ओला डायरी # 1

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सुबह के ठीक साढ़े आठ बज रहे हैं। मैसूरू जानेवाली 11 बजे की शताब्दी एक्सप्रेस लेने के लिए हमने सुबह थोड़ा जल्दी ही निकलने का फ़ैसला किया है। बंगलुरू के ट्रैफ़िक और बसों की हड़ताल का असर सड़कों पर दिखने का अंदेशा है। ओला वालों को उनके एप पर जे.पी. नगर आने का संदेश दे दिया है। मकान से बाहर निकलते देखा कि बाहर ओला टैक्सी हमारा इंतज़ार कर रही है। गाड़ी कोई ख़ास बड़ी नहीं है – इंडिका – वी 2 है।  बहन टैक्सी वाले से कन्नड़ में कुछ कहती है। शायद यह कि हमें कहाँ जाना है, और ट्रेन का समय वग़ैरह। हम लोग टैक्सी में बैठते। बच्चे अपनी माँ के साथ पीछे बैठे हैं और मैं ड्राइवर के साथवाली सीट पर। ड्राइवर मुझसे हिन्दी में पूछता है – आपको मैजिस्टिक जाना है सर? मैंने कहा – जी हाँ – वहीं बैंगलोर सिटी रेलवे स्टेशन। मैसूरु जानेवाली शताब्दी पकड़नी है।

कुछ दूर आगे बढ़ते ही बड़े अपार्टमेन्ट कॉमप्लेक्सों के अहाते से बाहर की दुनिया दिखाई दे रही। लोग चाय-नाश्ते की दुकानों पर खड़े हैं। आज रविवार है ऐसा लग नहीं रहा, सड़क पर काफ़ी भीड़ है। सड़कों के किनारे कचरा फैल रहा है। खाली पड़ी ज़मीन पर लोगों ने कचरे का अंबार लगा दिया है। मैं मन ही मन सोचता हूँ – भारत की तथाकथित सिलिकॉन वैली बैंगलोर में भी वही हाल है कचरे का – स्वच्छ भारत अभियान गया तेल लेने। पत्नी को कहता हूँ – look,  that is the main difference between ‘’here’’ and ‘’there’’.

मैं खिड़की से बाहर देख ही रहा हूँ कि अचानक मेरे कानों में कुछ अलग-सा सुनाई देता है – “तुमी कि कोरी आसे। मोइ ना जानू….

देखा तो ड्राइवर महोदय अपने इयरफ़ोन के द्वारा किसी से से फ़ोन पर बात कर रहे हैं। कुछ देर मैं बातचीत ख़त्म हो जाती है।

मैं पूछता हूँ – भैया आप आसाम से हैं?

ओला ड्राइवर – जी, आपको कैसे मालूम?

मैं कहता हूँ – भाल आसु भाईटी? आजिर बोतोर भाल आसे। हा हा हा, (हँसते हुए) आप फ़ोन पर अहोमिया में बात कर रहे थे न, इसलिए। और यहाँ डैशबोर्ड आपकी आईडी पर भी लिखा है – राज बोड़ो। आप बोड़ोलैंड से हैं। कोकराझार?

ओला ड्राइवर – आप अहोमिया समझते हैं? आपको तो आसाम के बारे में बहुत कुछ मालूम है सर। आप वहाँ गए हैं? मेरा घर कोकराझार के पास है ही है। मेरे मदर-फ़ादर और भाई लोग वहीं रहते हैं।

मैं कहता हूँ – हाँ दो-तीन बार गया हूँ – नोर्थ-ईस्ट के मेरे कई दोस्त रहे हैं। जब दिल्ली में पढ़ता था तब। शिलांग भी आना जाना लगा रहता है। मैं दो बार नागालैंड भी गया हूँ। आप यहाँ बैंगलोर कैसे आए?

ओला ड्राइवर – मेरी बड़ी बहन यहाँ रहती है। उसके पास 7 साल पहले यहाँ आया था। फिर कुछ दिन बाद गाड़ी चलाना सीख लिया। और अब अपनी गाड़ी ले ली। ये गाड़ी अपनी है। दो साल पहले ख़रीदी है। यहाँ नोर्थ ईस्ट के बहुत लोग रहते हैं। ड्राइविंग लाइन में बहुत कम हैं। बोड़ो में मैं शायद अकेला हूँ। मणिपुर के लोग होटेलिंग में बहुत काम करते हैं। ड्राइविंग में लोकल और तमिल ज़्यादा हैं।

मैं: बहुत बढ़िया, अच्छा काम किया। आप गाड़ी सिर्फ़ ओला के लिए चलाते हैं?

ओला ड्राइवर: नहीं नहीं – ओला का काम मैं सिर्फ़ सुबह या रात को लेता हूँ। बाक़ी टाइम में बी.एस.एन.एल के लिए काम करता हूँ। 11 बजे से काम शुरू होता है। मेरा ऑफ़िस मैंजिस्टिक के पास ही है, इसलिए ओला से आपकी भी सवारी ले ली।

मैं: आप बी.एस.एन.एल के दफ़्तर में काम करते हैं? क्या काम करते हैं?

ओला ड्राइवर: नहीं गाड़ी ही चलाता हूँ। बी.एस.एन.एल. को ये गाड़ी लीज़ पर दी है। हर दिन उनके इंजीनियर को लेकर जाना होता है।

मैं: अच्छा यह बहुत बढ़िया है। काफ़ी पैसे मिलते होंगे। इंजीनियर लोग कहाँ जाते हैं?

ओला ड्राइवर: यही टावर –बावर को देखने जाते हैं। कोई प्रोब्लेम होने से जाते हैं। एक दिन एक टावर तो देखते ही हैं। एक महीना का बीस हज़ार देते हैं। गाड़ी और डीज़ल मेरे अपने हैं। ओला और बी.एस.एन.एल जोड़कर एक महीने में 30-32 कमा लेता हूँ।

मैं: यह बहुत अच्छी बात है। आप यंग हैं और बहुत मेहनती हैं। और आप हिन्दी भी बहुत अच्छी बोलते हैं।

ओला ड्राइवर: बी.एस.एन.एल का काम मेरा तीन बजे तक ख़त्म हो जाता है। इंजीनियर लोग एक दिन में एक ही कंप्लेन देखते हैं। वहाँ से आने के बाद छुट्टी। चार बजे तक मैं घर वापिस आ जाता हूँ।

मैं: बहुत लंबा जाना पड़ता होगा आपको? इसमें तो बहुत डीज़ल जाएगा।

ओला ड्राइवर: नहीं बहुत लंबा नहीं। हर ऑफ़िस का अपना सर्किल है। उसी में जाना होता है। वैसे बंगलोर बहुत बड़ा शहर है। लंबा जाने से मुश्किल हो जाएगी।

मैं: अच्छा-अच्छा यह ठीक है। आप कन्नड़ बोल लेते हैं? मैंने सुना आप कन्नड़ बोल रहे थे?

ओला ड्राइवर: जी बोलता हूँ। यहाँ काम करने के लिए लैंग्वेज सीखना ज़रूरी है।

मैं: कन्नड़ कहाँ सीखी आपने?

ओला ड्राइवर: वो पहले जो मेरा मकान मालिक था ना, उन लोगों ने सिखाया मुझे। उसकी फ़ैमिली में सब लोग सिर्फ़ कन्नड़ और तेलुगु ही बोलते-समझते थे। इसलिए बोल-बोल के सीख गया। दो साल तक मेरे मकान मालिक ने मुझसे सिर्फ़ कन्नड़ में बात किया, फिर मैं सीख गया। अब बोल लेता हूँ।

मैं: यह तो कमाल की बात है। बहुत अच्छा। अभी कुछ साल पहले यहाँ लफ़ड़ा हुआ था ना, सब नोर्थ ईस्ट वालों को बैंगलोर से भागना पड़ा था। कुछ ख़ून-खराबा हुआ था। मुझे साल याद नहीं है।

ओला ड्राइवर: ये केस अगस्त 2012  का है सर। सब लोगों को यहाँ से भागना पड़ा था। लेकिन मैं नहीं गया। मेरा पुलिस में एक लोकल दोस्त है। उसने मुझे अपना नंबर देकर कहा कि कोई प्रोब्लेम होने पर फ़ोन करना। मैं वापस नहीं गया लेकिन बहुत सारे लोग भाग गए थे। सबके फ़ोन पर मैसेज आया था कि यहाँ रहने वाले नौर्थ ईस्ट के लोगों को मारना है। रेलवे ने स्पेशल ट्रेन भी चलवाई थी। कुछ मारपीट हुई थी लेकिन ज़्यादा लोग डर गए थे।

मैं: कौन मारना चाहता था?

ओला ड्राइवर : यहाँ के कुछ लोकल मोहम्मडन लोग। वहाँ आसाम में कोकराझार में दंगा हुआ। उसी का बदला यहाँ लेने का बात कर रहे थे। लेकिन ज़्यादा कुछ नहीं हुआ। यहाँ के लोकल कन्नडिगा और पुलिस ने बहुत कंट्रोल किया।  

मैं: चलिए अच्छी बात है। आप सब लोग सेफ़ है यहाँ पर।

ओला ड्राइवर: आप यहाँ घूमने आए हैं सर? कहाँ रहते हैं?

मैं: मेरी बहन यहाँ रहती है। हमलोग उसी से मिलने आए हैं। फ़िलहाल फ़ौरेन में रहते हैं।

ओला ड्राइवर : लीजिए आपका मैजिस्टिक आ गया।

मैं: कितने पैसे हुए? थैंक यू।

 

 

 

 

 

कुछ बोध कथाएँ

अपनी झोली

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दो आदमी यात्रा पर निकले। दोनों की मुलाकात हुई। दोनों यात्रा में एक साथ जाने लगे। दस दिनों के बाद दोनों के अलग होने का समय आया तो एक ने कहा, ‘भाईसाहब! एक दस दिनों तक हम दोनों साथ रहे। क्या आपने मुझे पहचाना?’ दूसरे ने कहा, ‘नहीं, मैंने तो नहीं पहचाना।’ वह बोला, ‘माफ़ करें मैं एक नामी ठग हूं। लेकिन आप तो महाठग हैं। आप मेरे भी उस्ताद निकले।’

‘कैसे?’ ‘कुछ पाने की आशा में मैंने निरंतर दस दिनों तक आपकी तलाशी ली, मुझे कुछ भी नहीं मिला। इतनी बड़ी यात्रा पर निकले हैं तो क्या आपके पास कुछ भी नहीं है? आप बिल्कुल ख़ाली हाथ हैं?’

‘नहीं, मेरे पास एक बहुत क़ीमती हीरा है और एक सोने का कंगन है ।’

‘तो फिर इतनी कोशिश के बावजूद वह मुझे मिले क्यों नहीं?’

‘बहुत सीधा और सरल उपाय मैंने काम में लिया। मैं जब भी बाहर जाता, वह हीरा और सोने का कंगन तुम्हारी पोटली में रख देता था। तुम सात दिनों तक मेरी झोली टटोलते रहे। अपनी पोटली संभालने की जरूरत ही नहीं समझी। तुम्हें मिलता कहाँ से?’

कहने का मतलब यह कि हम अपनी गठरी संभालने की ज़रूरत नहीं समझते। हमारी निगाह तो दूसरों की झोली पर रहती है। यही हमारी सबसे बड़ी समस्या है। अपनी गठरी टटोलें, अपने आप पर दृष्टिपात करें तो अपनी कमी समझ में आ जाएगी।

 सीमा

Old Woman India

सड़क किनारे एक बुढ़िया अपना ढाबा चलाती थी। एक यात्री आया। दिन भर का थका, उसने विश्राम करने की सोची। बुढिया से कहा, ‘क्या रात के लिए यहाँ आश्रय मिल सकेगा?’ बुढिया ने कहा, क्यों नहीं, आराम से यहां रात भर सो सकते हो।’

यात्री ने पास में पड़ी चारपाइयों की ओर संकेत कर कहा, ‘इस पर सोने का क्या चार्ज लगेगा?’ बुढ़िया ने कहा, ‘चारपाई पर सोने के लिए दस रूपए लगेंगे।’ यात्री ने सोचा रात भर की ही तो बात है। बेकार में दस रूपए क्यों खर्च की जाए। आंगन में काफी जगह है, वहीं सो जाऊंगा।

यह सोचकर उसने फिर कहा, ‘और अगर चारपाई पर न सोकर आंगन की ज़मीन पर ही रात काट लूँ तो क्या लगेगा?’ ‘फिर पूरे सौ रूपए लगेंगे -‘ बुढ़िया ने कहा।

बुढ़िया की बात सुन यात्री को उसके दिमाग पर संदेह हुआ। चारपाई पर सोने के दस रूपए और भूमि पर चादर बिछाकर सोने के लिए सौ रूपए – यह तो बड़ी विचित्र बात है। उसने बुढिया से पूछा, ‘ ऐसा क्यों?’

बुढ़िया ने कहा, ‘चारपाई की सीमा है। तीन फुट चौड़ी, छह फुट लंबी जगह ही घेरोगे। बिना चारपाई सोओगे तो पता नहीं कितनी जगह घेर लो।’ सीमा में रहना ही ठीक है। असीम की बात समस्या पैदा करती है।

भारतीय नरक

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एक बार एक भारतीय व्यक्ति मरकर नरक में पहुँचा,
तो वहाँ उसने देखा कि प्रत्येक व्यक्ति को किसी भी देश के नरक में जाने की छूट है ।
उसने सोचा, चलो अमेरिकावासियों के नरक में जाकर देखें, जब वह वहाँ पहुँचा तो द्वार पर पहरेदार से उसने पूछा – क्यों भाई अमेरिकी नरक में क्या- क्या होता है ? पहरेदार बोला – कुछ खास नहीं, सबसे पहले आपको एक इलेक्ट्रिक चेयर पर एक घंटा बैठाकर करंट दिया जायेगा, फ़िर एक कीलों के बिस्तर पर आपको एक घंटे लिटाया जायेगा, उसके बाद एक यमदूत आकर आपकी जख्मी पीठ पर पचास कोड़े बरसायेगा…
बस! यह सुनकर वह व्यक्ति बहुत घबराया औरउसने रूस के नरक की ओर रुख किया, और वहाँ के पहरेदार से भी वही पूछा, रूस के पहरेदार ने भी लगभग वही वाकया सुनाया जो वह अमेरिका के नरक में सुनकर आया था । फ़िर वह व्यक्ति एक- एक करके सभी देशों के नर्कों के दरवाजे जाकर आया, सभी जगह उसे एक से बढकर एक भयानक किस्से सुनने को मिले । अन्त में थक- हार कर जब वह एक जगह पहुँचा, देखा तो दरवाजे पर लिखा था “भारतीय नरक” और उस दरवाजे के बाहर उस नरक में जाने के लिये लम्बी लाईन लगी थी, लोग भारतीय नरक में जाने को उतावले हो रहे थे, उसने सोचा कि जरूर यहाँ सजा कम मिलती होगी…
तत्काल उसने पहरेदार से पूछा कि यहाँ के नरक में सजा की क्या व्यवस्था है ? पहरेदार ने कहा – कुछ खास नहीं…सबसे पहले आपको एक इलेक्ट्रिक चेयर पर एकघंटा बैठाकर करंट दिया जायेगा, फ़िर एक कीलों के बिस्तर पर आपको एक घंटे लिटाया जायेगा, उसके बाद एक यमदूत आकर आपकी जख्मी पीठ पर पचास कोड़े बरसायेगा… बस !

चकराये हुए व्यक्ति ने उससे पूछा – यही सब तो बाकी देशों के नरक में भी हो रहा है, फ़िर यहाँ इतनी भीड क्यों है ? पहरेदार बोला – इलेक्ट्रिक चेयर तो वही है, लेकिन बिजली नहीं है, कीलों वाले बिस्तर में से कीलें कोई निकाल ले गया है, और कोड़े मारने वाला यमदूत सरकारी कर्मचारी है, आता है, दस्तखत करता है और चाय-नाश्ता करने चला जाता है…औरकभी गलती से जल्दी वापस आ भी गया तो एक-दो कोड़े मारता है और पचास लिख देता है…चलो आ जाओ अन्दर !!

 

लोग कहते हैं मेरी आँखें मेरी माँ जैसी हैं।

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19 मई 2013 की वह सुबह याद करके आज भी मन सिहर उठता है। आज फिर वह दिन है। मम्मी को गए हुए आज पूरे तीन साल हो गए। कितना कुछ तुम छोड़ गई। मेरी पत्नी मुझसे हमेशा पूछती है कि तुम हमेशा फोन करके यह क्यों पूछते हो कि खाना खाया कि नहीं, इलिका-औरस ने कुछ खाया कि नहीं? मैं उससे कहता हूँ – मेरी माँ भी मुझसे यही सवाल कई बार पूछती थी। अपनापन है, प्यार है इसमें।

जब आगरे से सीधा विदेश में रहने आया तो कई बार फ़ोन पर पूछती कि रात का खाना खाया कि नहीं, मैं कहता – अरे नहीं मम्मी अभी तो यहाँ तो दोपहर के तीन बज रहे हैं। फिर कहती ऐसा …तुम तो दूसरी दुनिया में चले गए। फिर बोलती कि कुछ खा लेना ठीक। बारहवीं के पश्चात घर से बाहर निकल दिल्ली आने के बाद माँ से बातचीत फ़ोन पर और साथ रहना विश्वविद्यालय की छुट्टियों में ही हो पाता था। एस.टी.डी करने के लिए पैसे भी कम थे और शायद वह समय भी ऐसा था जब अल्हड़पन का ज्वर अपने उफान पर था। जब आगरे में नौकरी करनी शुरू की तब मैं काफ़ी गंभीर और संयमित हो चला था। बाद में ईश्वरीय संयोग (अस्वस्थता) से आगरे में माँ का सानिध्य भरपूर मिला। कई-कई महीने हम लोग साथ रहे। मैंने खाना पकाना माँ से वहीं सीखा (जो आज बहुत मददगार साबित हो रहा है)। और चाय के साथ घंटों बातचीत – दफ़्तर से जुड़ी बातें, किस्से-कहानियाँ , चुटकुले, मेरे विश्वविद्यालय के दिनों की घटनाएँ, अंदमान की स्मृतियाँ, वृंदावन के मेरे अनुभव, मेरी प्रेम गाथाएँ और बहुत कुछ। इन सबके बीच एक बेहतरीन श्रोता और फ़ीडबैक देने के लिए मौज़ूद थी माँ।

उन दिनों मैं हिन्दी संस्थान के भोजपुरी-हिन्दी-अंग्रेज़ी शब्दकोश पर काम भी कर रहा था। हर दिन कुछ अनोखे शब्द मिलते और हमारी बातचीत उनके सही मतलब और प्रयोग पर होती रहती। मैंने पाया कि माँ पिताजी से कहीं ज़्यादा प्रभावशाली भोजपुरी जानती थी। शायद यह उनकी ठेठ ग्रामीण पॄष्ठभूमि से भी वास्ता रखता था जबकि पिताजी सदैव राजधानी में ही रहे थे। आगरे में हमारे निवास की बालकोनी में सूखने के लिए फैलाईं साड़ियाँ देखकर सब मुहल्ले वाले समझ जाते थे कि अभिषेक की माताजी आ गईं है, फिर लोगों का आना शुरू होता। सबलोगों से मिलना और उन्हें चाय पिए बगैर न जाने देने की रस्म निभाई जाती।

माँ को आगरा बहुत रास आता था, कभी-कभी अस्वस्थ रहती थी, लेकिन आगरे का ठेठ देसीपना उन्हें बहुत भाता था। दिन बीतते देर न लगी। फिर मैं विदेश आ गया, माँ अस्वस्थ रहती थी, मेरा भारत आना-जाना हर छह महीनों में लगा रहता था। जनवरी 2013 में जब आखिरी बार मिला तो माँ ने आँसुओं से भरी आँखों से मुझे विदाई दी। ठीक पाँच महीनों में वे चली गईं। मैं असहाय यहीं पड़ा रहा। माँ ने उसके पिछले हफ़्ते ही मुझसे फ़ोन पर कहा था कि बेटा मैं अब तुमसे नहीं मिल पाऊँगी, कुछ खा लेना। 19 मई की उस सुबह मैं परदेश में ही था, जब यह ख़बर मुझे मिली कि वह सच कह रही थी। जाने किस जल्दी में थी। लोग कहते हैं मेरी आँखें मेरी माँ जैसी हैं, यूँ ही भरी हैं पानी से मगर तुम्हारी राह देखती हैं।

Sadhus of Ayodhya (India)

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Ayodhya (Ayodhyā), also known as Saket, is an ancient city of India, believed to be the birthplace of lord Rama. and setting of the epic Ramayana. It is adjacent to Faizabad city at the south end in the Indian state of Uttar Pradesh. Ayodhya used to be the capital of the ancient Kosala Kingdom. I visited this holy city between 27 July to 5 August 2011 for our fieldwork on Awadhi variety of Hindi (for Hindi Dialects Dictionaries Project of Central Institute of Hindi, Agra). In Ayodhya, I had met several holy men (Sadhus) living or transiting through the city. They were from all around the country. Some from as far as Assam and Maharashtra. Apart from the wealth of information, we gained by talking with them, here are some pictures, I clicked of the Sadhus I met in this holy city.

Look at the styles of markings on forehead (known as ‘Tilak’) of each Sadhu. Sadhus distinguish among themselves by their special style of markings adopted by their respective schools.This Tilak is traditionally done with sandalwood paste and turmeric, lauded in Hindu texts for their purity and cooling nature.

All images copyright – A. Avtans

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Sadhu from Ayodhya

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Sadhu from Ayodhya

 

दाँतों की सफ़ाई

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Indian Dentist

दाँतों की सफ़ाई का ध्यान रखना कितना ज़रुरी है, यह हम सब जानते हैं। पर आपको यह जानकर आश्चर्य होगा मेरे जैसे कई आम भारतीय अपने जीवन में कभी किसी दाँत के डाक्टर के पास नहीं गए होंगे। देश से बाहर जाने के बाद पता चला कि यहाँ साल में दो बार दाँत के डाक्टर के पास जाना अनिवार्य है। इसके लिए आपको अलग से बीमा भी करवाना पड़ता है। बच्चे-वयस्क, बूढ़े-जवान सभी को अपने दाँतो की देखभाल के लिए दाँतों के डाक्टर के जाना पड़ता है। भारत में लोग सिर्फ़ दाँतों की बीमारी या दर्द होने पर दाँतों के डाक्टर के पास जाते हैं।

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An Indian Datun Seller

बहुत साल पहले से भारत के लोग दाँत माँजने  के लिए दातुन का इस्तेमाल करते आ रहे हैं। इसके लिए ख़ास तौर से नीम या बबूल  या मिसवाक की  ताज़ी टहनी इस्तेमाल की जाती है। लेकिन अब शहरों में इसका इस्तेमाल कम होता जा रहा है। लोग टूथब्रश और टूथपेस्ट का इस्तेमाल ज़्यादा करते हैं।

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Datun Sahib

इसी प्रसंग में मैं आपको दातुन साहिब के बारे में बताना चाहता हूँ। दातुन साहिब लद्दाख (जम्मू-कश्मीर, भारत) के मुख्यालय लेह में स्थित एक मिसवाक के पेड़ का नाम है। इस पेड़ को नारंगी रंग के कपड़े में लपेटा गया है। यह जगह लेह के मुख्य बाज़ार के बिल्कुल करीब है। पास में रोटियाँ बनानेवालों की दुकानें है। कथा यह है कि 1517 ईसवी में जब सिख धर्मगुरू गुरूनानक देव जी अपनी दूसरी प्रचार यात्रा ( द्वितीय उदासी) के दौरान लेह पहुँचे थे। यहाँ उन्होंने अपनी दातुन से मिसवाक का पेड़ लगाकर लेह के पहाड़ी रेगिस्तान में हरियाली और सदभाव का संदेश दिया था।

एक बात और कि आमतौर पर भारतीय लोग सुबह-सुबह ही दाँत माँजते हैं, लेकिन पाश्चात्य संस्कृति में सोने से पहले भी दाँतों को माँजना बेहद ज़रूरी है। उसी तरह मैंने अपनी ज़िन्दगी में (अन्य भारतीयों की तरह) कभी फ़्लॉस (दाँत साफ करने का धागा) का इस्तेमाल नहीं किया था। लेकिन अब करने लगा हूँ। अगर आपके दाँत तंदुरुस्त रहेंगे, तो आपकी सेहत अच्छी होगी और आप ज़िंदगी का पूरा-पूरा लुत्फ उठा पाएँगे। अगर यही बात है, तो फिर, क्यों न दाँतों के डॉक्टर के पास जाएँ?

अंत में 1980 के दशक का दूरदर्शन का विज्ञापन। यह विज्ञापन ’डाबर लाल दंत मंजन’ का है। यह आयुर्वेदिक दंतमंजन पहले भारत में काफ़ी लोकप्रिय था। मुझे याद है कि मेरी माँ और दादी भी इसका रोज़ाना इस्तेमाल करती थीं

 

क्या बांग्लादेश में हिन्दी-उर्दू बोली जाती है?

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हाल ही में अख़बारों में बांग्ला देश से जुड़ी एक ख़बर आई कि बांग्लादेश के सिनेमाघरों ने वहाँ के सबसे बड़े फ़िल्म स्टार शकीब ख़ान की फ़िल्मों के बहिष्कार की घोषणा की है। मामला यह था कि पिछले साल लगभग पचास सालों के बाद बांग्लादेश की एक अदालत ने बांग्लादेश में हिन्दी फ़िल्मों के प्रदर्शन पर लगी रोक हटा ली थी। जिसके बाद बांग्लादेशी सेंसर बोर्ड ने बॉलीवुड स्टार सलमान ख़ान की फ़िल्म ’वान्टेड’ को हरी झंडी दिखाई। और यह फ़िल्म जनवरी 2015 के दूसरे हफ़्ते में बड़ी धूमधाम के साथ 45 बांग्लादेशी सिनेमाघरों में रिलीज़ हुई। इस फ़िल्म के प्रदर्शन को रोकने के लिए अभिनेता शकीब ख़ान के नेतृत्व में एक भीड़ ने सिनेमाघरों में तोड़-फोड़ की। इसके बाद सिनेमाघरों ने मिलकर शकीब ख़ान की फ़िल्मों को न दिखाने का फ़ैसला किया।

यह बात अलग है कि बम्बईया फ़िल्मों की बांग्लादेश में जबर्दस्त मांग है, और ज़्यादातर लोग नकल की हुई डीवीडी या वीसीडी पर घर बैठे आराम से फ़िल्में देखते है। सिनेमाघरों में लोगों का जाना  काफ़ी कम हुआ है, और इस वज़ह से सिनेमाघरों के मालिक हिन्दी फ़िल्मों पर से हटी रोक को अपने कारोबार के लिए बहुत अच्छा मानते हैं। ग़ौर फ़रमाएँ तो आप पाएँगे की हिन्दी फ़िल्मों की अधिकांश पायरेटड प्रतियाँ विदेशी वेबाइटों से ही मयस्सर हो रही हैं जिनमें सबसे अधिक लोकप्रिय पाकिस्तानी वेबसाइटें हैं। दूसरी ओर हिन्दी टी.वी. शो और सीरियल बांग्लादेशी घरों में ख़ासे लोकप्रिय हैं। 

इससे से कुछ हटकर एक वाक्या मुझे भी बरास्ता हुआ। कुछ दिनों पहले यहाँ हॉलैण्ड में टहलते हुए सामने से एक भारतीय-सा दिखने वाला जवान जोड़ा दिखाई दिया। मैं उनको देखकर मुस्कुरा दिया, तो वे भी मुस्कुराए।

मैंने पूछा – इंडिया ? वे बोले – नहीं हम लोग बांग्लादेश से हैं।
मैंने कहा – अच्छा, यहाँ कैसे आना हुआ? उस बांग्लादेशी जोड़े ने खाटी हिन्दी-उर्दू में मुझे बताया कि वे लोग यहाँ दो महीनों के लिए आए हुए हैं, और एक जहाज़ बनाने वाली कंपनी में इन्टर्नशीप कर रहे हैं।
मैंने कहा – आप लोग बहुत अच्छी हिन्दी बोलते हैं, आपने हिन्दी कहाँ सीखी?
वे बोले – बम्बईया फ़िल्मों से सीखी, पर हमारी हिन्दी कोई ख़ास नहीं है। यहाँ देखने के लिए कौन-कौन सी जगहे हैं?
मैंने कहा – नहीं आप बहुत अच्छी हिन्दी बोल रहे हैं, और  हमें आप पर नाज़ है। मैं बंगाली आराम से समझ लेता हूँ। और मैंने फ़ौरन कहा – केमोन आछिस, तोमार नाम की?
फिर मैंने उनको विस्तार से यहाँ शहर की देखने लायक चीज़ों का ब्यौरा दिया और हिन्दी में ही दिया।

एक और छोटी मगर अहम बात – मेरे प्रिय गुरु और दोस्त प्रोफ़ेसर भरत सिंह जी ने बताया कि वे जब फ़्रांस की राजधानी पेरिस गए, तब उन्होंने पाया कि वहाँ रहने वाले अधिकांश दक्षिण एशियाई कामगार लोग (यानी पाकिस्तानी, बांग्लादेशी, भारतीय, नेपाली आदि मेहनतकश लोग) आपस में एक विचित्र प्रकार की भाषा में एक-दूसरे से बात करते हैं। वह ज़ुबान फ़्रांसीसी नहीं बल्की फ़्रांसीसी मिली हुई एक अलग किस्म की हिन्दी-उर्दू है। हिन्दी-उर्दू का यह क्रियोल रूप फ़्रांस में भी अपनी जगह बना रहा है।

अब मेरी समझ में आया कि भाषाएँ सरहदें और संकीर्ण मानसिकताओं से कहीं ऊपर उड़ती हुई लोगों को जोड़ती हैं। लोग मादरी ज़ुबानों का कितना भी विरोध कर लें, भाषाएँ लोगों को मिला कर ही रहेंगी।

Photo Credits: Samaa.Tv

In the Music Dreamland of South Asia – Part 1

After living quite sometime away from my homeland (India), I have lately come to realize how much we Indians, Pakistanis, Afghans, Bangladeshis, and Nepalese share in our way of life, music, history, food and love. And one of the most amazing gift which we all share is the south Asian music.

South Asian music ?

Music connects south Asia in a magical way. Have you tried drinking a cold glass of water after a long walk in a hot summer afternoon? That is the kind of sweetness which south Asian music gives to your ear. With the diverse heritage we share in south Asia, it is not surprising that south Asian music is so refreshing.

Despite all the bad press about the country, the kind of music Pakistani musicians make is amazingly fresh as well as fully grounded in our rich south Asian heritage.

Sample this spiritual song (dama dam mast kalander) in Punjabi which was originally composed by Sufi saint Bulle Shah. This version is from the Hindi-Urdu film David (2013)

 

Contrast this with ‘Sahanaa Vavatu’ a classic Sanskrit chant of India composed by Pandit Ravi Shankar. Used as an audio in this documentary on Khadi (traditional Indian cloth)

 

Another good sample is Chal Diye by Zeb & Haniya with Javed Bashir. The raga of this song is called Yaman Kalyan. Javed Bashir is a well-known Hindustani classical vocalist.

Listen to the sweetness of Sajjad Ali’s voice in Tum Naraz ho. This song is reproduced by Coke Studio (Pakistan) in their seventh season. Sajjad Ali has a kind of innocence in his voice which is seldom found in singers of all generations.

 Danah pe Danah is a Balochi folk song in which a shepherd introduces his beloved to the wonders of his land, invoking famous rivers and mountains of Balochistan. Here in this rendition, Akhtar Chanal and Komal Rizvi lend their powerful voice to this folk song.

Another notable music is coming not from Bollywood films but a widely viewed and Amir Khan hosted TV talk show ‘Satyameva Jayate’. Ram Sampath is the composer for ‘Satyameva Jayate, who has sung and composed for this TV show. One of my favorite is Dheere Dheere Haule Halue (slowly slowly, quietly quietly) which was composed for the TV episode on Child sexual abuse.

And here is Mahesh Vinaykam singing all famous Sanskrit shloka ‘Gurur Brahma Gurur Vishnu Gurudevo Maheshwara’

Another gem by Shruti box of Shankar Tucker ‘O re piya’ sung by Rohan Kaimal ft Shankar Tucker

And some Bollywood gems in semi-classical genre – 
Ye tune kya kiya (what have you done?) sung by Javed Bashir

Maula Mere Maula by Roop Kumar Rathod