Boats

boats

The Taoists have a famous teaching about an empty boat that rams into your boat in the middle of a river. While you probably wouldn’t be angry at an empty boat, you might well become enraged if someone were at its helm. The point of the story is that the parents who didn’t take care of you, the other kids who teased and bullied you as a child, the driver who aggressively tailgated you yesterday – are all in fact empty, rudderless boats. They were compulsively driven to act as they did by their own un-examined wounds, therefore they did not know what they were doing and had little control over it. Just as an empty boat that rams into us isn’t targeting us, so too people who act unkindly are driven along by the unconscious force of their own wounding and pain.
Until we realize this, we will remain prisoners of our grievance, our past, and our victim identity, all of which keep us from opening to the more powerful currents of life and love that are always flowing through the present moment.
#Taoism

अपने पुरखों के लिए

Banaras Ganga Ghat

Banaras Ganga Ghat

नोट – यह संस्मरण मूलत: लीलावती सृजन फ़ाउंडेशन की स्मारिका [May 2014] में छपा था।

अभिषेक अवतंस (लायडन, नीदरलैण्ड)

2008 मई की तपतपाती सुबह मैं कृष्ण भक्तों के बुलावे पर बरास्ते मथुरा वृंदावन जा रहा था। वृंदावन जाने का आशय यह था कि वहाँ मुझे कुछ विदेशी कृष्णभक्तों को हिन्दी बोलना-लिखना सिखाना था। सनातन परंपरा में तीर्थों का बड़ा महत्व है और इसी कारणवश बस के मथुरा में प्रवेश करते ही मुझे अपनी माँ की बताई वह बात याद आ गई कि हमारी ’आजी’ यानी मेरी परदादी ने भी मेरे जन्म से कुछ महीने पहले इसी तरह काशी की ओर प्रस्थान किया था और वहीं वे स्वर्गवासी हुईं थी और इसलिए अपनी ’आजी’ से मैं कभी नहीं मिल पाया। लेकिन फिर भी मेरा मन उनकी आस्था की सुगंध से सराबोर था। वृंदावन की उस संकरी पर बेहद शीतल ’सेवाकुंज गली’ से गुज़रते हुए मैं वापस लोहानीपुर (कदमकुआँ, पटना) में अपने परदादा स्वर्गीय श्री रामदास तिवारी (जिनको हम सब लोग प्यार से ’बाबा’ कहते थे) के बनाए मकान में पहुँच गया था जहाँ न जाने कितनी गर्मी की छुट्टियाँ हमने परिवार के साथ बिताई थीं। हमारे बाबा वहाँ हमारी माई के साथ रहते थे। माई यानी हमारी दादी अर्थात हमारे बाबा की बहू। सफ़ेद साड़ी पहनने वाली गोरी-सी सुन्दर सी दादी। हम सब माई को पापा (प्रो. बालेन्दु शेखर तिवारी) के पीछे-पीछे माई (भोजपुरी में माँ) ही बुलाते थे।

माई का पूरा नाम श्रीमती लीलावती देवी’ था। माई दिखने में जितनी सुन्दर-अद्भुत थी उतनी ही फ़ुर्तीली-चुस्त भी। लोहानीपुर में सुबह हम लोगों हम आँख मलते हुए उठते तो देखते कि माई नहा-धोकर मंदिर से पूजा कर आई, और हमारे लिए मिठाईवाले की दुकान से ताज़े रसगुल्ले भी साथ लेती आई। क्षण-भर में माई नीचे कमरे में होती थी तो क्षण-भर में छत पर आम-आँवला के अचार के बौयामों (खड़ी बोली हिन्दी में – मर्तबानों) को धूप दिखा रही होती थी। माई को मैंने कभी झुककर चलते हुए नहीं देखा। इतनी सहनशक्ति और जीजिविषा बिरले ही लोगों को मिलती है। लोहानीपुर में मैं हमेशा माई के साथ ही सोता था। सोचता था कि दुनिया की सबसे अच्छी दादी मेरी माई ही है। स्कूलों के खुलने पर जब हम लोग वापस राँची चले आते तो कुछ दिनों में माई और बाबा का लिखा अंतरदेशीय पत्र आता। यह एक अलग किस्म की लिखावट होती थी जिसके हर अक्षर से स्नेह की बूंदे हमारे लिए टपक रही होती थी। हमारे बाबा की इबारत ऐसी होती थी कि उसे पढ़ने के लिए हम बच्चे हँसी-ठिठोली करते थे। लगता था जैसे रेत पर छोटी-छोटी उंगलियों के निशान हों या मुर्गियों ने कोई कहानी लिख दी हो। जहाँ बाबा एक ओर अनुशासनप्रिय और गंभीर थे तो माई उतनी ही सरल और ममतामयी थी। पास में ही हमलोगों का स्कूल चाचा नेहरू विद्यापीठ (डिप्टीपाड़ा, करमटोली राँची) था। माई रोज़ मुझे छोड़ने-लेने आती, साथ में मुझे पिलाने के लिए गाय का गरम दूध भी लिवा लाती । कहीं भी जाने के लिए हमेशा तैयार और वो भी पैदल। थकान का नामोनिशान नहीं। बड़ा हुआ पता चला मेरी इस अलबेली माई जो युवावस्था में ही विधवा हो गई थी, न जाने कितने जतन से अपनी संतानों (यानी मेरे पापा और उनकी दो बहनों) का लालन-पोषण किया था। 1991 में बाबा के गुज़रने के बाद माई ने पटना में अकेले ही रहने का निश्चय किया। मैंने पूछा माई तुम राँची हमारे साथ क्यों नहीं रहती हो, तब माई ने अपनी ठेठ भोजपुरी में जवाब दिया – लोहानीपुर के घर के टोंटी में गंगाजी आवेली। हमरा इनके भिरी रहे में सुखबा। हम तहरा के देखे आइब बबुआ, तू घबड़हिअ  मत । मैं मन-ही-मन उदास होता रहता कि माई हमसे क्यों दूर रहती है। माई का राँची आना-जाना लगा रहता। कुछ ही दिनों में मुहल्ले (मोराबादी, राँची) भर के लोगों से माई की पहचान बन जाती और लोग माई से मिलने आते रहते। लेकिन जैसे-जैसे माई के वापसे जाने की घड़ी नज़दीक आती, मेरी बैचेनी बढ़ती जाती। अन्तिम दिन तो हालत इतनी पतली हो जाती कि माई के स्टेशन ले जाने रिक्शे में बैठने तक मैं अपने आँसुओं को नहीं रोक पाता। यह मेरा दुर्भाग्य ही है जब हमारी प्यारी माई की मृत्यु 2004 में राँची में हुई तब मैं उनके करीब नहीं था।

हमारे दादाजी यथा स्वर्गीय सिद्धिनाथ तिवारी (पूर्व प्रोफ़ेसर हिन्दी, बी.एन.कॉलेज़, पटना) जिनको साक्षात देखने का सौभाग्य मुझे नहीं मिला। दादा जी की याद मुझे उस समय सबसे ज़्यादा आई जब राँची मैंने अपनी बेटी इलिका को पापा की गोद में बैठकर ’गुड़ की लाई’ खाते हुए देखा । दादा की गोद  में होने का सुख क्या होता है मैं इसे कभी महसूस नहीं कर पाया। पर इसे मैं अपनी बेटी की आँखों से महसूस कर रहा था।

किस्सागोई का शौक मुझे पापा से मिला है, आजतक मैंने सबसे अधिक किस्से अपनी माँ (स्वर्गीय विद्या तिवारी) को ही सुनाए हैं। कभी-कभी अहसास नहीं होता कि सुबह-सुबह खूब सारी चाय पिलाने वाली, मेरी हर चर्चा को चाव से सुनने वाली, मुझे दो मर्तबे ज़िन्दगी देने वाली, मेरे हर सवाल पर राय देने वाली, हमेशा खानाखइलऽबबुआ ?, पूछने वाली प्यार की नदी जैसी मेरी माँ अब बहकर बहुत दूर चली गई है।

 

आज कई साल गुज़र गए हैं, आजी, माई, बाबा, दादा और हमारी प्यारी माँ श्रीमती विद्या तिवारी सब-के-सब अब इस दुनिया में नहीं रहे लेकिन उनकी यादें और उनका प्यार विस्मृत नहीं हुआ है। ये किस मिट्टी के लोग थे। ऐसे अद्भुत लोग अब बिरले ही मिलते हैं। ये हिन्दी लोग थे। हिन्दी संस्कृति की आत्मीय सुगंध से आच्छादित। जिनकी बोली में हिन्दीपना था।

हमारे परिवार का हिन्दी भाषा और साहित्य से अटूट रिश्ता है। यह वह परिवार जहाँ बैठकखाने से ही किताबों का अंबार लगना शुरू हो जाता है। पुस्तकों का संग्रह इतना बड़ा है कि दो बड़ी-बड़ी लाइब्रेरियाँ बन जाएँ। जब दो साल पहले मैं नीदरलैंड के लायडन विश्वविद्यालय के हिन्दी व्याख्याता पद का साक्षात्कार देने आया, तो मुझसे पूछा गया था कि आप हिन्दी क्यों पढ़ाना-सिखाना चाहते हैं, इसके जवाब में मैंने कहा था कि मैं अपने खानदान में तीसरी पीढ़ी का हिन्दी अध्यापक हूँ। मेरे दादा और पिता के बाद मेरी बड़ी दीदी (डॉ. संपदा पाण्डेय) और मैं हिन्दी भाषा के पठन-अध्यापन के क्षेत्र में ही कार्यरत हैं। हिन्दी हमारी रग-रग में बसी। जिस तरह मछली जन्म लेने के साथ ही जल में गोते लगाने लगती है उसी तरह हमने भी हिन्दी के इस महाकुंड में तैरना सीखा है। यहाँ तक कि मेरे बड़े भाई (श्री अभीक अवतंस) जो कि राज्य सरकार में उच्चाधिकारी हैं, उन्होंने राज्य सिविल परीक्षा भी हिन्दी विषय लेकर ही उतीर्ण की थी। मेरी दूसरी बड़ी बहन (श्रीमती अंगदा पाण्डेय, एम.एससी) भी भारत के सूदूर दक्षिण में रहते हुए भी हिन्दी की पताका लहरा रही है। वे न सिर्फ़ बंगलूरू के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में जैवविज्ञान की प्राध्यापिका हैं बल्कि अपने बच्चों को हिन्दी-कन्नड़-भोजपुरी-अंग्रेज़ी का समेकित ज्ञान भी दे रहीं हैं।

बढ़ते परायेपन के इस ज़माने में परिवार की स्मृतियों को अशेष रखने का अनुष्ठान है – लीलावती सूजन फाउंडेशन, जिसकी परिकल्पना पापा ने गत वर्ष सोची थी। इसके अंतर्गत हमारे प्रपितामाह स्वर्गीय रामदास तिवारी की स्मृति में ’रामदास सृजन सम्मान’, हमारे पितामह स्वर्गीय डॉ सिद्धिनाथ तिवारी की स्मृति में ’सिद्धिनाथ तिवारी व्यंग्यश्री सम्मान’ और हमारी माँ स्वर्गीय विद्या तिवारी की स्मृति में ’विद्या तिवारी वामाश्री सम्मान’ की स्थापना की गई है। ये पुरस्कार प्रत्येक वर्ष हिन्दी भाषा और साहित्य के क्षेत्र में सुजन-शोध लगे विद्वानों को दिए जाएँगे। भारतीय संस्कृति ही एक अकेली संस्कृति है जिसमें पुरखों के लिए एक पक्ष निर्धारित है, कोई समाज अपने पितरों को इस तरह स्मरण नहीं करता जैसे हम करते हैं। इसी कड़ी में लीलावती सृजन फाउंडेशन भी है। 

Empire of the Great Khan

[Wrote this piece aboard a small train in a beautiful cool day of January 2012 ….precisely on 02/01/2012]

In the empire of the Great Khan, we stroll away,

Our train crossing layers and layers of white carpet spread up to the horizon

White Mountains staring at us lazily as we move past of them

Cattle grazing whatever remains on the land, chewing cud bit by bit,

With a big snow-clad mountain standing in the background,

A small village with few houses and some electric poles look us back in our eyes  

Where a man walks far away, going back to his home slowly,

Somewhere near, a black dog chases the car playfully,

And a horse jumps a small wall with an easy gallop

While a small goods train rolls away lazily to some hinterland

To the land we once belonged.

Where are we going?

To the good old and white mountains where once we flew away to the plains  

There is a bird flying high, singing the winter song.

Some grass is hoping for the spring to come, but till then braving the chill of winter.

Love is as pure feeling as you taste the fresh snow by the tip of your tongue,

Sun shines in the east,

Snow is sparkling like the stars of the Milky-way,

Where are we going?

To the good old and white mountains where once we flew away to the plains

It’s good to be home and love pure like white snow,

Let this love spread into layers and layers like white snow,

Like it does in the empire of the Great Khan.

“Khan” is an originally Altaic and subsequently Central Asian title for a sovereign or military ruler, widely used by medieval nomadic Turko-Mongol tribes living to the north of China. Read more below…

http://en.wikipedia.org/wiki/Khan_(title)

God is good all the time !


In our life we, all know how important are some special days when we wait anxiously to know the results. We pray to each and every God to do good to us. We think of our near and dear ones for their care, love and support. We remember our parents who brought us into this world and took pain to see that we always get what we want. We all do this several times in our life to make sure we are happy and safe. I prefer calling these days small judgment days (from the Day of Judgement in Gospel Of Matthews in Holy Bible). It’s the GOD (one who is Jesus, Krsna, Shiva, Durga , Allah, Buddha or any other form) who listens to our prayers and takes care of all our worries. God helps us overcome the problems and understand the true meaning of life and death, of love. of wealth and satisfaction. May be we do not see it from our eyes but HE IS GOOD ALL THE TIME (thanks to Don Moen for creating this wonderful song)

I had my 6th Judgement Day Today and God was good to me again! It’s wonderful to feel his love for me, for taking care of me always, for giving me happiness, for giving me SUPER wonderful people around me (my parents, Suresh- my brother, Bhaiya, My sisters, Mrs Mary – Shillong- for sending thousands of prayers to God for me, and many caregivers RVS, Aps, Khonoma Lilly and especially GDCK-UMS- for innocence and care, Dr MSA – for his extraordinary skills and smile,  Dr AA – for his fantastic knowledge and coolness, My staff at KHS – for keeping faith in me, Narayan -for keeping his doors open for me day n night, and all who love me).

I believe we should cherish and enjoy whatever God gives us. There is always a ray of light even in the darkest of the tunnels. Do good and be compassionate to everyone who live around you. Life is a gift of God to us. For all of you who face  judgment days, here are the words of the wonderful song Don Moen wrote:

“God is good all the time
He put a song of praise in this heart of mine
God is good all the time
Through the darkest night, His light will shine
God is good, God is good all the time

If you’re walking through the valley
And there are shadows all around
Do not fear, He will guide you
He will keep you safe and sound
‘Cause He’s promised to never leave you
Nor forsake you and His Word is true

We were sinners – so unworthy
Still for us He chose to die
Filled us with His Holy Spirit
Now we can stand and testify
That His love is everlasting
And His mercies – they will never end”

Moon’s Peak and Black Coffee

Music is a gift of heaven to ears. It makes you slip away in timelessness, living away in the land of clouds and mist. It is not surprising that one holds on to that world for a long time. I do it often (though it does not make any sense most of the time). Living the unreal is joy unexplained. Wondering why this post’s is titled Moon’s peak and Black Coffee”? Drank some black coffee and got introduced to some wonderful music at this warm and cosy coffee-house named Moonspeak Cafe at Mcleodganj (Dharamshala, Himachal Pradesh). It was a wintry morning of late December with no sight of the sun and frozen winds of the Himalaya country blowing outside. We had just arrived in Mcleodganj in the morning from Delhi and happened to be in that cafe for some late morning brunch and coffee. A young Tibetan guy (with Beatles styled long hairs) who was looking over the cafe, after serving us our coffees, started playing some wonderful music on the cafe’s music player. It made me look and persistently smile to my friend  (Undrushka) like a baby who has recently learnt to smile (and does not know what it actually means and reacts to everything either with a smile or a cry).Upon inquiry, I realized it’s from Noble Beast (I have never come across a Beast who is so sweet). Noble Beast is an album composed by Andrew Bird. But the song which went to the ears like a gush of cool winds on a hot summer day was Effigy. The song is wonderfully sung by Andrew Bird and the words flow like a lucid narrative from his mouth. He sings like we all will say an internal conversation to ourselves naturally. Beautiful lyrics and wonderful music. Thanks to the unnamed hosts at Moonspeak cafe, Mcleodganj. Each time  we visited that place, they obliged me by playing it again….. Here are the lyrics…………Enjoy

If you come to find me affable

And build a replica for me

Would the idea to you be laughable

Of a pale facsimile
So when you come to burn an effigy

It should keep the flies away

When you learn to burn this effigy

It should be For the hours that slip away
It could be you, it could be me

Working the door, drinking for free

Carrying on with your conspiracies

Filling the room with a sense of unease

Fake conversations on a nonexistent telephone

Like the words of a man who’s spent a little too much time alone

When one has spent too much time alone…
So if you come to burn my effigy

It should keep the flies away

When you long to burn an effigy

it should be Of a man whose lost his way, slips away

Listen to the Music here



Fireflies

Good Poetry matters….music comes second…..read on

You would not believe your eyes
If ten million fireflies
Lit up the world as I fell asleep

‘Cause they’d fill the open air
And leave tear drops everywhere
You’d think me rude
But I would just stand and stare

I’d like to make myself believe
That planet Earth turns slowly
It’s hard to say that I’d rather stay
Awake when I’m asleep
‘Cause everything is never as it seems

‘Cause I’d get a thousand hugs
From ten thousand lightning bugs
As they tried to teach me how to dance

A foxtrot above my head
A sock hop beneath my bed
A disco ball is just hanging by a thread

I’d like to make myself believe
That planet Earth turns slowly
It’s hard to say that I’d rather stay
Awake when I’m asleep
‘Cause everything is never as it seems
When I fall asleep

Leave my door open just a crack
(Please take me away from here)
‘Cause I feel like such an insomniac
(Please take me away from here)
Why do I tire of counting sheep
(Please take me away from here)
When I’m far too tired to fall asleep

To ten million fireflies
I’m weird ’cause I hate goodbyes
I got misty eyes as they said farewell

But I’ll know where several are
If my dreams get real bizarre
‘Cause I saved a few and I keep them in a jar

I’d like to make myself believe
That planet Earth turns slowly
It’s hard to say that I’d rather stay
Awake when I’m asleep
‘Cause everything is never as it seems
When I fall asleep

I’d like to make myself believe
That planet Earth turns slowly
It’s hard to say that I’d rather stay
Awake when I’m asleep
‘Cause everything is never as it seems
When I fall asleep

I’d like to make myself believe
That planet earth turns slowly
It’s hard to say that I’d rather stay
Awake when I’m asleep
Because my dreams are bursting at the seams

Courtesy: Owl City album “Ocean Eyes”

listen to the original here

http://www.youtube.com/watch?v=psuRGfAaju4

Let me rest in pieces……

Look at me, my depth perception must be off again Cause this hurts deeper than I thought it did It has not healed with time It just shot down my spine. you look so beautiful tonight Remind me how you laid us down And gently smiled before you destroyed my life Would you find it in your heart To make this go away And let me rest in pieces Would you find it in your heart? To make this go away And let me rest in pieces Would you find it in your heart? To make it go away And let me rest in pieces Look at me, my depth perception must be off again You got much closer than I thought you did Im in your reach You held me in your hands But could you find it in your heart? To make this go away And let me rest in pieces Would you find it in your heart? To make it go away And let me rest in pieces