यात्रा के पन्ने (1952) – राहुल सांकृत्यायन

Tibetans

Tibet in 1930.

राहुल सांकृत्यायन का यात्रा संस्मरण ‘यात्रा के पन्ने‘ (1952, साहित्य सदन, देहरादून)

राहुल सांकृत्यायन (1893-1963) मेरे पसंदीदा लेखकों में से एक हैं।  राहुल को हिन्दी में घुमक्कड़ शास्त्र का प्रणेता माना जाता है। उनके लिखे यात्रा वृत्तांत आपको बरबस ही उस प्रदेश के लोगों और उनकी भाषा-संस्कृति से जोड़ते हैं, जहाँ से आप शायद ही गुज़रे हों। राहुल हमेशा घुमक्कड़ ही रहे। सन्‌ 1923 से उनकी विदेश यात्राओं का सिलसिला शुरू हुआ तो फिर उनके सफ़र का अंत उनके जीवन के साथ ही हुआ। ज्ञान की खोज में की गईं उनकी इन यात्राओं में श्रीलंका, तिब्बत, जापान और रूस की यात्राएँ ख़ास हैं। वे चार बार तिब्बत गए। वहाँ लम्बे समय तक रहे और भारत की उस प्राचीन बौद्धिक विरासत का उद्धार किया, जो हमारे लिए अज्ञात, अलभ्य और विस्मृत हो चुकी थी।अध्ययन-अनुसंधान की आभा के साथ वे वहाँ से प्रभूत सामग्री लेकर लौटे जो भारतीय धर्म, दर्शन और भाषाविज्ञान के लिए अमूल्य हैं।भारत के संदर्भ में उनका यह काम चीनी खोजी यात्री ह्वेनसांग से कम नहीं आँका जा सकता।  सूदूर देशों की यात्राओं की तरह उनके जीवन में उनकी एक वैचारिक यात्रा की ओर भी संकेत मिलता है, जो पारिवारिक स्तर पर स्वीकृत वैष्णव मत से शुरू हो, आर्य समाज एवं बौद्ध मतवाद से गुजरती हुई मार्क्सवाद पर जाकर खत्म होती है।

1952 में छपे राहुल सांकृत्यायन के यात्रा संस्मरण संग्रह (‘यात्रा के पन्ने’, कुल 450 पृष्ठ) की एक बहुत पुरानी प्रति मेरे हाथ लगी तो मैं उसे सार्वजनिक रूप से आप सबसे बाँटने का लोभ संवरण नहीं कर सका। आप इस किताब की पी.डी.एफ़ प्रति यहाँ से मुफ़्त डाउनलोड कर सकते हैं। 

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ओला डायरी # 1

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सुबह के ठीक साढ़े आठ बज रहे हैं। मैसूरू जानेवाली 11 बजे की शताब्दी एक्सप्रेस लेने के लिए हमने सुबह थोड़ा जल्दी ही निकलने का फ़ैसला किया है। बंगलुरू के ट्रैफ़िक और बसों की हड़ताल का असर सड़कों पर दिखने का अंदेशा है। ओला वालों को उनके एप पर जे.पी. नगर आने का संदेश दे दिया है। मकान से बाहर निकलते देखा कि बाहर ओला टैक्सी हमारा इंतज़ार कर रही है। गाड़ी कोई ख़ास बड़ी नहीं है – इंडिका – वी 2 है।  बहन टैक्सी वाले से कन्नड़ में कुछ कहती है। शायद यह कि हमें कहाँ जाना है, और ट्रेन का समय वग़ैरह। हम लोग टैक्सी में बैठते। बच्चे अपनी माँ के साथ पीछे बैठे हैं और मैं ड्राइवर के साथवाली सीट पर। ड्राइवर मुझसे हिन्दी में पूछता है – आपको मैजिस्टिक जाना है सर? मैंने कहा – जी हाँ – वहीं बैंगलोर सिटी रेलवे स्टेशन। मैसूरु जानेवाली शताब्दी पकड़नी है।

कुछ दूर आगे बढ़ते ही बड़े अपार्टमेन्ट कॉमप्लेक्सों के अहाते से बाहर की दुनिया दिखाई दे रही। लोग चाय-नाश्ते की दुकानों पर खड़े हैं। आज रविवार है ऐसा लग नहीं रहा, सड़क पर काफ़ी भीड़ है। सड़कों के किनारे कचरा फैल रहा है। खाली पड़ी ज़मीन पर लोगों ने कचरे का अंबार लगा दिया है। मैं मन ही मन सोचता हूँ – भारत की तथाकथित सिलिकॉन वैली बैंगलोर में भी वही हाल है कचरे का – स्वच्छ भारत अभियान गया तेल लेने। पत्नी को कहता हूँ – look,  that is the main difference between ‘’here’’ and ‘’there’’.

मैं खिड़की से बाहर देख ही रहा हूँ कि अचानक मेरे कानों में कुछ अलग-सा सुनाई देता है – “तुमी कि कोरी आसे। मोइ ना जानू….

देखा तो ड्राइवर महोदय अपने इयरफ़ोन के द्वारा किसी से से फ़ोन पर बात कर रहे हैं। कुछ देर मैं बातचीत ख़त्म हो जाती है।

मैं पूछता हूँ – भैया आप आसाम से हैं?

ओला ड्राइवर – जी, आपको कैसे मालूम?

मैं कहता हूँ – भाल आसु भाईटी? आजिर बोतोर भाल आसे। हा हा हा, (हँसते हुए) आप फ़ोन पर अहोमिया में बात कर रहे थे न, इसलिए। और यहाँ डैशबोर्ड आपकी आईडी पर भी लिखा है – राज बोड़ो। आप बोड़ोलैंड से हैं। कोकराझार?

ओला ड्राइवर – आप अहोमिया समझते हैं? आपको तो आसाम के बारे में बहुत कुछ मालूम है सर। आप वहाँ गए हैं? मेरा घर कोकराझार के पास है ही है। मेरे मदर-फ़ादर और भाई लोग वहीं रहते हैं।

मैं कहता हूँ – हाँ दो-तीन बार गया हूँ – नोर्थ-ईस्ट के मेरे कई दोस्त रहे हैं। जब दिल्ली में पढ़ता था तब। शिलांग भी आना जाना लगा रहता है। मैं दो बार नागालैंड भी गया हूँ। आप यहाँ बैंगलोर कैसे आए?

ओला ड्राइवर – मेरी बड़ी बहन यहाँ रहती है। उसके पास 7 साल पहले यहाँ आया था। फिर कुछ दिन बाद गाड़ी चलाना सीख लिया। और अब अपनी गाड़ी ले ली। ये गाड़ी अपनी है। दो साल पहले ख़रीदी है। यहाँ नोर्थ ईस्ट के बहुत लोग रहते हैं। ड्राइविंग लाइन में बहुत कम हैं। बोड़ो में मैं शायद अकेला हूँ। मणिपुर के लोग होटेलिंग में बहुत काम करते हैं। ड्राइविंग में लोकल और तमिल ज़्यादा हैं।

मैं: बहुत बढ़िया, अच्छा काम किया। आप गाड़ी सिर्फ़ ओला के लिए चलाते हैं?

ओला ड्राइवर: नहीं नहीं – ओला का काम मैं सिर्फ़ सुबह या रात को लेता हूँ। बाक़ी टाइम में बी.एस.एन.एल के लिए काम करता हूँ। 11 बजे से काम शुरू होता है। मेरा ऑफ़िस मैंजिस्टिक के पास ही है, इसलिए ओला से आपकी भी सवारी ले ली।

मैं: आप बी.एस.एन.एल के दफ़्तर में काम करते हैं? क्या काम करते हैं?

ओला ड्राइवर: नहीं गाड़ी ही चलाता हूँ। बी.एस.एन.एल. को ये गाड़ी लीज़ पर दी है। हर दिन उनके इंजीनियर को लेकर जाना होता है।

मैं: अच्छा यह बहुत बढ़िया है। काफ़ी पैसे मिलते होंगे। इंजीनियर लोग कहाँ जाते हैं?

ओला ड्राइवर: यही टावर –बावर को देखने जाते हैं। कोई प्रोब्लेम होने से जाते हैं। एक दिन एक टावर तो देखते ही हैं। एक महीना का बीस हज़ार देते हैं। गाड़ी और डीज़ल मेरे अपने हैं। ओला और बी.एस.एन.एल जोड़कर एक महीने में 30-32 कमा लेता हूँ।

मैं: यह बहुत अच्छी बात है। आप यंग हैं और बहुत मेहनती हैं। और आप हिन्दी भी बहुत अच्छी बोलते हैं।

ओला ड्राइवर: बी.एस.एन.एल का काम मेरा तीन बजे तक ख़त्म हो जाता है। इंजीनियर लोग एक दिन में एक ही कंप्लेन देखते हैं। वहाँ से आने के बाद छुट्टी। चार बजे तक मैं घर वापिस आ जाता हूँ।

मैं: बहुत लंबा जाना पड़ता होगा आपको? इसमें तो बहुत डीज़ल जाएगा।

ओला ड्राइवर: नहीं बहुत लंबा नहीं। हर ऑफ़िस का अपना सर्किल है। उसी में जाना होता है। वैसे बंगलोर बहुत बड़ा शहर है। लंबा जाने से मुश्किल हो जाएगी।

मैं: अच्छा-अच्छा यह ठीक है। आप कन्नड़ बोल लेते हैं? मैंने सुना आप कन्नड़ बोल रहे थे?

ओला ड्राइवर: जी बोलता हूँ। यहाँ काम करने के लिए लैंग्वेज सीखना ज़रूरी है।

मैं: कन्नड़ कहाँ सीखी आपने?

ओला ड्राइवर: वो पहले जो मेरा मकान मालिक था ना, उन लोगों ने सिखाया मुझे। उसकी फ़ैमिली में सब लोग सिर्फ़ कन्नड़ और तेलुगु ही बोलते-समझते थे। इसलिए बोल-बोल के सीख गया। दो साल तक मेरे मकान मालिक ने मुझसे सिर्फ़ कन्नड़ में बात किया, फिर मैं सीख गया। अब बोल लेता हूँ।

मैं: यह तो कमाल की बात है। बहुत अच्छा। अभी कुछ साल पहले यहाँ लफ़ड़ा हुआ था ना, सब नोर्थ ईस्ट वालों को बैंगलोर से भागना पड़ा था। कुछ ख़ून-खराबा हुआ था। मुझे साल याद नहीं है।

ओला ड्राइवर: ये केस अगस्त 2012  का है सर। सब लोगों को यहाँ से भागना पड़ा था। लेकिन मैं नहीं गया। मेरा पुलिस में एक लोकल दोस्त है। उसने मुझे अपना नंबर देकर कहा कि कोई प्रोब्लेम होने पर फ़ोन करना। मैं वापस नहीं गया लेकिन बहुत सारे लोग भाग गए थे। सबके फ़ोन पर मैसेज आया था कि यहाँ रहने वाले नौर्थ ईस्ट के लोगों को मारना है। रेलवे ने स्पेशल ट्रेन भी चलवाई थी। कुछ मारपीट हुई थी लेकिन ज़्यादा लोग डर गए थे।

मैं: कौन मारना चाहता था?

ओला ड्राइवर : यहाँ के कुछ लोकल मोहम्मडन लोग। वहाँ आसाम में कोकराझार में दंगा हुआ। उसी का बदला यहाँ लेने का बात कर रहे थे। लेकिन ज़्यादा कुछ नहीं हुआ। यहाँ के लोकल कन्नडिगा और पुलिस ने बहुत कंट्रोल किया।  

मैं: चलिए अच्छी बात है। आप सब लोग सेफ़ है यहाँ पर।

ओला ड्राइवर: आप यहाँ घूमने आए हैं सर? कहाँ रहते हैं?

मैं: मेरी बहन यहाँ रहती है। हमलोग उसी से मिलने आए हैं। फ़िलहाल फ़ौरेन में रहते हैं।

ओला ड्राइवर : लीजिए आपका मैजिस्टिक आ गया।

मैं: कितने पैसे हुए? थैंक यू।

 

 

 

 

 

Temple of the Sun

About this massive monument, the great poet Rabindranath Tagore said –  “here the language of stone surpasses the language of man”. Situated at the eastern coast of India, the Konark Sun Temple was built by King Narsimhadeva I of Ganga dynasty in the 13th century. It was designed in the form of a gorgeously decorated chariot of Sun god mounted on 24 wheels , each about 10 feet in diameter, and drawn by 7 mighty horses. Sun temple of Konark is a masterpiece of Orissa’s medieval architecture. It is a UNESCO world hertiage monument.

Trivia

  • The Konark temple is also known for its erotic sculptures of maithunas.
  • In one of the panels at the temple, there is a depiction of giraffe being gifted by West Asian traders to the king of Odisha. It shows Odisha’s long history of trade with Africa and Arabia. Some other experts believe that this animal is Okapi or Dromedary (Arabian camel). 
  • In another panel, there is lady wearing Japanese style sandals (Geta Sandals), proving the maritime relation of Odisha with east & south-east Asia.
  • At present it is located two kilometers from the sea, but originally the ocean came almost up to its base. Until fairly recent times, the temple was close enough to the shore to be used as a navigational point by European sailors, who referred to it as the ‘Black Pagoda’.

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Temple is open for public from sunrise to sunset

Entrance Fees are as follows:

Citizens of India and visitors of SAARC (Bangladesh, Nepal, Bhutan, Sri Lanka, Pakistan, Maldives and Afghanistan) and BIMSTEC Countries (Bangladesh, Nepal, Bhutan, Sri Lanka, Thailand and Myanmar) – INR. 30 per head.

Citizen of other countries: US $ 5 or INR. 500/- per head

(children up to 15 years enter free)

How to reach?

Konark is connected by good all weather motorable roads. Regular Bus services are operating from Puri and Bhubaneswar. Besides Public transport Private tourist bus services and taxis are also available from Puri and Bhubaneswar.

 

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Sadhus of Ayodhya (India)

Ayodhya (Ayodhyā), also known as Saket, is an ancient city of India, believed to be the birthplace of lord Rama. and setting of the epic Ramayana. It is adjacent to Faizabad city at the south end in the Indian state of Uttar Pradesh. Ayodhya used to be the capital of the ancient Kosala Kingdom. I visited this holy city between 27 July to 5 August 2011 for our fieldwork on Awadhi variety of Hindi (for Hindi Dialects Dictionaries Project of Central Institute of Hindi, Agra). In Ayodhya, I had met several holy men (Sadhus) living or transiting through the city. They were from all around the country. Some from as far as Assam and Maharashtra. Apart from the wealth of information, we gained by talking with them, here are some pictures, I clicked of the Sadhus I met in this holy city.

Look at the styles of markings on forehead (known as ‘Tilak’) of each Sadhu. Sadhus distinguish among themselves by their special style of markings adopted by their respective schools.This Tilak is traditionally done with sandalwood paste and turmeric, lauded in Hindu texts for their purity and cooling nature.

All images copyright – A. Avtans

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Sadhu from Ayodhya

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Sadhu from Ayodhya

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Sadhu from Ayodhya

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Sadhu from Ayodhya

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Sadhu from Ayodhya

 

चीन की एक सुबह

सुबह के सात बज रहे हैं। साल २०१२

रात भर चैन से सोने के बाद बेइजिङ के शुनयि जिले में स्थित जिनहाङशियान होटल से बाहर निकलकर सैर करने का मूड बना है।

हल्की बारिश हो रही है। गीली मिट्टी की सौंधी खुशबू ठीक वैसी ही है जैसी भारत में होती है। ये देशों का विभाजन कितना बनावटी हैं ना?  क्या भारत! क्या चीन! हवा और मिट्टी तो एक ही हैं? सड़क पर बहुत कम लोग है। कुछ बच्चे साइकिल  चला रहे हैं और इक्के-दुक्के उम्रदराज़ लोग सुबह की सैर पर निकले हैं।

अचानक कहीं दूर घंटी की टन-टन की आवाज़ सुनाई देती है। साथ में एक औरत की आवाज़ भी है जो चीनी ज़ुबान में कुछ ऐलान कर रही है। कुछ देर बाद पता चलता है कि सामने एक रेलवे लाइन है। और एक ट्रेन आने वाली है। यह ऐलान राहगिरों को रेलवे फाटक के बंद होने की सूचना दे रहा है। मैं वहीं रुक जाता हूँ। एक मटमैले रंग की ट्रेन आती है। शायद मालगाड़ी है। पर भारतीय रेल की मालगाड़ियों से आकार में छोटी है। फाटक खुलने के बाद मैं रेलवे लाइन पार करते हुए उस लाइनमैन को देखता हूँ जो एक गोल कटोरे से कुछ खा रहा है। साथ ही रेडियों पर कोई धीमा संगीत भी बज रहा है। वह मुझे भी दूर से देख रहा है। मैं संकोच में अपनी निगाहें दूसरी तरफ कर लेता हूँ। कुछ दूर आगे खा जाने की मुद्रा में मुँह खोले शेर की एक मूर्ति है और उसके नीचे चीनी लिपि में बहुत कुछ लिखा है। मैं जापानी लिपि के चीनी अक्षरों को उनमें तलाशते हुए उस शेर के मुँह में झाँकता हूँ। शायद कोई हो जिसे वह निगल गया हो। पर अफसोस कि अंदर सिर्फ पत्थर हैं।

एक जवान आदमी भारतीय तंदूर जैसे दिखने वाले दो बड़े कनस्तरों में कुछ तलाश रहा है। मैं उसे दूर से देख रहा हूँ। जवान आदमी के कंधे पर एक बड़ा सा झोला है। जिसमें वह कुछ चीज़े कनस्तरों से निकालकर भर रहा है। मेरे नज़दीक आते ही वह युवक शर्मा-सा गया है। और वह पलक झपकते ही अपना झोला लेकर तुरंत नौ दो ग्यारह हो जाता है। तंदूर जैसे दिखने वाले वे दो बड़े कनस्तर असल में कूड़ेदान हैं। उनमें बहुत सारी जूठन और अन्य कचरा अटा पड़ा है। मुझे भारत की याद आ जाती है। क्या यहाँ  चीन में भी कचरा बीनकर अपना पेट भरने वाले लोग हैं? मैंने बेकार में ही उसके काम में ख़लल डाला। क्या यहीं चीन की अर्थव्यवस्था की प्रगति के दावों का सच है? शायद हाँ। पता नहीं?

कुछ दूर चलने के बाद एक बड़ी सड़क है। शायद हाइवे है। मैं हाइवे की सर्विस लेन के साथ-साथ चलना शुरू कर देता हूँ। सड़क की बाईं तरफ एक मंझले आकार का नाला बह रहा जो किसी छोटी नहर जैसा है। इतना गंदा भी नहीं है। नाले के साथ-साथ पेड़-पौधे लगे हैं। दाईं तरफ़ रौशनी के खंभे लगे हैं। लाइट अब भी जल रही। शायद सुबह में उनके बंद होने का कोई समय निर्धारित हो।
मैं पैदल चलता चला जा रहा हूँ। मेरे ध्यान देने पर मुझे पता चलता है कि सड़क पर लगातार जैसे कोई चीनी ज़ुबान में रेडियों पर बोल रहा हो। कहाँ से आ रहीं हैं यह आवाज़? इधर-उधर देखने पर पता चलता है कि पास लगा खंभा बोल रहा है। थोड़ी-थोड़ी दूर खड़े दूसरे खंभे भी ठीक वैसी ही आवाज़े निकाल रहे हैं। अच्छा इन खंभो के ऊपर स्पिकर लगें हैं। जिनपर लगातार चीनी भाषा में कुछ घोषणा की जा रही है। बीच-बीच में संगीत भी बजा दिया जाता है। कभी लगता है एफ़.एम रेडियो है, कभी लगता है कि नहीं आकाशावाणी का चीनी संस्करण है, जिसपर ’प्रधानमंत्री रोजगार योजना’ के बारे में जानकारी दी जा रही है। लेकिन घोषणाएँ ज़्यादा है। संगीत बहुत कम। प्रापगैंडा (मतप्रचार) शायद ऐसे ही किया जाता है। मुझे कंबोडिया के ख्मेर रूज़ आंदोलन वाले नेता पोल पॉट के समय की याद आ गई जिसमें माओवादी लेबर कॉलोनियों में लगातार लाउडस्पीकरों पर माओवाद संबंधी घोषणाएँ प्रसारित होती रहती थी। जिन्हें सुनना सबकी मजबूरी होती थी। बच्चे वही सब सुनकर बड़े होते थे। और जो कोई भी पोल पॉट के आदर्शों से अलग ख़्याल रखने लगते थे उन्हें वे बच्चे हिंसंक मौत देने में संकोच नहीं करते थे।

शायद इन खंभों से ऐसी घोषणाएँ ना आ रही हो। पर सरकारी लाउडस्पीकरों का ऐसा तंत्र मैंने आज तक कभी नहीं आँखों देखा था। अब जाना कि प्रापगैंडा हमारी सरकारों के लिए कितनी जरूरी चीज़ है।
सामने से एक दुपहिया आ रहा है। भारतीय मोपेड की याद आ गई। उस मोपेड पर बहुत बूढ़ा आदमी बैठा हुआ है। मैं उसे देखकर हाथ जोड़कर नमस्ते करता हूँ। जवाब में वह अपनी मोपेड धीमी कर मुझे चीनी में ’नि हाओ’ (यानी नमस्ते) बोलकर अपनी गर्दन झुका कर अभिवादन करता है। मैं भी गर्दन झुका कर दुबारा उनका अभिवादन करता हूँ। बूढ़े आदमी के चेहरे पर खुशी और हैरानी दोनों के भाव मुझे साफ़ दिख रहे हैं। शायद वह बूढ़ा आदमी सोच रहा है कि यह भूरा आदमी यहाँ क्या रहा है। हम दोनों आगे बढ़ जाते हैं।

मेरे आगे-आगे दो उम्रदराज़ महिलाएँ और एक आदमी चले जा रहे हैं। चलते-चलते महिलाएँ और पुरुष अपने हाथ और कंधे व्यायाम करते हुए घूमा रहे हैं। तभी अचानक उनमें एक बूढी औरत सड़क के नीचे लगे पेड़-पौधों की ओर लपक कर चली जाती है। मैं यह देखकर हैरान हूँ। पता नहीं क्या करने वाली है। शायद लघुशंका? अरे वह तो वहाँ फेकी हुई एक कोका-कोला की प्लास्टिक की बोतल उन झाड़ियों में से निकाल कर ला रही है। चीन के लोग सफाई के लिए कितने सजग हैं। और उस बूढ़ी औरत की आँखे कितनी तेज़ हैं जो दूर झाड़ियों में भी प्लास्टिक की बोतल तलाश सकती हैं। वाह। महिला फिर से अपने साथियों के साथ शामिल हो गई है। मेरे सामने से एक काली बिल्ली रास्ता काट जाती है। मैं वहीं ठहर जाता हूँ। मेरी आधुनिकता और परंपरा में अब लड़ाई शुरू हो गई है।  

अंडमान डायरी – पोर्टब्लेयर की एक सुबह

 

नवंबर 2005 का एक दिन। सुबह के साढ़े सात बज रहे हैं। सूरज ऐसे चमक रहा है जैसे दुपहरी का समय भूलकर सुबह-सुबह ही अपनी गर्मी बरसाना चाहता हो। जल्दी-जल्दी नहा-धोकर होकर हमेशा की तरह राजू की चाय की दुकान पर पहुँचा। राजू अपने ससुराल में रहता है। वह अंडमान और निकोबार की राजधानी पोर्टब्लेयर में तमिलनाडु के किसी गाँव से आया है। और अब अपनी पत्नी के घर के नीचे ही सड़क पर चाय-सिगरेट की दुकान चलाता है। दुकान इतनी ही बड़ी है कि एक साथ बमुश्किल चार आदमी बैठ पाएँ।

 

वनक्कम राजू भाई। क्या हाल है? सब ठीक?

वनक्कम। सब ठीक है अब्बू भाई। चाय पीएगा?

 

हाँ-हाँ पर चाय से पहले मैं नाश्ते में इडली खाना पसंद करूंगा। इडली बची है या खत्म हो गई?

टिपिन मांगता? है ना। एक प्लेट मांगता? (नाश्ते को पोर्टब्लेयर में टीपिन (टिफिन) कहते हैं)

 

मैंने कहा – हाँ राजू भाई जो है दे दीजिए। नारियल की चटनी भी है ना?

सांबर है। चटनी आज जल्दी खतम हो गया। पर हम भी घर से लेके आता। मेरा पत्नी बनाके रखा होगा। आप अबी ये सांबर के साथ खाओ। हम आता।

 

ठीक है तब ले आइए।

 

खाना के लिए कोई प्लेट नहीं है। मोम लगे कागज़ की दो तहों को इस तरह हाथ से मोड़ा गया है कि वह एक छोटी प्लेट की शक्ल अख्तियार कर लेती है। उसी में चार छोटी-छोटी मुलायम इडलियाँ सांबर के साथ परोसी गई है।

ये लो अब्बू भाई चटनी।

 

अरे वाह आप तो बहुत जल्दी आ गए।

खाते-खाते मैंने राजू से पूछ ही डाला कि वह यहाँ पोर्टब्लेयर इतनी दूर कैसे आया।

मेरा माँ-बाप मरने के बाद हम इधर आ गया। पानी का जहाज से। तीन दिन तक चेन्नइ से इधर आने में लगा। आने टाइम मेरा पास सिर्फ एक झोला और एक टावल था। आप जानता है? इधर के बारे में एक स्टोरी है कि इधर का तमिल लोग बस इधर बस एक टावल लेके आया और अपना मेहनत से बड़ा-बड़ा बिजिनेस डाल दिया। अभी ये मुरुगन बेकरी शॉप तो आप जानता ना। वो तमिल आदमी है। वो जब इधर आया तो उसका पास कुछ भी नहीं था। इधर में जितना खाने-पीने का रेस्टोरेंट सब है ना। सब तमिल लोग चलाता है।

 

हाँ-हाँ जानता हूँ। मुरुगन बेकरी तो यहाँ की फेमस दुकान है। फिर आपने यहाँ शादी कैसे की?

 

मेरा बीबी का माँ का बम्बूप्लैट में खेत है। उधर हम काम किया और काए कि उसका कोई बेटा नहीं है। हम उसका बेटी से शादी बना लिया। अब पिचला 7 साल से इधर ही रह रहा है। फिर दो  साल से मेरा सास ने मेरे लिए ये दुकान डाल दिया।

मैंने पूछा – यहाँ और दूसरे लोग क्या-क्या काम करते है?

 देखो अब्बु भाई। तमिल लोग तो सारा मछली का, परचून दुकान और रिस्की धंधा करता। अभी इस रोड में जो दारू का दुकान है ना। वो इलिगल है लेकिन बहुत कमाई है। उसका मालिक तमिल आदमी है। और मलयाली लोग भी बहुत ऊपर जा रहा है। इधर ज्वेलरी का सारा काम वइ लोग के हाथ में है। और सारा फैंसी आइटम जैसे गोल्ड भी वहीं लोग इधर ला के सेल करता है। कपड़ा का पूरा बिजिनेस वइ लोग का हाथ में है।

 

मैंने कहा – पर इधर बंगाली लोग भी बहुत हैं। वो क्या काम करते है?

हा हा हा। बंगाली लोग पॉलिटिक्स करता है। उनका एम.पी है ना अंडमान का। वो लोग इधर साइड ज्यादा नहीं है। वो लोग तो दिगलीपुर और हैवलौक साइड में ज़्यादा रहता है। गौरमिंट जॉब भी उन लोग के पास अधिक है। पर वो लोग ज्यादा बिजिनेस नहीं देखता।

 

मैंने पूछा – ये लोकल लोग कौन है? मैंने सुना है कि कोई लोकल लोग इधर रहते हैं।

ये लोकल लोग यहाँ सबसे पहले से सेटल किया है। देखो अंग्रेज लोग जो क्रिमिनल लोग को इधर ला के सेल्यूलर जेल में डाला ना। उन लोग का औलाद है ये लोग। यहाँ पइले इन लोग के पास बहुत प्रापर्टी था पर ये लोग दारू के चक्कर में सब बेच दिया।

 

मैंने पूछा – क्यूँ लोकल लोग कोई बिजिनेस नहीं करते क्या?

ये लोग बहुत आराम करने वाला लोग है। ये अपना जमीन बेच के अपना पेट भरता है। इन लोग का सब जमीन अब धीरे-धीरे तमिल और दूसरा लोग ले लिया है। लोकल लोग अपने आप फ्रिडम-फाइटर का औलाद बता के गौरमिंट से पइसा भी लेता है। पर कोई-कोई लोकल अच्छा बिजिनेस भी डाला है।

 

मैंने कहा – और कौन रहता है यहाँ अंडमान में?

इधर एक राँची लोग भी रहता है। ये लोग भी भौत टाइम से इधर रहते आ रहा है। ये लोग बहुत डेंजर लोग है। ये लोग भी मेनलैंड से इधर आया है। ज़्यादा औरत इन लोग का पुलिस में भर्ती होता है। पैले अंग्रेज लोग का टाइम में ये लोग इधर एक बुश पुलिस में होता था। बुश पुलिस का काम था जंगल को सफा करना और इधर जो जंगल का लोग रहता था ना, उनको मारना। पर अंग्रेज लोग तो चला गया और इसलिए बुश पुलिस भी बंद कर दिया। ये लोग राँची बस्ती में रहता है। अब भी जंगल का लोग ये राँची लोग को देखके भौत डर जाता है। कभी-कभी तो उन लोग के ऊपर अपना तीर-धनुष से अटैक भी कर देता है। इसलिए राँची लोग भी जंगल साइड कम जाता है।

 

मैंने पूछा – तेलुगु लोग नहीं है इधर?

हैं ना बहुत है इधर। ये लोग भी अपना होटल और चाय-सिगरेट का बिजिनेस बहुत करता है। इन लोग का औरत लोग बहुत मेहनत करने वाला होता है। अभी ये क्रासिंग पर जो चाय का दुकान है ना वो एक तेलुगु औरत चलाता है। अच्छा कमाई करता है।

मैंने कहा – हाथ धोने के लिए पानी कहाँ है राजू भाई। और एक चाय भी बना दीजिए।

पानी उधर बकेट में है ना। चाय अभी बनाता है।

सउदी अरब में कपिल देव

 

(कपिलदेव नाम के एक प्रसिद्ध भारतीय क्रिकेट खिलाड़ी हैं)
तारीख़ : अगस्त 2012
जगह: इंदिरा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, नई दिल्ली
ठिकाना: वेटिंग हॉल, टर्मिनल – 3
मेरी बगल वाली सीटों पर दो सज्जन बैठे हैं।

मैं: भाई साहब आप कहाँ जा रहे हैं?
पहला मुसाफिर: हम लोग सउदी जा रहे हैं? देर रात में फ्लाइट है।
मैं: चलिए आप लोग तब तक आराम कर सकते हैं। वहाँ काम करते हैं क्या?

पहला मुसाफिर: हाँ वहीं काम करते हैं। दो महीने की छुट्टी पर आये थे। फिर वापस जा रहे हैं। आप कहाँ जा रहे हैं?
मैं: मैं भी काम से बाहर जा रहा हूँ। आप लोगों की ईद तब तो वहीं मनेगी।
पहला मुसाफिर : हाँ छुट्टी खत्म हो गया है। इसलिए जाना पड़ेगा।
मैं: रुक नहीं सकते?
पहला मुसाफिर: नहीं रुक सकते। अगर रुके तो कपिल गुस्सा हो जाएगा।
मैं: कपिल गुस्सा हो जाएगा?…ये कपिल कौन है?
पहला मुसाफिर: कपिल याने मालिक अरबी में। हर आदमी जो वहाँ काम करने जाता है। उसका एक कपिल होता है। महीने में कम से कम एक बार उससे मिलना होता है। वहाँ पर वहीं आपका बाप होता है। कोई मामला बनता है तो कपिल ही आपका जवाबदेह होगा।
मैं: मैं इसके बारे में कुछ भी नहीं जानता।
पहला मुसाफिर: कपिल वह आदमी है जिसके नाम पर हम लोग काम करने अरब जाते हैं। जैसे उसका नाम इस्तेमाल करते हैं।
मैं: ये कपिल कैसे लोग होते हैं।
दूसरा मुसाफिर: कोई भी सउदी कपिल हो सकता है। कुछ लोगों का यह धंधा है। अपने नाम पर लोगों को बुलाते हैं। और वह आदमी दूसरी जगह काम करता है। एक आदमी के लिए रेट 3-4 लाख रुपए हो सकता है।
मैं: आपका भी कपिल है?
दूसरा मुसाफिर: सबका कपिल होता है। मेरा भी है।
मैं: कपिल लोग कैसा बर्ताव करते हैं।
पहला मुसाफिर: अरे कपिल तो पीट भी सकता है। उसका कहा मानिए नहीं तो थप्पड़ मारेगा।
मैं: थप्पड़ क्यूँ मारेगा? ऐसे ही?
दूसरा मुसाफिर: मान लीजिए वो आपको अरबी में कहेगा दाएँ चलो, और आप बाएँ जाएंगे। तो वो गुस्सा होकर थप्पड़ भी मार सकता है।
मैं: वो लोग गाली भी देते हैं क्या?
पहला मुसाफिर: हाँ गाली भी देते हैं। पर अरबी में देते हैं। इसलिए पता नहीं चलता।

मैं: हा हा हा। आप अपने कपिल के साथ रहते हैं?
पहला मुसाफिर: हाँ पहले रहता था। लेकिन कपिल बहुत परेशान करता था। इसलिए मैं उसका पैसा उसको हर महीने दे देता हूँ और अलग रहता हूँ।
मैं: यानी अलग रहने के लिए हर्जाना देना होता है। कैसे परेशान करता था?
दूसरा मुसाफिर: हाँ देना होता है।
पहला मुसाफिर: अब देखिए रात में उठाकर कहेगा। वहाँ चलो।
मैं: आप अपने घर में कौन सी ज़बान बोलते हैं?
पहला मुसाफिर: यही हिंदी या भोजपुरी उर्दू।
मैं: आप कहाँ रहते हैं?
दूसरा मुसाफिर: मैं अपने कपिल के साथ रहता हूँ। उसके यहाँ खाना-चाय-नाश्ता बनाता हूँ। मेरा कपिल अच्छा आदमी है।
मैं: घर पर कोई दिक्कत नहीं होती?
दूसरा मुसाफिर: नहीं कुछ चीज़े हैं जो सीखनी पड़ती है।
मैं: जैसे?
दूसरा मुसाफिर: जैसे अगर कपिल की बीवी या कोई और औरत आ रही है तो कपिल बता देता है कि नज़रे उधर कर लो। और हम लोग नज़र दूसरी तरफ कर लेते हैं। यह समझना होता है।
मैं: आप अपने कपिल के लिए हिन्दुस्तानी खाना बनाते है?
दूसरा मुसाफिर: नहीं-नहीं वो लोग इतना मसाला नहीं खाते है। बस हल्दी, जीरा और केसर का इस्तेमाल करते हैं। सउदी लोगों को हमारी बिरयानी और दम गोश्त बहुत पसंद है। पूरे दिन सउदी लोग कहवा पीते हैं। अकेला एक सउदी पूरा मुर्गा हड़प जाता है। बगैर मसाला या सालन के। मैं तो ऐसे गोश्त खा ही नहीं सकता। इसलिए मैं अपने लिए अलग से सब्जी बनाता हूँ।
मैं: कहवा क्या होता है?
दूसरा मुसाफिर: हाँ कहवा मतलब अरबी में हमारे यहाँ की लाल बिना दूध वाली चाय। इसमें केसर, चाय की पत्ती, इलायची और बादाम डालते हैं। दूध वाली चाय नहीं पीते हैं।
मैं: आप कहाँ खाना खाते हैं?
पहला मुसाफिर: हम अपनी फैक्ट्री में खाना खाते हैं। दाल-चावल-रोटी-सब्जी मिलता है।
मैं: यह तो बढ़िया बात है।
दूसरा मुसाफिर: सउदी कपिल आजकल बहुत होशियार होते जा रहे हैं। उनको पता चल गया है कि यहाँ के एक रियाल के भारत में 15 रुपए मिलते हैं। इसलिए अब उतना पैसा नहीं है।
मैं: आपको कैसा लगता है वहाँ पर?
पहला मुसाफिर: अपने देस में काम मिले तो कौन वहाँ काम करने जाएगा। हम तो कभी नहीं जाएंगे।
मैं: लीजिए शाम के साढ़े- छे बज गए। आपके रोज़ा खोलने का वक्त हो गया।
दूसरा मुसाफिर: हाँ- हाँ। आप यह केला लीजिए ना।
पहला मुसाफिर: यह बिस्कुट भी लीजिए।
मैं: अरे नहीं नहीं आप लोग खाइए। आप लोगों ने सुबह से कुछ नहीं खाया-पीया है।
दूसरा मुसाफिर: पहले आप लीजिए।
मैं: ठीक है। शुक्रिया। 

{बाद में चेक किया तो पता चला कपिल ही अरबी का ’कफ़िल’ यानी employer है।}