Mandalay in Popular Imagination

U Bein Bridge Transportation at Sunset

Two people crossing U Bein Bridge, at sunset, Amarapura near Mandalay, Myanmar

The second biggest city in Myanmar (Burma) after Yangon (old name – Rangoon) is Mandalay. It sits right in the middle of Myanmar by the bank of river Irrawaddy. It was founded by king Mindon Min in 1857, and was the seat of Burmese royal government  for nearly 26 years before its annexation by the British Empire. Mandalay is also know as the golden city because of it numerous gold tipped pagodas. It is further believed that Lord Buddha visited Mandalay hills, and has prophesied that in the year 1857, a grand city would be established here and it would be an important center of Theravada Buddhism.   

Myanmar Temple Burma Mandalay Pagoda Stupa

mandalay in Myanmar

Rudyard Kipling -  Indian-born British writer.

Rudyard Kipling

Mandalay remains as a nostalgic place of  ”Far East” in popular imagination in the west. Credit for this goes to celebrated Indian born British writer and poet Rudyard Kipling (1865 – 1936). Mandalay was immortalized by  Kipling’s poem ‘Mandalay’ which appeared in the literary weekly The Scots Observer on 21 June 1890. An excerpt is presented below –

mandalay

The setting of the poem has been articulated  well by Andrew Selth (2015) 

” Mandalay, a poem of six stanzas in which a former British soldier, discharged from military service and working in a London bank, reviews his experiences during the recent Burma campaign. He expresses his longing for a young Burmese girl, who is described as waiting in idyllic surroundings for her sweetheart to return. This poem, with its timeless themes of idealised romance, cultural fusion and exotic locales, was in large part a reaction to Kipling’s new life in the UK, which he found in stark contrast to sunlit India. “

Although Kipling forever romanticized Mandalay as an exotic and an overtly beautiful place in the ”Far East”, the actual town was not taken in his stride by others such as George Orwell (1903 – 1950), a famous British Writer and critic. Orwell worked as a policeman in Burma, and he described Mandalay as a town of 5 Ps – Pagodas, Pariahs, Pigs, Priests and Prostitutes. 

Despite contrary point of views on Mandalay, it has never failed to conjure up the popular imagination. In her non-fiction book ”Finding George Orwell in Burma” (2011) Emma Larkin retraces George Orwell’s footsteps during the five years he served as a colonial police officer in what was then a province of British India. Emma Larkin writes –

I always find it impossible to say the name ‘Mandalay’ out loud without having at
least a small flutter of excitement. For many foreigners the name conjures up irresistible images of lost oriental kingdoms and tropical splendor. The unofficial Poet Laureate of British colonialism, Rudyard Kipling, is partly responsible for this, through his well-loved poem ‘Mandalay’.

Further impetus to this popular romanticized imagination of Mandalay has been given by British singer Robbie Williams through his song , The Road to Mandalay released in July 2001. The lyrics of The Road to Mandalay were written as a tribute to Williams’ close friendship with Geri Halliwell, an ex-member of famous girl band Spice Girls, and was the 20th best selling single of 2001 in the UK.

Even though much water has flowed through river Irrawaddy, but Mandalay still conjures the images of a mystic city in the far east where one falls in love.

 

References

Selth, Andrew. Kipling, “Mandalay” and Burma in the Popular Imagination, Working Paper No.161 (Southeast Asia Research Centre, City University of Hong Kong, Hong Kong SAR, 2015)

Larkin, Emma. Finding George Orwell in Burma. New York: Penguin, 2011. Print.

 

Poems from Punjab

इक कुड़ी जिदा नाम मोहब्बत, गुम है, गुम है, गुम है।
“A girl whose name is love, is missing, is missing, is missing”
Shiv Kumar Batalvi ((23 July 1936 – 7 May 1973)
A famous Punjabi language poet with a folk consciousness and modern sensibility, Shiv Kumar excelled with a freshness of vocabulary, diction, imagery and rhythmic flow of words which remain unparalleled in Punjabi poetry. Shiv was born in a village near Sialkot (Pakistan). His family moved to Batala, Gurdaspur (India) after Indian partition in 1947. The pangs of this separation are recurrent themes of this great poet of the land. One of my current favorites composed by Shiv Kumar Batalvi is ”ik kudi jida naam mohabbat, gum hai gum hai” sung by Shahid Mallya in his beautiful voice. From the soundtrack of Udta Punjab (2016)

Bhojpuri Translation of Basava Anthology

basava

Pleased to know that Bhojpuri Translation of Basava Vachanamrutha (poems composed by Lord Basaveshwara in Kannada) is recently published by Basava Samithi, Bengaluru. The multilingual translation project was steered under the leadership of late Dr. M.M. Kulburgi. The principal editor of the Bhojpuri version is Late Prof. dr. B.S. Tiwary.
Lord Basava was a 12th-century Indian philosopher, statesman, Kannada poet, and was the founding saint of the Lingayat-Shaivism sect of Hinduism in Karnataka. Basava staunchly believed in a caste-less society where each individual had equal opportunity to rise up in life.

In the Kannada speaking region of India, the Bhakti social movement was started by Basavanna  in the 12th century in a society ridden by caste hierarchy. This Bhakti movement produced a rich treasure of literature that came to be known as Vachana sahitya created by Basava and his disciples (Akkamahadevi, Allama Prabhu, Devara Dasimayya etc.). The poems of this stream of literature contained pithy aphorisms, and conveyed in unambiguous terms precise and astute observations on spiritual and social matters of life.

The Website of Basava Samithi from where you can order the book is here

http://www.basavasamithi.org/

 

कुछ बोध कथाएँ

अपनी झोली

Group_of_Thugs

दो आदमी यात्रा पर निकले। दोनों की मुलाकात हुई। दोनों यात्रा में एक साथ जाने लगे। दस दिनों के बाद दोनों के अलग होने का समय आया तो एक ने कहा, ‘भाईसाहब! एक दस दिनों तक हम दोनों साथ रहे। क्या आपने मुझे पहचाना?’ दूसरे ने कहा, ‘नहीं, मैंने तो नहीं पहचाना।’ वह बोला, ‘माफ़ करें मैं एक नामी ठग हूं। लेकिन आप तो महाठग हैं। आप मेरे भी उस्ताद निकले।’

‘कैसे?’ ‘कुछ पाने की आशा में मैंने निरंतर दस दिनों तक आपकी तलाशी ली, मुझे कुछ भी नहीं मिला। इतनी बड़ी यात्रा पर निकले हैं तो क्या आपके पास कुछ भी नहीं है? आप बिल्कुल ख़ाली हाथ हैं?’

‘नहीं, मेरे पास एक बहुत क़ीमती हीरा है और एक सोने का कंगन है ।’

‘तो फिर इतनी कोशिश के बावजूद वह मुझे मिले क्यों नहीं?’

‘बहुत सीधा और सरल उपाय मैंने काम में लिया। मैं जब भी बाहर जाता, वह हीरा और सोने का कंगन तुम्हारी पोटली में रख देता था। तुम सात दिनों तक मेरी झोली टटोलते रहे। अपनी पोटली संभालने की जरूरत ही नहीं समझी। तुम्हें मिलता कहाँ से?’

कहने का मतलब यह कि हम अपनी गठरी संभालने की ज़रूरत नहीं समझते। हमारी निगाह तो दूसरों की झोली पर रहती है। यही हमारी सबसे बड़ी समस्या है। अपनी गठरी टटोलें, अपने आप पर दृष्टिपात करें तो अपनी कमी समझ में आ जाएगी।

 सीमा

Old Woman India

सड़क किनारे एक बुढ़िया अपना ढाबा चलाती थी। एक यात्री आया। दिन भर का थका, उसने विश्राम करने की सोची। बुढिया से कहा, ‘क्या रात के लिए यहाँ आश्रय मिल सकेगा?’ बुढिया ने कहा, क्यों नहीं, आराम से यहां रात भर सो सकते हो।’

यात्री ने पास में पड़ी चारपाइयों की ओर संकेत कर कहा, ‘इस पर सोने का क्या चार्ज लगेगा?’ बुढ़िया ने कहा, ‘चारपाई पर सोने के लिए दस रूपए लगेंगे।’ यात्री ने सोचा रात भर की ही तो बात है। बेकार में दस रूपए क्यों खर्च की जाए। आंगन में काफी जगह है, वहीं सो जाऊंगा।

यह सोचकर उसने फिर कहा, ‘और अगर चारपाई पर न सोकर आंगन की ज़मीन पर ही रात काट लूँ तो क्या लगेगा?’ ‘फिर पूरे सौ रूपए लगेंगे -‘ बुढ़िया ने कहा।

बुढ़िया की बात सुन यात्री को उसके दिमाग पर संदेह हुआ। चारपाई पर सोने के दस रूपए और भूमि पर चादर बिछाकर सोने के लिए सौ रूपए – यह तो बड़ी विचित्र बात है। उसने बुढिया से पूछा, ‘ ऐसा क्यों?’

बुढ़िया ने कहा, ‘चारपाई की सीमा है। तीन फुट चौड़ी, छह फुट लंबी जगह ही घेरोगे। बिना चारपाई सोओगे तो पता नहीं कितनी जगह घेर लो।’ सीमा में रहना ही ठीक है। असीम की बात समस्या पैदा करती है।

भारतीय नरक

indian hell

एक बार एक भारतीय व्यक्ति मरकर नरक में पहुँचा,
तो वहाँ उसने देखा कि प्रत्येक व्यक्ति को किसी भी देश के नरक में जाने की छूट है ।
उसने सोचा, चलो अमेरिकावासियों के नरक में जाकर देखें, जब वह वहाँ पहुँचा तो द्वार पर पहरेदार से उसने पूछा – क्यों भाई अमेरिकी नरक में क्या- क्या होता है ? पहरेदार बोला – कुछ खास नहीं, सबसे पहले आपको एक इलेक्ट्रिक चेयर पर एक घंटा बैठाकर करंट दिया जायेगा, फ़िर एक कीलों के बिस्तर पर आपको एक घंटे लिटाया जायेगा, उसके बाद एक यमदूत आकर आपकी जख्मी पीठ पर पचास कोड़े बरसायेगा…
बस! यह सुनकर वह व्यक्ति बहुत घबराया औरउसने रूस के नरक की ओर रुख किया, और वहाँ के पहरेदार से भी वही पूछा, रूस के पहरेदार ने भी लगभग वही वाकया सुनाया जो वह अमेरिका के नरक में सुनकर आया था । फ़िर वह व्यक्ति एक- एक करके सभी देशों के नर्कों के दरवाजे जाकर आया, सभी जगह उसे एक से बढकर एक भयानक किस्से सुनने को मिले । अन्त में थक- हार कर जब वह एक जगह पहुँचा, देखा तो दरवाजे पर लिखा था “भारतीय नरक” और उस दरवाजे के बाहर उस नरक में जाने के लिये लम्बी लाईन लगी थी, लोग भारतीय नरक में जाने को उतावले हो रहे थे, उसने सोचा कि जरूर यहाँ सजा कम मिलती होगी…
तत्काल उसने पहरेदार से पूछा कि यहाँ के नरक में सजा की क्या व्यवस्था है ? पहरेदार ने कहा – कुछ खास नहीं…सबसे पहले आपको एक इलेक्ट्रिक चेयर पर एकघंटा बैठाकर करंट दिया जायेगा, फ़िर एक कीलों के बिस्तर पर आपको एक घंटे लिटाया जायेगा, उसके बाद एक यमदूत आकर आपकी जख्मी पीठ पर पचास कोड़े बरसायेगा… बस !

चकराये हुए व्यक्ति ने उससे पूछा – यही सब तो बाकी देशों के नरक में भी हो रहा है, फ़िर यहाँ इतनी भीड क्यों है ? पहरेदार बोला – इलेक्ट्रिक चेयर तो वही है, लेकिन बिजली नहीं है, कीलों वाले बिस्तर में से कीलें कोई निकाल ले गया है, और कोड़े मारने वाला यमदूत सरकारी कर्मचारी है, आता है, दस्तखत करता है और चाय-नाश्ता करने चला जाता है…औरकभी गलती से जल्दी वापस आ भी गया तो एक-दो कोड़े मारता है और पचास लिख देता है…चलो आ जाओ अन्दर !!

 

द शॉप ऑन द मेन स्ट्रीट (1989)

shoponmainstreet

अभी कुछ दिन हुए मैंने  एक चेक-स्लोवाक भाषा में बनी फ़िल्म देखी – Obchod na Korze  यानी अंग्रेज़ी में ‘द शॉप ऑन द मेन स्ट्रीट (The Shop on the Main Street)’। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान स्लोवाकिया के एक छोटे-से शहर के जीवन पर आधारित यह फ़िल्म ऑस्कर जीतने वाली पहली चेक और स्लोवाक फ़िल्म थी।  इस श्वेत-श्याम फ़िल्म  की कहानी वर्ष 1942 की है जब स्लोवाकिया पर नात्सी जर्मनी की कठपुतली और तानाशाही सरकार का शासन था। फ़िल्म का मुख्य किरदार टोनो ब्रत्को  एक सीधा-सादा बढ़ई है। ब्रत्को को उसका फ़ासीवादी साढ़ू जो कि एक पुलिस अधिकारी है, चालबाज़ी से एक बूढ़ी और ऊँचा सुनने वाली यहूदी महिला श्रीमती लाउटमान की बटनों की दूकान का आर्य स्वामी बनवा देता है। ज्ञात हो कि नात्सी शासन के दौरान जर्मनी, पोलैण्ड, चेकोस्लोवाकिया, ऑस्ट्रिया समेत यूरोप के कई देशों में एक क़ानून के तहत यहूदी व्यापारिक प्रतिष्ठानों का मलिकाना हक़ स्थानीय (तथाकथित) आर्य समुदाय के चुने हुए लोगों को सौंप दिया गया था। इसका मतलब था कि नात्सी शासन के क़ानून के मुताबिक हर यहूदी दूकान मालिक के लिए एक आर्य स्वामी का होना अनिवार्य था।  टोनो एक जिंदादिल इंसान है जो उसके देश में हो रही फ़ासीवादी क्रांति से सहमत नहीं है। टोनो का साढ़ू जब उसके घर महँगी शराब लिए रात के खाने पर आता है, तो टोनो शराब के नशे में अडोल्फ़ हिटलर की नकलकर उसका मखौल उड़ाता है। फ़िल्म का यह दृश्य अपने-आप में अनोखा –

 

फ़िल्म में शहर की मुख्य सड़क पर विधवा महिला श्रीमती लाउटमान की बटन व लेस की एक पुरानी दूकान है।  यह बात उस समय से कुछ ही पहले की है जब नात्सी शासन द्वारा यहूदी मूल के लोगों को यूरोप भर से जबरन यातना शिविरों में भेजना शुरू हुआ था। भोलाभोला टोनो जब पहली बार श्रीमती लाउटमान की दुकान पर अपना कब्जा लेने आता है तो वृद्ध महिला पहले उसे ग्राहक समझती, फिर टैक्स जमा करने वाला और अंत में एक बेरोज़गार आदमी। इस दौरान टोनो उन्हें समझाने कि कई दफ़ा कोशिश करता है कि वह दुकान का आर्य स्वामी। पर बुढ़िया समझे तब तो बात आगे बढ़े। अगले दिन से टोनो श्रीमती लाउटमान के पुराने जर्जर हो चुके फ़र्नीचर को दुरुस्त करने में लग जाता है। दरअसल फ़िल्म उस मानवीय रिश्ते की दास्तान है जो टोनो ब्रत्को और श्रीमती लाउटमान के मध्य विकसित होता है। मानवीय संबंध किस प्रकार इन अमानवीय, क्रूर और कठिन परिस्थितियों  में विकसित होते हैं। एक सीधा-सादा आदमी अपने आप को कैसे इन परिस्थितियों में अपने-आपको बेबस पाता है, यह आप इस मर्मस्पर्शी फ़िल्म में देख सकते हैं।

फ़िल्म में मुख्य भूमिकाएँ निभाई हैं – इदा कमिन्स्का (श्रीमती लाउटमान), जोज़ेफ़ क्रोनर (टोनो ब्रत्को) और हाना सिल्व्कोवा ( टोनो की पत्नी)।

फ़िल्म के निर्देशक हैं – यान क़ादर

इस्मत और एनी (एक वृत्त चित्र)

एनी आपा का मैं काफ़ी अरसे से प्रशंसक रहा हूँ और उनकी कहानियों ने हमेशा मुझे सोचने की ख़ुराक दी है। कौन एनी आपा? हमारी क़ुर्रतुल एन. हैदर को उनके चाहने वाले एनी आपा नाम से बुलाते हैं। एनी आपा और इस्मत चुग़तई पर बनी इस छोटी से फ़िल्म से जब रूबरू हुए तो महसूस हुआ कि कितनी शिद्दत से इन दोनों हस्तियों ने भारतीय साहित्य को सजाया-सँवारा है।

ताजदार-ए-हरम

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भारत और पाकिस्तान के बहुत सारे लोगों के दिलों में अगर कोई क़व्वाली बहुत ख़ास जगह रखती है, तो वह ताजदार-ए-हरम  है। ताज़दार-ए-हरम को लिखने वाले थे जनाब ‘पुरनम इलाहाबादी’ (उर्फ़ ‘मुहम्मद मूसा’) और इसे पहली बार पाकिस्तान के मशहूर कव्वाली गायक ‘साबरी भाइयों‘ ने 1990 में गाया था।  काफ़ी अरसे पहले मैंने इस क़व्वाली को पहली बार हमारे पारिवारिक दर्ज़ी अब्दुल चाचा की दुकान पर सुना था। 2015 में कोक स्टूडियो के सीज़न 8 में इसे बड़ी शिद्दत से  आतिफ़ असलम ने फिर से गाया है। ताजदार-ए-हरम  एक नातिया कलाम है जिसमें भरपूर आस्था और मुहब्बत के साथ परमेश्वर को याद किया गया है। एक बेहतरीन इस्लामी भक्ति गीत। लेखक बार-बार यही कह रहा है कि हे परमेश्वर अपनी दया दृष्टि मुझ पर डालिए, आपके दरवाज़े से कोई ख़ाली नहीं जाता।

पवित्र शहर मदीना (सऊदी अरब) के लिए लेखक की भक्ति आत्मसात कर देने वाली है (क्या कहेगा जहाँ, आपके दर से अगर ख़ाली जाएँगे?) 

यह कहना लाज़िमी होगा कि यह कलाम भारत-पाकिस्तान की साझी संस्कृति की एक अमूल्य विरासत है।

इस नातिया कलाम के शुरूवाती बोल हैं – 

 

क़िस्मत में मेरी चैन से जीना लिख दे 
डूबे ना कभी मेरा सफ़ीना लिख दे 
जन्नत भी गवारा है मगर मेरे लिए

ए क़ातिब-ए-तक़दीर मदीना लिख दे 
ताजदार-ए-हरम हो निगाह-ए-करम 
हम ग़रीबों के दिन भी सँवर जायेंगे 
हामीं-ए बेकसाँ क्या कहेगा जहाँ
आपके दर से ख़ाली अगर जायेंगे

ताजदार-ए-हरम, ताजदार-ए-हरम

कोई अपना नहीं ग़म के मारे हैं हम

आपके दर पर फ़रयाद लाये हैं
हो निगाहे-ए-करम, वरना चौखट पे

हम आपका नाम ले-ले मर जाएँगे।

ताजदार-ए-हरम, ताजदार-ए-हरम

 

Romanized with English translation

Kismat me meri chain se jeena likhde
Let a life of peace and contentment be my fate

Doobe nah kabhi mera safeenah likh de
May my ship never sink even in troubled waters – let this be my fate

Jannat bhi gawarah hai magar mere liye
It’s not that heaven would not be acceptable to me, but

Ae kaatib-e taqdeer madina likh de
O write of destiny, let Madina (City to which Prophet Mohammad came from Mecca, PBUH) be my fate

Tajdar-e-haram, ho nigaah-e-karam
O king of the holy sanctuary, bless us with your merciful gaze

Hum ghareebon ke din bhi sanwarjayenge
So that our days of woe may turn for the better

Haami-e-be-kasaan kya kahega jahan
O patron of the poor, what would the world say

Aapke darr se khaali agar jayenge
If we return empty-handed from your door?

Tajdar-e-haram Tajdar-e-haram
O king of the holy sanctuary

Koi apna nahi gham ke maaray hain hum
We have no one to call our own, we are stricken with greif

Aapke darr pe faryaad laaye hain hum
We come and cry for justice at your door

Ho Nigah-e-karam, warna chokhat pe hum
Please spare us a merciful glance, or we will

Aapka naam le le ke marjayenge
Die at your threshold, crying your name

Tajdar-e-haram Tajdar-e-haram
O king of the holy sanctuary

आतिफ़ असलम की आवाज़ में

 

साबरी भाईयों की आवाज़ में