Boats

boats

The Taoists have a famous teaching about an empty boat that rams into your boat in the middle of a river. While you probably wouldn’t be angry at an empty boat, you might well become enraged if someone were at its helm. The point of the story is that the parents who didn’t take care of you, the other kids who teased and bullied you as a child, the driver who aggressively tailgated you yesterday – are all in fact empty, rudderless boats. They were compulsively driven to act as they did by their own un-examined wounds, therefore they did not know what they were doing and had little control over it. Just as an empty boat that rams into us isn’t targeting us, so too people who act unkindly are driven along by the unconscious force of their own wounding and pain.
Until we realize this, we will remain prisoners of our grievance, our past, and our victim identity, all of which keep us from opening to the more powerful currents of life and love that are always flowing through the present moment.
#Taoism

Poems from Punjab

इक कुड़ी जिदा नाम मोहब्बत, गुम है, गुम है, गुम है।
“A girl whose name is love, is missing, is missing, is missing”
Shiv Kumar Batalvi ((23 July 1936 – 7 May 1973)
A famous Punjabi language poet with a folk consciousness and modern sensibility, Shiv Kumar excelled with a freshness of vocabulary, diction, imagery and rhythmic flow of words which remain unparalleled in Punjabi poetry. Shiv was born in a village near Sialkot (Pakistan). His family moved to Batala, Gurdaspur (India) after Indian partition in 1947. The pangs of this separation are recurrent themes of this great poet of the land. One of my current favorites composed by Shiv Kumar Batalvi is ”ik kudi jida naam mohabbat, gum hai gum hai” sung by Shahid Mallya in his beautiful voice. From the soundtrack of Udta Punjab (2016)

लोग कहते हैं मेरी आँखें मेरी माँ जैसी हैं।

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19 मई 2013 की वह सुबह याद करके आज भी मन सिहर उठता है। आज फिर वह दिन है। मम्मी को गए हुए आज पूरे तीन साल हो गए। कितना कुछ तुम छोड़ गई। मेरी पत्नी मुझसे हमेशा पूछती है कि तुम हमेशा फोन करके यह क्यों पूछते हो कि खाना खाया कि नहीं, इलिका-औरस ने कुछ खाया कि नहीं? मैं उससे कहता हूँ – मेरी माँ भी मुझसे यही सवाल कई बार पूछती थी। अपनापन है, प्यार है इसमें।

जब आगरे से सीधा विदेश में रहने आया तो कई बार फ़ोन पर पूछती कि रात का खाना खाया कि नहीं, मैं कहता – अरे नहीं मम्मी अभी तो यहाँ तो दोपहर के तीन बज रहे हैं। फिर कहती ऐसा …तुम तो दूसरी दुनिया में चले गए। फिर बोलती कि कुछ खा लेना ठीक। बारहवीं के पश्चात घर से बाहर निकल दिल्ली आने के बाद माँ से बातचीत फ़ोन पर और साथ रहना विश्वविद्यालय की छुट्टियों में ही हो पाता था। एस.टी.डी करने के लिए पैसे भी कम थे और शायद वह समय भी ऐसा था जब अल्हड़पन का ज्वर अपने उफान पर था। जब आगरे में नौकरी करनी शुरू की तब मैं काफ़ी गंभीर और संयमित हो चला था। बाद में ईश्वरीय संयोग (अस्वस्थता) से आगरे में माँ का सानिध्य भरपूर मिला। कई-कई महीने हम लोग साथ रहे। मैंने खाना पकाना माँ से वहीं सीखा (जो आज बहुत मददगार साबित हो रहा है)। और चाय के साथ घंटों बातचीत – दफ़्तर से जुड़ी बातें, किस्से-कहानियाँ , चुटकुले, मेरे विश्वविद्यालय के दिनों की घटनाएँ, अंदमान की स्मृतियाँ, वृंदावन के मेरे अनुभव, मेरी प्रेम गाथाएँ और बहुत कुछ। इन सबके बीच एक बेहतरीन श्रोता और फ़ीडबैक देने के लिए मौज़ूद थी माँ।

उन दिनों मैं हिन्दी संस्थान के भोजपुरी-हिन्दी-अंग्रेज़ी शब्दकोश पर काम भी कर रहा था। हर दिन कुछ अनोखे शब्द मिलते और हमारी बातचीत उनके सही मतलब और प्रयोग पर होती रहती। मैंने पाया कि माँ पिताजी से कहीं ज़्यादा प्रभावशाली भोजपुरी जानती थी। शायद यह उनकी ठेठ ग्रामीण पॄष्ठभूमि से भी वास्ता रखता था जबकि पिताजी सदैव राजधानी में ही रहे थे। आगरे में हमारे निवास की बालकोनी में सूखने के लिए फैलाईं साड़ियाँ देखकर सब मुहल्ले वाले समझ जाते थे कि अभिषेक की माताजी आ गईं है, फिर लोगों का आना शुरू होता। सबलोगों से मिलना और उन्हें चाय पिए बगैर न जाने देने की रस्म निभाई जाती।

माँ को आगरा बहुत रास आता था, कभी-कभी अस्वस्थ रहती थी, लेकिन आगरे का ठेठ देसीपना उन्हें बहुत भाता था। दिन बीतते देर न लगी। फिर मैं विदेश आ गया, माँ अस्वस्थ रहती थी, मेरा भारत आना-जाना हर छह महीनों में लगा रहता था। जनवरी 2013 में जब आखिरी बार मिला तो माँ ने आँसुओं से भरी आँखों से मुझे विदाई दी। ठीक पाँच महीनों में वे चली गईं। मैं असहाय यहीं पड़ा रहा। माँ ने उसके पिछले हफ़्ते ही मुझसे फ़ोन पर कहा था कि बेटा मैं अब तुमसे नहीं मिल पाऊँगी, कुछ खा लेना। 19 मई की उस सुबह मैं परदेश में ही था, जब यह ख़बर मुझे मिली कि वह सच कह रही थी। जाने किस जल्दी में थी। लोग कहते हैं मेरी आँखें मेरी माँ जैसी हैं, यूँ ही भरी हैं पानी से मगर तुम्हारी राह देखती हैं।

कोइलवर पुल (आरा, बिहार, भारत)

बिहार की राजधानी और पटना और भोजपुर जिले के मुख्यालय आरा के बीच बने इस ऐतिहासिक पुल को 1862 में अंग्रेज़ इंजीनियरों ने भारतीय मज़दूरों के सहयोग से बनाया था। यह एक दोहरा पुल है जिसमें ऊपर रेलगाड़ी का रास्ता है और नीचे सड़क है। पुल की तस्वीर के साथ दुष्यंत कुमार (1933-1975) की कविता।
Koelwar bridge at Bihta near Patna, India. (View Original Size)-3541833543

अपने पुरखों के लिए

Banaras Ganga Ghat

Banaras Ganga Ghat

नोट – यह संस्मरण मूलत: लीलावती सृजन फ़ाउंडेशन की स्मारिका [May 2014] में छपा था।

अभिषेक अवतंस (लायडन, नीदरलैण्ड)

2008 मई की तपतपाती सुबह मैं कृष्ण भक्तों के बुलावे पर बरास्ते मथुरा वृंदावन जा रहा था। वृंदावन जाने का आशय यह था कि वहाँ मुझे कुछ विदेशी कृष्णभक्तों को हिन्दी बोलना-लिखना सिखाना था। सनातन परंपरा में तीर्थों का बड़ा महत्व है और इसी कारणवश बस के मथुरा में प्रवेश करते ही मुझे अपनी माँ की बताई वह बात याद आ गई कि हमारी ’आजी’ यानी मेरी परदादी ने भी मेरे जन्म से कुछ महीने पहले इसी तरह काशी की ओर प्रस्थान किया था और वहीं वे स्वर्गवासी हुईं थी और इसलिए अपनी ’आजी’ से मैं कभी नहीं मिल पाया। लेकिन फिर भी मेरा मन उनकी आस्था की सुगंध से सराबोर था। वृंदावन की उस संकरी पर बेहद शीतल ’सेवाकुंज गली’ से गुज़रते हुए मैं वापस लोहानीपुर (कदमकुआँ, पटना) में अपने परदादा स्वर्गीय श्री रामदास तिवारी (जिनको हम सब लोग प्यार से ’बाबा’ कहते थे) के बनाए मकान में पहुँच गया था जहाँ न जाने कितनी गर्मी की छुट्टियाँ हमने परिवार के साथ बिताई थीं। हमारे बाबा वहाँ हमारी माई के साथ रहते थे। माई यानी हमारी दादी अर्थात हमारे बाबा की बहू। सफ़ेद साड़ी पहनने वाली गोरी-सी सुन्दर सी दादी। हम सब माई को पापा (प्रो. बालेन्दु शेखर तिवारी) के पीछे-पीछे माई (भोजपुरी में माँ) ही बुलाते थे।

माई का पूरा नाम श्रीमती लीलावती देवी’ था। माई दिखने में जितनी सुन्दर-अद्भुत थी उतनी ही फ़ुर्तीली-चुस्त भी। लोहानीपुर में सुबह हम लोगों हम आँख मलते हुए उठते तो देखते कि माई नहा-धोकर मंदिर से पूजा कर आई, और हमारे लिए मिठाईवाले की दुकान से ताज़े रसगुल्ले भी साथ लेती आई। क्षण-भर में माई नीचे कमरे में होती थी तो क्षण-भर में छत पर आम-आँवला के अचार के बौयामों (खड़ी बोली हिन्दी में – मर्तबानों) को धूप दिखा रही होती थी। माई को मैंने कभी झुककर चलते हुए नहीं देखा। इतनी सहनशक्ति और जीजिविषा बिरले ही लोगों को मिलती है। लोहानीपुर में मैं हमेशा माई के साथ ही सोता था। सोचता था कि दुनिया की सबसे अच्छी दादी मेरी माई ही है। स्कूलों के खुलने पर जब हम लोग वापस राँची चले आते तो कुछ दिनों में माई और बाबा का लिखा अंतरदेशीय पत्र आता। यह एक अलग किस्म की लिखावट होती थी जिसके हर अक्षर से स्नेह की बूंदे हमारे लिए टपक रही होती थी। हमारे बाबा की इबारत ऐसी होती थी कि उसे पढ़ने के लिए हम बच्चे हँसी-ठिठोली करते थे। लगता था जैसे रेत पर छोटी-छोटी उंगलियों के निशान हों या मुर्गियों ने कोई कहानी लिख दी हो। जहाँ बाबा एक ओर अनुशासनप्रिय और गंभीर थे तो माई उतनी ही सरल और ममतामयी थी। पास में ही हमलोगों का स्कूल चाचा नेहरू विद्यापीठ (डिप्टीपाड़ा, करमटोली राँची) था। माई रोज़ मुझे छोड़ने-लेने आती, साथ में मुझे पिलाने के लिए गाय का गरम दूध भी लिवा लाती । कहीं भी जाने के लिए हमेशा तैयार और वो भी पैदल। थकान का नामोनिशान नहीं। बड़ा हुआ पता चला मेरी इस अलबेली माई जो युवावस्था में ही विधवा हो गई थी, न जाने कितने जतन से अपनी संतानों (यानी मेरे पापा और उनकी दो बहनों) का लालन-पोषण किया था। 1991 में बाबा के गुज़रने के बाद माई ने पटना में अकेले ही रहने का निश्चय किया। मैंने पूछा माई तुम राँची हमारे साथ क्यों नहीं रहती हो, तब माई ने अपनी ठेठ भोजपुरी में जवाब दिया – लोहानीपुर के घर के टोंटी में गंगाजी आवेली। हमरा इनके भिरी रहे में सुखबा। हम तहरा के देखे आइब बबुआ, तू घबड़हिअ  मत । मैं मन-ही-मन उदास होता रहता कि माई हमसे क्यों दूर रहती है। माई का राँची आना-जाना लगा रहता। कुछ ही दिनों में मुहल्ले (मोराबादी, राँची) भर के लोगों से माई की पहचान बन जाती और लोग माई से मिलने आते रहते। लेकिन जैसे-जैसे माई के वापसे जाने की घड़ी नज़दीक आती, मेरी बैचेनी बढ़ती जाती। अन्तिम दिन तो हालत इतनी पतली हो जाती कि माई के स्टेशन ले जाने रिक्शे में बैठने तक मैं अपने आँसुओं को नहीं रोक पाता। यह मेरा दुर्भाग्य ही है जब हमारी प्यारी माई की मृत्यु 2004 में राँची में हुई तब मैं उनके करीब नहीं था।

हमारे दादाजी यथा स्वर्गीय सिद्धिनाथ तिवारी (पूर्व प्रोफ़ेसर हिन्दी, बी.एन.कॉलेज़, पटना) जिनको साक्षात देखने का सौभाग्य मुझे नहीं मिला। दादा जी की याद मुझे उस समय सबसे ज़्यादा आई जब राँची मैंने अपनी बेटी इलिका को पापा की गोद में बैठकर ’गुड़ की लाई’ खाते हुए देखा । दादा की गोद  में होने का सुख क्या होता है मैं इसे कभी महसूस नहीं कर पाया। पर इसे मैं अपनी बेटी की आँखों से महसूस कर रहा था।

किस्सागोई का शौक मुझे पापा से मिला है, आजतक मैंने सबसे अधिक किस्से अपनी माँ (स्वर्गीय विद्या तिवारी) को ही सुनाए हैं। कभी-कभी अहसास नहीं होता कि सुबह-सुबह खूब सारी चाय पिलाने वाली, मेरी हर चर्चा को चाव से सुनने वाली, मुझे दो मर्तबे ज़िन्दगी देने वाली, मेरे हर सवाल पर राय देने वाली, हमेशा खानाखइलऽबबुआ ?, पूछने वाली प्यार की नदी जैसी मेरी माँ अब बहकर बहुत दूर चली गई है।

 

आज कई साल गुज़र गए हैं, आजी, माई, बाबा, दादा और हमारी प्यारी माँ श्रीमती विद्या तिवारी सब-के-सब अब इस दुनिया में नहीं रहे लेकिन उनकी यादें और उनका प्यार विस्मृत नहीं हुआ है। ये किस मिट्टी के लोग थे। ऐसे अद्भुत लोग अब बिरले ही मिलते हैं। ये हिन्दी लोग थे। हिन्दी संस्कृति की आत्मीय सुगंध से आच्छादित। जिनकी बोली में हिन्दीपना था।

हमारे परिवार का हिन्दी भाषा और साहित्य से अटूट रिश्ता है। यह वह परिवार जहाँ बैठकखाने से ही किताबों का अंबार लगना शुरू हो जाता है। पुस्तकों का संग्रह इतना बड़ा है कि दो बड़ी-बड़ी लाइब्रेरियाँ बन जाएँ। जब दो साल पहले मैं नीदरलैंड के लायडन विश्वविद्यालय के हिन्दी व्याख्याता पद का साक्षात्कार देने आया, तो मुझसे पूछा गया था कि आप हिन्दी क्यों पढ़ाना-सिखाना चाहते हैं, इसके जवाब में मैंने कहा था कि मैं अपने खानदान में तीसरी पीढ़ी का हिन्दी अध्यापक हूँ। मेरे दादा और पिता के बाद मेरी बड़ी दीदी (डॉ. संपदा पाण्डेय) और मैं हिन्दी भाषा के पठन-अध्यापन के क्षेत्र में ही कार्यरत हैं। हिन्दी हमारी रग-रग में बसी। जिस तरह मछली जन्म लेने के साथ ही जल में गोते लगाने लगती है उसी तरह हमने भी हिन्दी के इस महाकुंड में तैरना सीखा है। यहाँ तक कि मेरे बड़े भाई (श्री अभीक अवतंस) जो कि राज्य सरकार में उच्चाधिकारी हैं, उन्होंने राज्य सिविल परीक्षा भी हिन्दी विषय लेकर ही उतीर्ण की थी। मेरी दूसरी बड़ी बहन (श्रीमती अंगदा पाण्डेय, एम.एससी) भी भारत के सूदूर दक्षिण में रहते हुए भी हिन्दी की पताका लहरा रही है। वे न सिर्फ़ बंगलूरू के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में जैवविज्ञान की प्राध्यापिका हैं बल्कि अपने बच्चों को हिन्दी-कन्नड़-भोजपुरी-अंग्रेज़ी का समेकित ज्ञान भी दे रहीं हैं।

बढ़ते परायेपन के इस ज़माने में परिवार की स्मृतियों को अशेष रखने का अनुष्ठान है – लीलावती सूजन फाउंडेशन, जिसकी परिकल्पना पापा ने गत वर्ष सोची थी। इसके अंतर्गत हमारे प्रपितामाह स्वर्गीय रामदास तिवारी की स्मृति में ’रामदास सृजन सम्मान’, हमारे पितामह स्वर्गीय डॉ सिद्धिनाथ तिवारी की स्मृति में ’सिद्धिनाथ तिवारी व्यंग्यश्री सम्मान’ और हमारी माँ स्वर्गीय विद्या तिवारी की स्मृति में ’विद्या तिवारी वामाश्री सम्मान’ की स्थापना की गई है। ये पुरस्कार प्रत्येक वर्ष हिन्दी भाषा और साहित्य के क्षेत्र में सुजन-शोध लगे विद्वानों को दिए जाएँगे। भारतीय संस्कृति ही एक अकेली संस्कृति है जिसमें पुरखों के लिए एक पक्ष निर्धारित है, कोई समाज अपने पितरों को इस तरह स्मरण नहीं करता जैसे हम करते हैं। इसी कड़ी में लीलावती सृजन फाउंडेशन भी है। 

Believe !

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Over the past few years, whenever the new year looms large, a bagful of anxiety envelops me and a wave of uncertainty starts running down in my thoughts like the tides of an ocean coming back and forth. Likewise the dawn of  2014 also brought a lot of anticipation and uncertainties in my mind. But I have come to realize that when we start believing people around us, then everything ends well. The bond of love is so strong that nothing in the world can shake you up. There is no use of having any bad feelings towards anybody and especially for your loved ones and family. Everybody is here in this world for a few days, and we should try to spend this time with lots of love and care for others without petty complains.

This time I met my family with an open heart, and as it was expected the happiness quotient increased manifold for everybody. Instead of the ‘the art of living’ I realized it is better to learn about ‘the art of giving’. It is the ‘act of giving’ which gives us happiness and lots of goodwill. This ‘art of giving’ I have learnt from my dear father and late mother who gave us so much of love and blessings that for eternity we can stand up in front of any obstacle we may face in life with guts and optimism. We have to start believing first in ourselves and then have faith in all the people around us. This will make our life much easier and happier. Being optimistic is the best way to face any challenge. And above all keep your unflinching faith in the Almighty. I don’t  know whether bad Karma has any effect or not I do know that good Karma never leaves you when you are in dire need of blessings. And long after when we are gone forever this good Karma continues helping our children in their life (my life is full of its example, thanks to Mummi and Papa). God is good all the time.  

The new year brought me my 10th Judgement Day and thanks to the blessings of my late mother with her unflinching faith in God, the day went very smooth and ended in a big smile for everyone. Thanks to the expertise of DMSA and his staff, the whole ordeal was a success. Thank you very much DMSA. Sometimes I think the persona of God on earth is evident in only one person on earth and who is none other than father. There is no doubt that one who creates us always takes care of us. Thank you papa ! I should also not forget the unparalleled support of brother Suresh, brother Mundya Ram ji, brother Anil ji and his family  who made my stay in the city of Taj very homely and comfortable. Thank you is a small word for my big brother, my sisters who not only love me as the youngest of the family but also accept me the way I am. Thank you very much Mrs Mary (Shilong) for always keeping me in your prayers and attending my erratic calls. And how can I forget to mention Undrush who is my lifemate (jivansangini). It is she who stood by me in all thick and thins while taking care of me all these times. And last but not the least the unadulterated love of my 10 months cutie-pie daughter Ilika whose love for me is like a bright star which shines the paths of our life in a very innocent way. I love you all ! God bless you !

Again few lines to close this thanking note :

1. Always have faith in God. God is good all the time.

2. Learn the art of Giving, rather than accumulating. Giving gives immense pleasure. Start from giving something to your parents like a small visit.

3. Enjoy small pleasures in life, rather than waiting for big splashes of happiness.

4. Eat / drink healthy food cooked by yourself or someone who loves you.

5. Drink lots of Green Tea or any tea

6 Walk / jog regularly

प्यार का सागर

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अब स्वर्ग में रहने वाली मेरी माँ श्रीमती विद्या तिवारी के लिए जिन्होंने हमें अपने प्यार और दुलार से सींच कर बड़ा किया । ख़ुद हज़ारों कष्ट झेलते हुए हमें हमेशा आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। ममता, आस्था और धर्मपरायणता की साक्षात मूर्ति थी मेरी माँ। हे भगवान आपसे यही प्रार्थना है कि यदि मेरा अगला जन्म हो, तो मुझे इसी माँ की कोख से जन्म दीजिएगा ।

“तू प्यार का सागर है

तेरी इक बूँद के प्यासे हम
लौटा जो दिया तूने, चले जायेंगे जहाँ से हम
तू प्यार का सागर है …

घायल मन का, पागल पंछी उड़ने को बेक़रार
पंख हैं कोमल, आँख है धुँधली, जाना है सागर पार
जाना है सागर पार
अब तू ही इसे समझा, राह भूले थे कहाँ से हम
तू प्यार का सागर है …

इधर झूमती गाये ज़िंदगी, उधर है मौत खड़ी
कोई क्या जाने कहाँ है सीमा, उलझन आन पड़ी
उलझन आन पड़ी
कानों में ज़रा कह दे, कि आये कौन दिशा से हम
तू प्यार का सागर है …”

फ़िल्म  ’सीमा’ का यह गीत कवि शैलेन्द्र ने लिखा है, और मन्ना डे साहब ने अपनी आवाज़ से इसे प्राण दिए हैं।

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