माये नि मेरिये

माँ की चौथी पुण्यतिथि – 19  मई 2017 पर  

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शायद जुलाई 2010 का महीना रहा होगा जब पहली बार पठानकोट स्टेशन पर उतरा था। पंजाब के सबसे उत्तरी भाग में स्थित पठानकोट शहर अपनी सैनिक छावनी और हिमाचल तथा जम्मू-कश्मीर के लिए यातायात के एक केंद्र के रूप में मशहूर है। मुझे केंद्रीय हिंदी संस्थान (आगरा)  के काम से बरास्ते पठानकोट काँगड़ा जाना था। दिल्ली से मैंने बीती रात ही धौलाधार एक्सप्रेस ट्रेन ली थी।  पठानकोट का नाम हमारे परिवार के लोगों की ज़ुबान  पर पहले से ही मौजूद था। बहुत सालों तक दिल्ली जाने के लिए राँची से  चलनेवाली एकमात्र रेलगाड़ी का नाम हटिया पठानकोट जनता एक्सप्रेस था। जब हमारे परिवार के बच्चों का दिल्ली जाकर पढ़ने का सिलसिला शुरू हुआ तो यह नाम हम सबकी ज़ुबान पर बैठ गया। लेकिन परिवार में  पठानकोट शायद ही कोई गया था। लेकिन उस दिन मैं पहली बार पठानकोट जंक्शन  रेलवे स्टेशन पर खड़ा था।  न जाने क्यों ऐसा लग रहा था कि जैसे यहाँ आ चुका हूँ।  बहुत अपना-सा , जैसे किसी पोटली में बंधा हुआ गुड़ का ढेला। मुझे पठानकोट से काँगड़ा जाने के लिए  बस लेनी थी। बस दोपहर की थी इसलिए शहर में घूमने के लिए 4-5 घंटे का वक़्त था। इस दौरान मैं बाहर शहर में थोड़ा घूमा और पास के ढाबे में दाल-रोटी खाई।  पठानकोट मुझे अपना सा क्यों लगा, इसके जवाब में माँ की स्मृतियाँ छिपी हैं ।   

पंजाब से हमारा बहुत पुराना रिश्ता है। और उस रिश्ते की नींव में हैं माँ  की यादें। पंजाब के बारे में मैंने सबसे पहले माँ  से ही सुना था। वह जगह जहाँ माँ  ने अपने  किशोर जीवन को बिताया था। जालंधर की सैनिक छावनी के चित्र हमारे सामने माँ के उकेरे हुए शब्दचित्रों के ज़रिए ज़ेहन में बसे हुए हैं। हमारे  नानाजी कॉमर्स कॉलेज की अपनी अध्यापक की नौकरी छोड़कर 1962 में भारतीय सेना में कमीशंड अधिकारी चुने गए थे। वे एन.सी.सी. से पहले से जुड़े हुए थे, इसलिए भारत-चीन युद्ध की अक्रांत घड़ी में उनका सेना में शामिल होना स्वाभाविक ही था। नाना-नानी की पहली  संतान होने के नाते माँ  के ऊपर न सिर्फ़ अपनी पढ़ाई का दायित्व था बल्कि अपने छोटे भाई-बहनों को संभालने की बड़ी ज़िम्मेदारी भी थी। नाना-नानी ( स्व. श्री  रामदेव मिश्र और स्व. श्रीमती  गिरिजा देवी) की पाँच संताने थीं – तीन बेटियाँ ( हमारी माँ स्व. श्रीमती विद्या तिवारी, मौसी स्व. श्रीमती कुसुम तिवारी;  श्रीमती ललिता त्रिवेदी) और दो बेटे (मामा श्री सुधांशु मिश्र और स्व. श्री विभांशु मिश्र [गोपालजी]) ।  नाना जी की नौकरी फ़ौज में होने के बाद माँ  ने अपनी स्कूली शिक्षा पंजाब और जम्मू के नगरों में पूरी की। नानी के घरेलू  कामकाज में हाथ बंटाने से लेकर बड़ी बहन की भूमिका माँ  ने बख़ूबी निभाई।

1980 के दशक में टीवी के  दूरदर्शन चैनल पर एक धारावाहिक आता था जिसका नाम था – साँझा चूल्हा। पंजाबी लेखक बलवंत गार्गी द्वारा लिखित इस टीवी सीरियल का शीर्षक गीत सुनते ही माँ  के आँखों की चमक देखते बनती थी। शुक्र है रब्बा, साँझा चूल्हा जलेया…….

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साँझा चूल्हा

पंजाब की लोक परम्परा साँझा चूल्हा पर आधारित यह टी.वी सीरियल पंजाब की औरतों के एक साथ मिलकर रोटियां बनाने की क़वायद के ऊपर केंद्रित था। माँ  हमें बताती थी कि पंजाब में उन्होंने इसे ख़ुद अपनी आँखों से देखा था।  कैसे औरतें अपने-अपने घरों से आटा लेकर आती थीं और साथ मिलाकर एक ही चूल्हे पर रोटियां पकाती थीं। कहा जाता है कि सिख घर्मगुरू गुरूनानक देव जी ने साँझा चूल्हा की परम्परा शुरू करवाई थी। उनकी मंशा थी कि लोग इस बहाने  जात-पात से ऊपर उठकर एक दूसरे से मिले और साथ मिलकर रोटियाँ पकाएँ। हमारे लिए यह सब एकदम नया और अनोखा था, एक दूसरी दुनिया-सा।  मुझे गर्व था कि मेरी माँ एक दूसरी दुनिया में रहकर आई थी।

2007  से 2011 के दौरान जब-जब वे मेरे साथ रहने आगरे आती तब , हम लोग पंजाबी / पहाड़ी लोक गीत बहुत चाव से सुनते। उन दिनों मैंने काँगड़ी बोली पर शब्दकोश बनाने का काम शुरू किया था।  हिमाचल के  पहाड़ी लोक गीत पर आधारित मोहित चौहान का ‘माये नि मेरिये’  मुझे बहुत पसंद था। गाना तो मैं बड़े शौक़ से सुनता था लेकिन पूरा मतलब नहीं समझता था। 2009 में माँ जब मेरे साथ रहने आईं तो मैंने उन्हें यह गीत सुनाया। माँ  ने ही मुझे इस गाने का सही मतलब समझाया। माँ  ने मुझे बताया कि इस गाने में एक लड़की अपनी माँ को बता रही है कि उसे अब शिमला की राहें रास नहीं आतीं क्योंकि उसे चम्बा के रहनेवाले वाले एक लड़के से प्यार हो गया है, और वह चम्बा जाना चाहती है। माँ  ने मुझे इस गाने के बोल लिखवाये थे –

माये नि मेरिये

शिमले दी राहें, चम्बा कितनी इक दूर?

(ओह मेरी प्यारी माँ शिमला की राहों से चम्बा कितनी दूर है ?)

ओये शिमले नी वसना  कसौली नी वसना  

चम्बे जाणा ज़रूर

(मुझे शिमला में नहीं बसना है , कसौली में भी नहीं बसना , मुझे ज़रूर चम्बा जाना है।)  

ओये लाइया मोहब्बता दूर दराजे, हाय

अँखियाँ ते होया कसूर

(मैंने  बहुत दूर अपने प्यार को पाया है, ये मेरी आँखों  का कसूर है)

ओये मैं ता माही वतन नु जांसा

ओ मेरी अंखिया दा नूर

(मैं अपने प्रेमी के देश जाना चाहती हूँ, वही मेरी आँखों की रोशनी है।)  

माये नि मेरिये

शिमले दी राहें, चम्बा कितनी इक दूर?

(ओह मेरी प्यारी माँ शिमला की राहों से चम्बा कितनी दूर है ?)

कभी-कभी सोचता हूँ की वह समय फिर कब लौटेगा?  कितना कुछ जानना – सीखना था माँ  से, लेकिन समय उन्हें हम से बहुत दूर ले गया। न जाने कितनी बातें माँ  हमें बताना चाहती थीं। अपनी कोख में नौ महीने रखकर पाल पोसकर बड़ा करने वाली माँ अपने पीछे कितनी मधुर यादें और सुखद पल छोड़ गई। जीवन नश्वर है यह हम सब जानते हैं लेकिन अपनों से बिछुड़ने के बाद इस सच्चाई  से मुँह मोड़ने को जी चाहता है।          

साल 2017 बहुत दुःख भरा रहा।  इस साल 19 फरवरी को हमारे प्यारे पापा भी  हमें छोड़कर हमेशा-हमेशा के लिए चले गए। मम्मी और पापा की बस अब यादें ही शेष हैं। 

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अभिषेक    

कटोरी नहीं झील

Bowl & Lake

एक बार एक आदमी किसी साधू के पास पहुँचा।

‘गुरू जी, मैं अपनी ज़िंदगी से बहुत परेशान हूँ, कृपया इस परेशानी से निकलने का तरीका बताएँ’, आदमी बोला।

साधू बोले, ‘पानी की कटोरी में एक मुट्ठी नमक डालो और उसे पियो।’

आदमी ने ऐसा ही किया।

‘इसका स्वाद कैसा लगा?’, साधू ने पूछा।

‘बहुत ही खराब… एकदम खारा,’  आदमी थूकते हुए बोला।

साधू मुस्कुराते हुए बोले, ‘एक बार फिर अपने हाथ में एक मुट्ठी नमक ले लो और मेरे पीछे-पीछे आओ।’

दोनों धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे और थोड़ी दूर जाकर साफ़ पानी से बनी एक झील के सामने रुक गए।

‘चलो, अब इस नमक को पानी में डाल दो’, साधू ने आदेश दिया।

आदमी ने ऐसा ही किया।

‘अब इस झील का पानी पियो’, साधू बोले।

आदमी पानी पीने लगा।

एक बार फिर साधू ने पूछा, ‘बताओ इसका स्वाद कैसा है, क्या अब भी तुम्हें ये खारा लग रहा है?’

‘नहीं, ये तो मीठा है, बहुत अच्छा है’, आदमी बोला।

साधू आदमी के बगल में बैठ गए और उसका हाथ थामते हुए बोले, ‘जीवन के दु:ख बिलकुल नमक की तरह हैं, न इससे कम न ज्यादा। जीवन में दुख की मात्रा वही रहती है, बिलकुल वही लेकिन हम कितने दुख का स्वाद लेते हैं यह इस पर निर्भर करता है कि हम उसे किस बरतन में डाल रहे हैं। इसलिए जब तुम दुखी हो तो सिर्फ इतना कर सकते हो कि खुद को बड़ा कर लो… कटोरी मत बने रहो,  झील बन जाओ।

सौन्दर्य की अनुभूति क्या है?

यह 12 जनवरी 2007 की घटना है। एक आदमी ने वॉशिंगटन डीसी के लेएन्फांत मेट्रो स्टेशन पर खड़ा होकर वायलिन बजाना शुरू कर दिया। यह एक ठंडी जनवरी की सुबह थी। उसने 43 मिनट के लिए क्लासिकल संगीत के छह तराने बजाए। उस दौरान, क्योंकि यह सुबह का समय था, यह गणना की गई कि हज़ारों लोग स्टेशन से गुज़र गए, और उनमें से ज्यादातर अपने काम पर जा रहे थे।

तीन मिनट के बाद एक अधेड़ आदमी ने देखा कि वहाँ एक संगीतकार वायलिन बजा रहा था। उसने अपनी गति को धीमा किया और कुछ सेकंड के लिए रुका और फिर जल्दबाजी में वहाँ से चला गया।

एक मिनट बाद, वायलिन वादक ने अपनी पहली डॉलर टिप प्राप्त की : एक औरत ने चलते हुए बिना रुके पैसा फेंक दिया था।

कुछ ही मिनटों के बाद, कोई उसे सुनने के लिए दीवार साथ खड़ा हो गया, लेकिन उस आदमी ने अपनी घड़ी को देखा और फिर से चलना शुरू कर दिया। स्पष्ट रूप से उसे काम के लिए देर हो चुकी थी।

जिसने सबसे अधिक ध्यान दिया वह एक 3 साल का लड़का था। उसकी माँ उसे जबर्दस्ती खींचते हुए ले गई लेकिन बच्चा वायलिन बजानेवाला को देखने के लिए बार-बार रुक रहा था।

अंत में माँ ने जोर का धक्का दिया और बच्चे ने अपने सर को बार-बार घुमाकर चलना जारी रखा। यह हरकत कई अन्य बच्चों द्वारा दोहराई गई। सभी माता-पिताओं ने बिना अपवाद उन्हें ले जाने के लिए मजबूर किया।

संगीतकार द्वारा बजाए गए 43 मिनट के संगीत में, केवल 6 लोग थोड़ी देर के लिए रुके थे। करीब 20 ने उसे पैसे दिए लेकिन उन्होंने अपने सामान्य गति से चलना जारी रखा। संगीतकार ने कुल 32 $ एकत्र किए। जब बजाना समाप्त हो गया और शांति छा गई, तब किसी ने भी ध्यान नहीं दिया। ना तो किसी ने सराहना की, और न ही वहाँ किसी ने भी संगीतकार को पहचाना।

कोई यह नहीं जानता था कि वह वायलिन बजानेवाला योशुआ बेल, दुनिया के शीर्ष संगीतकारों में से एक था। उसने वहाँ अपनी एक सबसे जटिल रचना को 3।5 मिलियन डॉलर मूल्य वाले एक वायलिन पर बजाया था जिसे 1713 में बनाया गया था।
मेट्रो स्टेशन में बजाने के दो दिन पहले, योशुआ बेल का एक शो के लिए बोस्टन एक थिएटर पूरा बुक हुआ था और प्रत्येक सीट 100 $ में खरीदी गई थी।

यह एक सच्ची कहानी है। योशुआ बेल ने बेल मेट्रो स्टेशन में गुप्त रूप से अपना संगीत बजाया था।

लोगों की धारणा, मिज़ाज, और उनकी प्राथमिकताओं के बारे में यह सामाजिक प्रयोग वाशिंगटन पोस्ट द्वारा आयोजित किया गया था। इसका उद्देश्य यह जानना था कि किसी सामान्य वातावरण में किसी अनुचित समय के दौरान क्या हम सौंदर्य को पहचानते हैं?

क्या हम सराहना करने के लिए रुकते हैं? क्या हम एक अप्रत्याशित संदर्भ में प्रतिभा को पहचानते हैं?

इस अनुभव से संभवत: एक निष्कर्ष निकाला जा सकता है: अगर दुनिया के सबसे अच्छे संगीतकारों में से एक संगीतकार, जो उसका सबसे बेहतरीन संगीत बजा रहा था, को सुनने के लिए हम एक पल नही ठहर सकते। तो कल्पना कीजिए हम दिन-प्रतिदिन कितनी चीज़ों से वंचित हो रहे हैं?

’Leisure’ by W। H। Davies

WHAT is this life if, full of care,

We have no time to stand and stare?—

No time to stand beneath the boughs,

And stare as long as sheep and cows:

No time to see, when woods we pass,

Where squirrels hide their nuts in grass:

No time to see, in broad daylight,

Streams full of stars, like skies at night:

No time to turn at Beauty’s glance,

And watch her feet, how they can dance:

No time to wait till her mouth can

Enrich that smile her eyes began?

A poor life this if, full of care,

We have no time to stand and stare.