माये नि मेरिये

माँ की चौथी पुण्यतिथि – 19  मई 2017 पर  

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शायद जुलाई 2010 का महीना रहा होगा जब पहली बार पठानकोट स्टेशन पर उतरा था। पंजाब के सबसे उत्तरी भाग में स्थित पठानकोट शहर अपनी सैनिक छावनी और हिमाचल तथा जम्मू-कश्मीर के लिए यातायात के एक केंद्र के रूप में मशहूर है। मुझे केंद्रीय हिंदी संस्थान (आगरा)  के काम से बरास्ते पठानकोट काँगड़ा जाना था। दिल्ली से मैंने बीती रात ही धौलाधार एक्सप्रेस ट्रेन ली थी।  पठानकोट का नाम हमारे परिवार के लोगों की ज़ुबान  पर पहले से ही मौजूद था। बहुत सालों तक दिल्ली जाने के लिए राँची से  चलनेवाली एकमात्र रेलगाड़ी का नाम हटिया पठानकोट जनता एक्सप्रेस था। जब हमारे परिवार के बच्चों का दिल्ली जाकर पढ़ने का सिलसिला शुरू हुआ तो यह नाम हम सबकी ज़ुबान पर बैठ गया। लेकिन परिवार में  पठानकोट शायद ही कोई गया था। लेकिन उस दिन मैं पहली बार पठानकोट जंक्शन  रेलवे स्टेशन पर खड़ा था।  न जाने क्यों ऐसा लग रहा था कि जैसे यहाँ आ चुका हूँ।  बहुत अपना-सा , जैसे किसी पोटली में बंधा हुआ गुड़ का ढेला। मुझे पठानकोट से काँगड़ा जाने के लिए  बस लेनी थी। बस दोपहर की थी इसलिए शहर में घूमने के लिए 4-5 घंटे का वक़्त था। इस दौरान मैं बाहर शहर में थोड़ा घूमा और पास के ढाबे में दाल-रोटी खाई।  पठानकोट मुझे अपना सा क्यों लगा, इसके जवाब में माँ की स्मृतियाँ छिपी हैं ।   

पंजाब से हमारा बहुत पुराना रिश्ता है। और उस रिश्ते की नींव में हैं माँ  की यादें। पंजाब के बारे में मैंने सबसे पहले माँ  से ही सुना था। वह जगह जहाँ माँ  ने अपने  किशोर जीवन को बिताया था। जालंधर की सैनिक छावनी के चित्र हमारे सामने माँ के उकेरे हुए शब्दचित्रों के ज़रिए ज़ेहन में बसे हुए हैं। हमारे  नानाजी कॉमर्स कॉलेज की अपनी अध्यापक की नौकरी छोड़कर 1962 में भारतीय सेना में कमीशंड अधिकारी चुने गए थे। वे एन.सी.सी. से पहले से जुड़े हुए थे, इसलिए भारत-चीन युद्ध की अक्रांत घड़ी में उनका सेना में शामिल होना स्वाभाविक ही था। नाना-नानी की पहली  संतान होने के नाते माँ  के ऊपर न सिर्फ़ अपनी पढ़ाई का दायित्व था बल्कि अपने छोटे भाई-बहनों को संभालने की बड़ी ज़िम्मेदारी भी थी। नाना-नानी ( स्व. श्री  रामदेव मिश्र और स्व. श्रीमती  गिरिजा देवी) की पाँच संताने थीं – तीन बेटियाँ ( हमारी माँ स्व. श्रीमती विद्या तिवारी, मौसी स्व. श्रीमती कुसुम तिवारी;  श्रीमती ललिता त्रिवेदी) और दो बेटे (मामा श्री सुधांशु मिश्र और स्व. श्री विभांशु मिश्र [गोपालजी]) ।  नाना जी की नौकरी फ़ौज में होने के बाद माँ  ने अपनी स्कूली शिक्षा पंजाब और जम्मू के नगरों में पूरी की। नानी के घरेलू  कामकाज में हाथ बंटाने से लेकर बड़ी बहन की भूमिका माँ  ने बख़ूबी निभाई।

1980 के दशक में टीवी के  दूरदर्शन चैनल पर एक धारावाहिक आता था जिसका नाम था – साँझा चूल्हा। पंजाबी लेखक बलवंत गार्गी द्वारा लिखित इस टीवी सीरियल का शीर्षक गीत सुनते ही माँ  के आँखों की चमक देखते बनती थी। शुक्र है रब्बा, साँझा चूल्हा जलेया…….

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साँझा चूल्हा

पंजाब की लोक परम्परा साँझा चूल्हा पर आधारित यह टी.वी सीरियल पंजाब की औरतों के एक साथ मिलकर रोटियां बनाने की क़वायद के ऊपर केंद्रित था। माँ  हमें बताती थी कि पंजाब में उन्होंने इसे ख़ुद अपनी आँखों से देखा था।  कैसे औरतें अपने-अपने घरों से आटा लेकर आती थीं और साथ मिलाकर एक ही चूल्हे पर रोटियां पकाती थीं। कहा जाता है कि सिख घर्मगुरू गुरूनानक देव जी ने साँझा चूल्हा की परम्परा शुरू करवाई थी। उनकी मंशा थी कि लोग इस बहाने  जात-पात से ऊपर उठकर एक दूसरे से मिले और साथ मिलकर रोटियाँ पकाएँ। हमारे लिए यह सब एकदम नया और अनोखा था, एक दूसरी दुनिया-सा।  मुझे गर्व था कि मेरी माँ एक दूसरी दुनिया में रहकर आई थी।

2007  से 2011 के दौरान जब-जब वे मेरे साथ रहने आगरे आती तब , हम लोग पंजाबी / पहाड़ी लोक गीत बहुत चाव से सुनते। उन दिनों मैंने काँगड़ी बोली पर शब्दकोश बनाने का काम शुरू किया था।  हिमाचल के  पहाड़ी लोक गीत पर आधारित मोहित चौहान का ‘माये नि मेरिये’  मुझे बहुत पसंद था। गाना तो मैं बड़े शौक़ से सुनता था लेकिन पूरा मतलब नहीं समझता था। 2009 में माँ जब मेरे साथ रहने आईं तो मैंने उन्हें यह गीत सुनाया। माँ  ने ही मुझे इस गाने का सही मतलब समझाया। माँ  ने मुझे बताया कि इस गाने में एक लड़की अपनी माँ को बता रही है कि उसे अब शिमला की राहें रास नहीं आतीं क्योंकि उसे चम्बा के रहनेवाले वाले एक लड़के से प्यार हो गया है, और वह चम्बा जाना चाहती है। माँ  ने मुझे इस गाने के बोल लिखवाये थे –

माये नि मेरिये

शिमले दी राहें, चम्बा कितनी इक दूर?

(ओह मेरी प्यारी माँ शिमला की राहों से चम्बा कितनी दूर है ?)

ओये शिमले नी वसना  कसौली नी वसना  

चम्बे जाणा ज़रूर

(मुझे शिमला में नहीं बसना है , कसौली में भी नहीं बसना , मुझे ज़रूर चम्बा जाना है।)  

ओये लाइया मोहब्बता दूर दराजे, हाय

अँखियाँ ते होया कसूर

(मैंने  बहुत दूर अपने प्यार को पाया है, ये मेरी आँखों  का कसूर है)

ओये मैं ता माही वतन नु जांसा

ओ मेरी अंखिया दा नूर

(मैं अपने प्रेमी के देश जाना चाहती हूँ, वही मेरी आँखों की रोशनी है।)  

माये नि मेरिये

शिमले दी राहें, चम्बा कितनी इक दूर?

(ओह मेरी प्यारी माँ शिमला की राहों से चम्बा कितनी दूर है ?)

कभी-कभी सोचता हूँ की वह समय फिर कब लौटेगा?  कितना कुछ जानना – सीखना था माँ  से, लेकिन समय उन्हें हम से बहुत दूर ले गया। न जाने कितनी बातें माँ  हमें बताना चाहती थीं। अपनी कोख में नौ महीने रखकर पाल पोसकर बड़ा करने वाली माँ अपने पीछे कितनी मधुर यादें और सुखद पल छोड़ गई। जीवन नश्वर है यह हम सब जानते हैं लेकिन अपनों से बिछुड़ने के बाद इस सच्चाई  से मुँह मोड़ने को जी चाहता है।          

साल 2017 बहुत दुःख भरा रहा।  इस साल 19 फरवरी को हमारे प्यारे पापा भी  हमें छोड़कर हमेशा-हमेशा के लिए चले गए। मम्मी और पापा की बस अब यादें ही शेष हैं। 

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अभिषेक    

Mandalay in Popular Imagination

U Bein Bridge Transportation at Sunset

Two people crossing U Bein Bridge, at sunset, Amarapura near Mandalay, Myanmar

The second biggest city in Myanmar (Burma) after Yangon (old name – Rangoon) is Mandalay. It sits right in the middle of Myanmar by the bank of river Irrawaddy. It was founded by king Mindon Min in 1857, and was the seat of Burmese royal government  for nearly 26 years before its annexation by the British Empire. Mandalay is also know as the golden city because of it numerous gold tipped pagodas. It is further believed that Lord Buddha visited Mandalay hills, and has prophesied that in the year 1857, a grand city would be established here and it would be an important center of Theravada Buddhism.   

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Rudyard Kipling -  Indian-born British writer.

Rudyard Kipling

Mandalay remains as a nostalgic place of  ”Far East” in popular imagination in the west. Credit for this goes to celebrated Indian born British writer and poet Rudyard Kipling (1865 – 1936). Mandalay was immortalized by  Kipling’s poem ‘Mandalay’ which appeared in the literary weekly The Scots Observer on 21 June 1890. An excerpt is presented below –

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The setting of the poem has been articulated  well by Andrew Selth (2015) 

” Mandalay, a poem of six stanzas in which a former British soldier, discharged from military service and working in a London bank, reviews his experiences during the recent Burma campaign. He expresses his longing for a young Burmese girl, who is described as waiting in idyllic surroundings for her sweetheart to return. This poem, with its timeless themes of idealised romance, cultural fusion and exotic locales, was in large part a reaction to Kipling’s new life in the UK, which he found in stark contrast to sunlit India. “

Although Kipling forever romanticized Mandalay as an exotic and an overtly beautiful place in the ”Far East”, the actual town was not taken in his stride by others such as George Orwell (1903 – 1950), a famous British Writer and critic. Orwell worked as a policeman in Burma, and he described Mandalay as a town of 5 Ps – Pagodas, Pariahs, Pigs, Priests and Prostitutes. 

Despite contrary point of views on Mandalay, it has never failed to conjure up the popular imagination. In her non-fiction book ”Finding George Orwell in Burma” (2011) Emma Larkin retraces George Orwell’s footsteps during the five years he served as a colonial police officer in what was then a province of British India. Emma Larkin writes –

I always find it impossible to say the name ‘Mandalay’ out loud without having at
least a small flutter of excitement. For many foreigners the name conjures up irresistible images of lost oriental kingdoms and tropical splendor. The unofficial Poet Laureate of British colonialism, Rudyard Kipling, is partly responsible for this, through his well-loved poem ‘Mandalay’.

Further impetus to this popular romanticized imagination of Mandalay has been given by British singer Robbie Williams through his song , The Road to Mandalay released in July 2001. The lyrics of The Road to Mandalay were written as a tribute to Williams’ close friendship with Geri Halliwell, an ex-member of famous girl band Spice Girls, and was the 20th best selling single of 2001 in the UK.

Even though much water has flowed through river Irrawaddy, but Mandalay still conjures the images of a mystic city in the far east where one falls in love.

 

References

Selth, Andrew. Kipling, “Mandalay” and Burma in the Popular Imagination, Working Paper No.161 (Southeast Asia Research Centre, City University of Hong Kong, Hong Kong SAR, 2015)

Larkin, Emma. Finding George Orwell in Burma. New York: Penguin, 2011. Print.

 

Boats

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The Taoists have a famous teaching about an empty boat that rams into your boat in the middle of a river. While you probably wouldn’t be angry at an empty boat, you might well become enraged if someone were at its helm. The point of the story is that the parents who didn’t take care of you, the other kids who teased and bullied you as a child, the driver who aggressively tailgated you yesterday – are all in fact empty, rudderless boats. They were compulsively driven to act as they did by their own un-examined wounds, therefore they did not know what they were doing and had little control over it. Just as an empty boat that rams into us isn’t targeting us, so too people who act unkindly are driven along by the unconscious force of their own wounding and pain.
Until we realize this, we will remain prisoners of our grievance, our past, and our victim identity, all of which keep us from opening to the more powerful currents of life and love that are always flowing through the present moment.
#Taoism

Poems from Punjab

इक कुड़ी जिदा नाम मोहब्बत, गुम है, गुम है, गुम है।
“A girl whose name is love, is missing, is missing, is missing”
Shiv Kumar Batalvi ((23 July 1936 – 7 May 1973)
A famous Punjabi language poet with a folk consciousness and modern sensibility, Shiv Kumar excelled with a freshness of vocabulary, diction, imagery and rhythmic flow of words which remain unparalleled in Punjabi poetry. Shiv was born in a village near Sialkot (Pakistan). His family moved to Batala, Gurdaspur (India) after Indian partition in 1947. The pangs of this separation are recurrent themes of this great poet of the land. One of my current favorites composed by Shiv Kumar Batalvi is ”ik kudi jida naam mohabbat, gum hai gum hai” sung by Shahid Mallya in his beautiful voice. From the soundtrack of Udta Punjab (2016)

लोग कहते हैं मेरी आँखें मेरी माँ जैसी हैं।

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19 मई 2013 की वह सुबह याद करके आज भी मन सिहर उठता है। आज फिर वह दिन है। मम्मी को गए हुए आज पूरे तीन साल हो गए। कितना कुछ तुम छोड़ गई। मेरी पत्नी मुझसे हमेशा पूछती है कि तुम हमेशा फोन करके यह क्यों पूछते हो कि खाना खाया कि नहीं, इलिका-औरस ने कुछ खाया कि नहीं? मैं उससे कहता हूँ – मेरी माँ भी मुझसे यही सवाल कई बार पूछती थी। अपनापन है, प्यार है इसमें।

जब आगरे से सीधा विदेश में रहने आया तो कई बार फ़ोन पर पूछती कि रात का खाना खाया कि नहीं, मैं कहता – अरे नहीं मम्मी अभी तो यहाँ तो दोपहर के तीन बज रहे हैं। फिर कहती ऐसा …तुम तो दूसरी दुनिया में चले गए। फिर बोलती कि कुछ खा लेना ठीक। बारहवीं के पश्चात घर से बाहर निकल दिल्ली आने के बाद माँ से बातचीत फ़ोन पर और साथ रहना विश्वविद्यालय की छुट्टियों में ही हो पाता था। एस.टी.डी करने के लिए पैसे भी कम थे और शायद वह समय भी ऐसा था जब अल्हड़पन का ज्वर अपने उफान पर था। जब आगरे में नौकरी करनी शुरू की तब मैं काफ़ी गंभीर और संयमित हो चला था। बाद में ईश्वरीय संयोग (अस्वस्थता) से आगरे में माँ का सानिध्य भरपूर मिला। कई-कई महीने हम लोग साथ रहे। मैंने खाना पकाना माँ से वहीं सीखा (जो आज बहुत मददगार साबित हो रहा है)। और चाय के साथ घंटों बातचीत – दफ़्तर से जुड़ी बातें, किस्से-कहानियाँ , चुटकुले, मेरे विश्वविद्यालय के दिनों की घटनाएँ, अंदमान की स्मृतियाँ, वृंदावन के मेरे अनुभव, मेरी प्रेम गाथाएँ और बहुत कुछ। इन सबके बीच एक बेहतरीन श्रोता और फ़ीडबैक देने के लिए मौज़ूद थी माँ।

उन दिनों मैं हिन्दी संस्थान के भोजपुरी-हिन्दी-अंग्रेज़ी शब्दकोश पर काम भी कर रहा था। हर दिन कुछ अनोखे शब्द मिलते और हमारी बातचीत उनके सही मतलब और प्रयोग पर होती रहती। मैंने पाया कि माँ पिताजी से कहीं ज़्यादा प्रभावशाली भोजपुरी जानती थी। शायद यह उनकी ठेठ ग्रामीण पॄष्ठभूमि से भी वास्ता रखता था जबकि पिताजी सदैव राजधानी में ही रहे थे। आगरे में हमारे निवास की बालकोनी में सूखने के लिए फैलाईं साड़ियाँ देखकर सब मुहल्ले वाले समझ जाते थे कि अभिषेक की माताजी आ गईं है, फिर लोगों का आना शुरू होता। सबलोगों से मिलना और उन्हें चाय पिए बगैर न जाने देने की रस्म निभाई जाती।

माँ को आगरा बहुत रास आता था, कभी-कभी अस्वस्थ रहती थी, लेकिन आगरे का ठेठ देसीपना उन्हें बहुत भाता था। दिन बीतते देर न लगी। फिर मैं विदेश आ गया, माँ अस्वस्थ रहती थी, मेरा भारत आना-जाना हर छह महीनों में लगा रहता था। जनवरी 2013 में जब आखिरी बार मिला तो माँ ने आँसुओं से भरी आँखों से मुझे विदाई दी। ठीक पाँच महीनों में वे चली गईं। मैं असहाय यहीं पड़ा रहा। माँ ने उसके पिछले हफ़्ते ही मुझसे फ़ोन पर कहा था कि बेटा मैं अब तुमसे नहीं मिल पाऊँगी, कुछ खा लेना। 19 मई की उस सुबह मैं परदेश में ही था, जब यह ख़बर मुझे मिली कि वह सच कह रही थी। जाने किस जल्दी में थी। लोग कहते हैं मेरी आँखें मेरी माँ जैसी हैं, यूँ ही भरी हैं पानी से मगर तुम्हारी राह देखती हैं।

कोइलवर पुल (आरा, बिहार, भारत)

बिहार की राजधानी और पटना और भोजपुर जिले के मुख्यालय आरा के बीच बने इस ऐतिहासिक पुल को 1862 में अंग्रेज़ इंजीनियरों ने भारतीय मज़दूरों के सहयोग से बनाया था। यह एक दोहरा पुल है जिसमें ऊपर रेलगाड़ी का रास्ता है और नीचे सड़क है। पुल की तस्वीर के साथ दुष्यंत कुमार (1933-1975) की कविता।
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अपने पुरखों के लिए

Banaras Ganga Ghat

Banaras Ganga Ghat

नोट – यह संस्मरण मूलत: लीलावती सृजन फ़ाउंडेशन की स्मारिका [May 2014] में छपा था।

अभिषेक अवतंस (लायडन, नीदरलैण्ड)

2008 मई की तपतपाती सुबह मैं कृष्ण भक्तों के बुलावे पर बरास्ते मथुरा वृंदावन जा रहा था। वृंदावन जाने का आशय यह था कि वहाँ मुझे कुछ विदेशी कृष्णभक्तों को हिन्दी बोलना-लिखना सिखाना था। सनातन परंपरा में तीर्थों का बड़ा महत्व है और इसी कारणवश बस के मथुरा में प्रवेश करते ही मुझे अपनी माँ की बताई वह बात याद आ गई कि हमारी ’आजी’ यानी मेरी परदादी ने भी मेरे जन्म से कुछ महीने पहले इसी तरह काशी की ओर प्रस्थान किया था और वहीं वे स्वर्गवासी हुईं थी और इसलिए अपनी ’आजी’ से मैं कभी नहीं मिल पाया। लेकिन फिर भी मेरा मन उनकी आस्था की सुगंध से सराबोर था। वृंदावन की उस संकरी पर बेहद शीतल ’सेवाकुंज गली’ से गुज़रते हुए मैं वापस लोहानीपुर (कदमकुआँ, पटना) में अपने परदादा स्वर्गीय श्री रामदास तिवारी (जिनको हम सब लोग प्यार से ’बाबा’ कहते थे) के बनाए मकान में पहुँच गया था जहाँ न जाने कितनी गर्मी की छुट्टियाँ हमने परिवार के साथ बिताई थीं। हमारे बाबा वहाँ हमारी माई के साथ रहते थे। माई यानी हमारी दादी अर्थात हमारे बाबा की बहू। सफ़ेद साड़ी पहनने वाली गोरी-सी सुन्दर सी दादी। हम सब माई को पापा (प्रो. बालेन्दु शेखर तिवारी) के पीछे-पीछे माई (भोजपुरी में माँ) ही बुलाते थे।

माई का पूरा नाम श्रीमती लीलावती देवी’ था। माई दिखने में जितनी सुन्दर-अद्भुत थी उतनी ही फ़ुर्तीली-चुस्त भी। लोहानीपुर में सुबह हम लोगों हम आँख मलते हुए उठते तो देखते कि माई नहा-धोकर मंदिर से पूजा कर आई, और हमारे लिए मिठाईवाले की दुकान से ताज़े रसगुल्ले भी साथ लेती आई। क्षण-भर में माई नीचे कमरे में होती थी तो क्षण-भर में छत पर आम-आँवला के अचार के बौयामों (खड़ी बोली हिन्दी में – मर्तबानों) को धूप दिखा रही होती थी। माई को मैंने कभी झुककर चलते हुए नहीं देखा। इतनी सहनशक्ति और जीजिविषा बिरले ही लोगों को मिलती है। लोहानीपुर में मैं हमेशा माई के साथ ही सोता था। सोचता था कि दुनिया की सबसे अच्छी दादी मेरी माई ही है। स्कूलों के खुलने पर जब हम लोग वापस राँची चले आते तो कुछ दिनों में माई और बाबा का लिखा अंतरदेशीय पत्र आता। यह एक अलग किस्म की लिखावट होती थी जिसके हर अक्षर से स्नेह की बूंदे हमारे लिए टपक रही होती थी। हमारे बाबा की इबारत ऐसी होती थी कि उसे पढ़ने के लिए हम बच्चे हँसी-ठिठोली करते थे। लगता था जैसे रेत पर छोटी-छोटी उंगलियों के निशान हों या मुर्गियों ने कोई कहानी लिख दी हो। जहाँ बाबा एक ओर अनुशासनप्रिय और गंभीर थे तो माई उतनी ही सरल और ममतामयी थी। पास में ही हमलोगों का स्कूल चाचा नेहरू विद्यापीठ (डिप्टीपाड़ा, करमटोली राँची) था। माई रोज़ मुझे छोड़ने-लेने आती, साथ में मुझे पिलाने के लिए गाय का गरम दूध भी लिवा लाती । कहीं भी जाने के लिए हमेशा तैयार और वो भी पैदल। थकान का नामोनिशान नहीं। बड़ा हुआ पता चला मेरी इस अलबेली माई जो युवावस्था में ही विधवा हो गई थी, न जाने कितने जतन से अपनी संतानों (यानी मेरे पापा और उनकी दो बहनों) का लालन-पोषण किया था। 1991 में बाबा के गुज़रने के बाद माई ने पटना में अकेले ही रहने का निश्चय किया। मैंने पूछा माई तुम राँची हमारे साथ क्यों नहीं रहती हो, तब माई ने अपनी ठेठ भोजपुरी में जवाब दिया – लोहानीपुर के घर के टोंटी में गंगाजी आवेली। हमरा इनके भिरी रहे में सुखबा। हम तहरा के देखे आइब बबुआ, तू घबड़हिअ  मत । मैं मन-ही-मन उदास होता रहता कि माई हमसे क्यों दूर रहती है। माई का राँची आना-जाना लगा रहता। कुछ ही दिनों में मुहल्ले (मोराबादी, राँची) भर के लोगों से माई की पहचान बन जाती और लोग माई से मिलने आते रहते। लेकिन जैसे-जैसे माई के वापसे जाने की घड़ी नज़दीक आती, मेरी बैचेनी बढ़ती जाती। अन्तिम दिन तो हालत इतनी पतली हो जाती कि माई के स्टेशन ले जाने रिक्शे में बैठने तक मैं अपने आँसुओं को नहीं रोक पाता। यह मेरा दुर्भाग्य ही है जब हमारी प्यारी माई की मृत्यु 2004 में राँची में हुई तब मैं उनके करीब नहीं था।

हमारे दादाजी यथा स्वर्गीय सिद्धिनाथ तिवारी (पूर्व प्रोफ़ेसर हिन्दी, बी.एन.कॉलेज़, पटना) जिनको साक्षात देखने का सौभाग्य मुझे नहीं मिला। दादा जी की याद मुझे उस समय सबसे ज़्यादा आई जब राँची मैंने अपनी बेटी इलिका को पापा की गोद में बैठकर ’गुड़ की लाई’ खाते हुए देखा । दादा की गोद  में होने का सुख क्या होता है मैं इसे कभी महसूस नहीं कर पाया। पर इसे मैं अपनी बेटी की आँखों से महसूस कर रहा था।

किस्सागोई का शौक मुझे पापा से मिला है, आजतक मैंने सबसे अधिक किस्से अपनी माँ (स्वर्गीय विद्या तिवारी) को ही सुनाए हैं। कभी-कभी अहसास नहीं होता कि सुबह-सुबह खूब सारी चाय पिलाने वाली, मेरी हर चर्चा को चाव से सुनने वाली, मुझे दो मर्तबे ज़िन्दगी देने वाली, मेरे हर सवाल पर राय देने वाली, हमेशा खानाखइलऽबबुआ ?, पूछने वाली प्यार की नदी जैसी मेरी माँ अब बहकर बहुत दूर चली गई है।

 

आज कई साल गुज़र गए हैं, आजी, माई, बाबा, दादा और हमारी प्यारी माँ श्रीमती विद्या तिवारी सब-के-सब अब इस दुनिया में नहीं रहे लेकिन उनकी यादें और उनका प्यार विस्मृत नहीं हुआ है। ये किस मिट्टी के लोग थे। ऐसे अद्भुत लोग अब बिरले ही मिलते हैं। ये हिन्दी लोग थे। हिन्दी संस्कृति की आत्मीय सुगंध से आच्छादित। जिनकी बोली में हिन्दीपना था।

हमारे परिवार का हिन्दी भाषा और साहित्य से अटूट रिश्ता है। यह वह परिवार जहाँ बैठकखाने से ही किताबों का अंबार लगना शुरू हो जाता है। पुस्तकों का संग्रह इतना बड़ा है कि दो बड़ी-बड़ी लाइब्रेरियाँ बन जाएँ। जब दो साल पहले मैं नीदरलैंड के लायडन विश्वविद्यालय के हिन्दी व्याख्याता पद का साक्षात्कार देने आया, तो मुझसे पूछा गया था कि आप हिन्दी क्यों पढ़ाना-सिखाना चाहते हैं, इसके जवाब में मैंने कहा था कि मैं अपने खानदान में तीसरी पीढ़ी का हिन्दी अध्यापक हूँ। मेरे दादा और पिता के बाद मेरी बड़ी दीदी (डॉ. संपदा पाण्डेय) और मैं हिन्दी भाषा के पठन-अध्यापन के क्षेत्र में ही कार्यरत हैं। हिन्दी हमारी रग-रग में बसी। जिस तरह मछली जन्म लेने के साथ ही जल में गोते लगाने लगती है उसी तरह हमने भी हिन्दी के इस महाकुंड में तैरना सीखा है। यहाँ तक कि मेरे बड़े भाई (श्री अभीक अवतंस) जो कि राज्य सरकार में उच्चाधिकारी हैं, उन्होंने राज्य सिविल परीक्षा भी हिन्दी विषय लेकर ही उतीर्ण की थी। मेरी दूसरी बड़ी बहन (श्रीमती अंगदा पाण्डेय, एम.एससी) भी भारत के सूदूर दक्षिण में रहते हुए भी हिन्दी की पताका लहरा रही है। वे न सिर्फ़ बंगलूरू के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में जैवविज्ञान की प्राध्यापिका हैं बल्कि अपने बच्चों को हिन्दी-कन्नड़-भोजपुरी-अंग्रेज़ी का समेकित ज्ञान भी दे रहीं हैं।

बढ़ते परायेपन के इस ज़माने में परिवार की स्मृतियों को अशेष रखने का अनुष्ठान है – लीलावती सूजन फाउंडेशन, जिसकी परिकल्पना पापा ने गत वर्ष सोची थी। इसके अंतर्गत हमारे प्रपितामाह स्वर्गीय रामदास तिवारी की स्मृति में ’रामदास सृजन सम्मान’, हमारे पितामह स्वर्गीय डॉ सिद्धिनाथ तिवारी की स्मृति में ’सिद्धिनाथ तिवारी व्यंग्यश्री सम्मान’ और हमारी माँ स्वर्गीय विद्या तिवारी की स्मृति में ’विद्या तिवारी वामाश्री सम्मान’ की स्थापना की गई है। ये पुरस्कार प्रत्येक वर्ष हिन्दी भाषा और साहित्य के क्षेत्र में सुजन-शोध लगे विद्वानों को दिए जाएँगे। भारतीय संस्कृति ही एक अकेली संस्कृति है जिसमें पुरखों के लिए एक पक्ष निर्धारित है, कोई समाज अपने पितरों को इस तरह स्मरण नहीं करता जैसे हम करते हैं। इसी कड़ी में लीलावती सृजन फाउंडेशन भी है।