकार एवं क्रोएशिया सरकार के सहयोग से हिन्दी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति के पठन-पाठन के लिए भारतीय विद्वान आचार्यों को प्रतिनियुक्त किया जा रहा है।

वर्तमान में ज़गरेब विश्वविद्यालय के भारतविद्या विभाग में विज़िटिंग प्रोफ़ेसर और हिन्दी शिक्षण और भाषा विज्ञान के लब्धप्रतिष्ठ आचार्य प्रो. भरत सिंह (केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा) ने पिछले महीने  13 दिसंबर 2013 को क्रोएशिया वासियों को भारतीयता और भारतीय संस्कृति से रूबरू करवाया। अवसर था अमेरिका के हारवर्ड विश्वविद्यालय की प्रोफ़ेसर डायना एल. एक की पुस्तक ‘India: a Sacred Geography’ के ख़रवास्की (क्रोएशियन) अनुवाद Indija Sveta Geographija के भव्य लोकार्पण का। पुस्तक का लोकार्पण समारोह  पुस्तक प्रकाशक डबल रेनबो प्रकाशन द्वारा विश्वविद्यालय के विशाल सभागार में आयोजित किया गया था। समारोह में बीज वक्तव्य प्रो भरत सिंह द्वारा ’भारतीय संस्कृति’ विषय पर दिया गया। क्रोएशिया की दिसंबर की भीषण सर्दी में भी सभागार में लगभग छ: सौ लोगों की उपस्थिति थी। इन सब क्रोएशियाई विद्वानों और सुधी-जनों के बीच प्रो. भरत सिंह ने अपने निराले अंदाज़ में लोगों को भारतीयता का पाठ पढ़ाया। हिन्दी भाषा में दिए गए उनके  बीज भाषण का समांतर भाषांतरण क्रोएशिया की राष्ट्रभाषा ख़रवास्की में किया जा रहा था। अपने भाषण की शुरूवात करते हुए प्रो. भरत सिंह ने बताया कि भारत एक जादुई बग़ीचा है जहाँ विश्व भर के मौसम, आबो-हवा, खान-पान, भाषाओं, संस्कृतियों, जातियों, धर्मों आदि के दर्शन एक साथ हो सकते हैं।

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हिन्दू शब्द की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि हिन्दू नाम का संबंध धर्म से नहीं है बल्कि यह उस पूरी संस्कृति का नाम है जो इस देश में आकर बसने वाली द्रविड़, आर्य, हून, आभीर, निग्रो, शक, ऑस्ट्रिक, युची, मंगोल, युनानी, तुर्क आदि जातियों ने हज़ारो सालों में तैयार की है। इन सबसे मिलकर बनी खिचड़ी मुग़लों के आने से पहले ही तैयार हो गई थी जिसमें विभिन्न तत्व इस तरह से रच-बस गए थे कि उनका स्वाद हिन्दू कहलाता था। इस संस्कृति से विकसित होकर जो संस्कृति आज फल-फूल रही है वही है हिन्दू संस्कृति।

जब उन्होंने  महान हिन्दी-उर्दू शायर इकबाल की लिखी यह पंक्तिया पढ़ी तो समूचा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।

“यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रूमा, सब मिट गए जहाँ से ।

अब तक मगर है बाक़ी, नाम-ओ-निशाँ हमारा ।

कुछ बात है कि हस्ती, मिटती नहीं हमारी ।

सदियों रहा है दुश्मन, दौर-ए-ज़माँ हमारा ।”

प्रो सिंह ने फिर विस्तार से बताया कि जहाँ एक तरफ़ दुनिया की अधिकांश प्राचीन संस्कृतियाँ ऐतिहासिक घटनाओं से लुप्त हो गई वहीं, प्रतिकूल परिस्थितियों में भी भारतीय संस्कृति जीवित रही और आज तक विश्व के लिए आदर्श बनी हुई है। भारतीय संस्कृति की जीवंतता का एक बड़ा कारण, इसकी आध्यात्मिकता है जिसने इसे अपने आधार से डिगने नहीं दिया। भारतीय संस्कृति में लौकिक सुखों को जीवन का परम लक्ष्य कभी नहीं समझा गया है, इसलिए बिना एक पैसे के भी संत और साधु मात्र एक लंगोट में महाराज और स्वामी जी की संज्ञा पाते हैं। भारत की आतिथ्य संस्कृति पर बोलते हुए प्रो. सिंह ने कहा कि भारतीय संस्कृति में अतिथि देवताओं के समान है, इसलिए हमेशा इस संस्कृति में बाहर से आनेवालों का न केवल स्वागत किया बल्कि उन्हें आत्मसात कर लिया। अतिथि देव: भव: की भावना इस संस्कृति के हृदय में है। भारतीय जीवन दर्शन पर प्रकाश डालते हुए आचार्य भरत सिंह ने बतलाया कि पुरूषार्थ निरंतर कर्मशील रहते हुए धर्मपरायणता के साथ आशावादी होकर जीवनपथ पर आगे बढ़ते रहने का पाठ भारतीय संस्कृति ने  ही दुनिया को सिखलाया। अंत में मंत्रमुग्ध श्रोताओं को धन्यवाद ज्ञापन करते हुए प्रो सिंह ने अपना भाषण समाप्त किया। प्रश्नोत्तर सत्र में कई क्रोएशियाई विद्वानों ने विभिन्न रोचक प्रश्न पूछ्कर भारतीय संस्कृति के प्रति अपनी रुचि दिखलाई और प्रो भरत सिंह के वक्तव्य की सराहना की। आशा है कि प्रो. सिंह का यह सूत्रपात क्रोएशियाई जनता के बीच भारत की छवि को और अधिक सुदृढ़ बनाएगा।

रिपोर्ट: अभिषेक अवतंस, वरीय प्राध्यापक (हिन्दी भाषा एवं साहित्य), लायडन विश्वविद्यालय, नीदरलैण्ड 

बुद्ध और साँप

बहुत पुरानी बात है। किसी जंगल में भगवान बुद्ध को एक जहरीला साँप मिला। उसका आस-पास के गाँवों में बड़ा आतंक था। बुद्ध ने उसे मनुष्यों को काटने-डसने से मना किया और अहिंसा का मार्ग दिखाया। साँप बुद्ध का अनुयायी हो गया। कुछ महीनों बाद –

जब बुद्ध उसी जंगल के पास के एक गाँव से गुजर रहे थे तो उन्होंने देखा कि लोग एक साँप को ईंट-पत्थरों से मार रहे हैं। बुद्ध ने लोगों को उस साँप को मारने से रोका। तब उस लहू-लुहान घायल साँप ने बताया कि वह वही भक्त साँप है जो उन्हें जंगल में मिला था। साँप ने बताया कि उसने बुद्ध के आदेश का पालन करते हुए लोगों को काटना-डसना छोड़ दिया था। फिर भी लोगों ने मार-मार कर उसकी यह हालत कर दी। भगवान बुद्ध ने साँप से कहा – “मैंने काटने-डसने के लिए मना किया था मित्र, फुफकारने के लिए नहीं। तुम्हारी फुफकार से ही लोग भाग जाते।”शिक्षा: काटो-डसो मत फुफकारों अवश्य।
Do not Bite but Don’t forget to Hiss

पराठे

वर्ष 1962 की बात है पंजाब के पठानकोट शहर में एक गोरखा परिवार रहा करता था। परिवार के मुखिया किशन गुरुंग शहर की एक कपड़ा मिल में काम करते थे। कुछ महीनों पहले ही उनके इकलौते बेटे राजू की भर्ती फौज में हो गई थी। इस बीच भारत-चीन सीमा पर लड़ाई शुरू हो चुकी थी। राजू भी अपनी बटालियन के साथ सीमा पर तैनात था। राजू की माँ प्रभा देवी पिछले कई महीनों से बीमार चल रही थी। दरअसल प्रभा देवी राजू के फौज में जाने के बाद ही बीमार रहने लगी थी।

फरवरी की एक दोपहर किशन जब खाना खाने के लिए घर आए तो पता चला कि डाकखाने के बाबू ने उन्हें बुलवाया है। झटपट खाना खा कर किशन डाकखाने जा पहुँचे। डाक-बाबू ने किशन से पूछा कि क्या उनके बेटे राजू का कोई पत्र उन्हें हाल में मिला है? किशन ने बताया कि अभी दस दिन पहले राजू का अंतर्देशीय पत्र आया था जिसे डाकबाबू ने ही पढ़कर सुनाया था। राजू ने उसमें उसके सकुशल होने की बात लिखी थी। यह ज़माना मोबाइल फोन का न था, दूरस्थ पारिवारिक संप्रेषण का माध्यम केवल चिट्ठियाँ थी।

डाक-बाबू ने बताया कि फौज से एक टेलिग्राम आया है। यह सुनते ही किशन के होश फाख्ता हो गए। यह वह समय था जब टेलिग्राम सिर्फ बुरे समाचार ले कर आते थे और वह भी त्वरित गति से। डाक बाबू ने किशन की हालत देखते हुए कहा वह टेलिग्राम डाकखाने में पिछले चार दिन से आया हुआ है। लेकिन अंतत: उन्होंने उसे बुलवा ही लिया। किशन ने पूछा टेलिग्राम में क्या लिखा है? डाकबाबू ने बताया कि टेलिग्राम में लिखा है: सौरी टू इन्फॉर्म डैट योर सन सिपाही राजू गुरुंग इज़ के.आइ.ए. प्लीज़ रिपोर्ट टू डिव। डाकबाबू ने बताया – राजू के.आइ.ए मतलब किल्ड इन एक्शन हो गया है यानी लड़ाई में मारा गया है और फौज ने उन्हें डिवीजनल हेडक्वाटर में हाजिर होने के लिए कहा है। यह सुनते ही किशन के पैरो तले जमीन खिसक गई। इकलौती संतान के न रहने की खबर जान कर और हो भी क्या सकता था। भारी मन से किशन गुरुंग घर वापिस आए। उन्होंने अपनी बीमार पत्नी को कुछ नहीं बताया। रोज सुबह नहा-धोकर अपने और राजू की माँ के लिए भोजन तैयार कर कारखाने चल जाते और शाम को घर लौटते। राजू की माँ पूरे दिन बिस्तर पर ही रहती। किशन सोचते कि उनकी पत्नी पहले से ही बीमार है। ऐसी खबर सुनकर उनकी कहीं जीने की आस ही न छूट जाए।

एक हफ्ता गुजर गया। सोमवार को किशन कारखाने के लिए रवाना होने ही वाले थे कि दरवाज़े पर दस्तक हुई। दरवाजा खोला तो देखा डाक-बाबू आए हुए हैं। डाकबाबू ने बताया कि मिलिट्री हेडक्वाटर से गलती हो गई थी। जिस राजू गुरुंग की मृत्यु हुई थी वह इसी जिले में रहने वाले कोई और सिपाही था। उन्होंने अन्य डाकघरों से संपर्क कर उस सिपाही के निवास का पता लगवा लिया है। अब वह टेलिग्राम उसके परिवार वालों को भेज दिया गया है। यह सुनकर किशन की आँखों में खुशी के आँसू छलक पड़े। आखिर उनका प्यारा बेटा राजू जीवित जो था। उसी दिन किशन ने डाकबाबू से राजू को पत्र लिखवाया कि उसकी माँ की तबीयत ज़्यादा खराब है, और वह जल्द से जल्द छुट्टी लेकर घर वापिस आ जाए।

पत्र मिलते ही राजू घर जाने के लिए बेचैन हो गया। लेकिन युद्ध के बीच छुट्टी की बाबत अपने सीओ (कमांडिंग अफसर) से मिलने की हिम्मत उसे नहीं पड़ी। राजू पत्र मिलने के बाद ही गुमसुम सा रहने लगा। यह बात किसी तरह बटालियन के कमांडिंग अफसर तक पहुँच गई। सीओ ने उसे बुलवाया और सारा माज़रा पूछा। राजू ने बताया की उसकी माँ बीमार है और उसे घर जाने के लिए छुट्टी चाहिए। सीओ ने उसे डांटते हुए कहा कि उसने छुट्टी के लिए आवेदन क्यूँ नहीं दिया, माँ की सेवा सबसे जरूरी है। यह कहते हुए सीओ ने उसकी 20 दिन की छुट्टी मंजूर कर दी।

छुट्टी लेकर राजू पठानकोट वापिस आ गया। बेटे से मिलकर माँ-बाप दोनों की खुशी का ठिकाना न रहा। घर में माँ बीमार पड़ी थी। बिस्तर से उठना उनके लिए मुश्किल था। उनका खाना बहुत कम हो गया था। अपने और माँ के लिए लिए भोजन स्वयं पिताजी ही बनाते थे। कुछ दिनों तक राजू घर में रहकर अपनी माँ की सेवा में जुटा रहा। राजू जवान लड़का था। उसका मन घर के अंदर कहाँ लगे। सुबह खा-पीकर अपने दोस्तों से मिलने निकल जाता और शाम को वापिस आता।

धीरे-धीरे राजू की छुट्टियाँ समाप्त होने को आईं। एक दिन जब राजू शाम को घर वापिस लौटा तो उसने महसूस किया कि घर में देशी घी की खुशबू तैर रही है। रसोई में आज देशी घी के पराठे और आलू-गोभी की सब्जी का भोजन तैयार था। राजू ने हाथ-मुँह धोकर पिताजी और अपने लिए खाना परोसा। पराठे-सब्जी का एक निवाला लेने के बाद ही उसने पिताजी से पूछा – यह खाना किसने बनाया है? यह खाना तो आपके हाथ का बना हुआ नहीं लगता। खाना बहुत स्वादिष्ट है। पिताजी ने कहा – पहले खाना खा लो, कल सुबह बताउंगा किसने बनाया है।

अगले दिन सुबह उठने पर पता चला कि राजू की माँ प्रभा देवी स्वर्गवासी हो गई हैं। रात को उनकी मृत्यु नींद में हो गई थी। राजू और उसके पिता ने बड़े दुखी मन से उनका अंतिम संस्कार संपन्न किया। अब घर में बस दो ही लोग बचे थे। आखिरकार वह दिन आ ही गया जिस दिन राजू को वापस अपनी बटालियन में हाजिर होने के लिए यात्रा शुरू करनी थी। पिताजी ने उस दिन कारखाने से छुट्टी ले ली। वे राजू को पठानकोट रेलवे स्टेशन पर गाड़ी में बिठाने के लिए साथ आए।

राजू को हावड़ा मेल में बिठाने के दौरान पिताजी ने राजू को बताया कि देशी घी के पराठे और आलू-गोभी की सब्जी का भोजन उसकी माँ ने बनाया था। उस दिन दोपहर में जब वे कारखाने से वापस आए तो उन्हें उसकी माँ ने कहा कि राजू को देशी घी के पराठे बहुत पसंद हैं और वे उसके वापिस जाने से पहले उसे अपने हाथ के बने पराठे खिलाना चाहती हैं। तब वे उसकी माँ को बिस्तर से उतार कर रसोई तक ले गए। वहाँ फर्श पर उनकी गोद में बैठकर उसकी माँ ने उन देशी घी के पराठों को उसके लिए बनाया था। उसकी माँ कह रही थी वह तुम्हें कई दिनों से पराठे बनाकर खिलाना चाहती थीं। ठीक अगले दिन सुबह वह तुम्हें पराठे खिलवाकर इस दुनिया से सदा के लिए चली गईं। यह सुनकर राजू की आँखों में आँसुओं की लहर बह निकली। अब रेलगाड़ी ने जाने की सीटी दे दी थी।

लेखक : अभिषेक अवतंस

(उस वृद्ध गोरखा सज्जन का धन्यवाद जो मेरे साथ अप्रैल 2012  में जम्मू-राउरकेला एक्सप्रेस ट्रेन में यात्रा कर रहे थे और जिन्होंने मुझे यह कहानी सुनाई)

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