lahore to seoul

पाकिस्तान के आबिद शेख़ ने लाहौर से बीए की पढाई की और एक ट्रैवल एजेन्सी में हवाई टिकट बनाने का काम करते थे। 1996 में आबिद शेख़ ग़ैरक़ानूनी तरीके से दक्षिण कोरिया गये थे। लेकिन इसके लिए पहले उन्हें 1995 में कम्बोडिया जाना पड़ा। दरअसल उस दौरान पाकिस्तानी नागरिकों के लिए कंबोडिया में वीज़ा ऑन अरायवल उपलब्ध था। कम्बोडिया की राजधानी पनॉम पेन्ह में उन्होंने कुछ महीने एक ग़ैरसरकारी संस्था के लिए अनुवादक का काम किया। फिर वे एक थाई एजेन्सी के संपर्क में आए जो कोरिया भेजने के लिए कामगारों को ढूंढ रही थी। शर्त यह थी कोरिया में होने वाली कमाई का 25 % वे एजेन्सी को देंगे। और यदि वे ऐसा नहीं करेंगे तो एजेन्सी उन्हें कोरियाई पुलिस से गिरफ़्तार करवा देगी। आबिद इस शर्त को स्वीकार कर 1996 में कोरिया पहुँचे। फर्ज़ी कागज़ात और यात्री वीज़ा दिलवाने के एजेन्सी ने उनसे $ 3500 अमेरिकी डॉलर लिए।

एयरपोर्ट पर वहाँ एक कर्मचारी (जिसके पास उनकी तस्वीर थी) उन्हें उस कतार में खड़ा कर गया, जहाँ से आव्रजन अधिकारी ने उन्हें फ़र्जी कागजों के आधार पर एयर्पोर्ट से बाहर निकाला। सियोल शहर के बाहर आबिद ने एक सीमेंट बनाने वाली कंपनी में काम करना शुरू किया। कारखाने के पास ही एक उपनगरीय रिहायशी इलाके के एक कमरे में अन्य 6 लोगों के साथ उनके रहने का इंतज़ाम किया गया था। कमरे में रहने वाले सभी लोग उनकी तरह ही पाकिस्तानी थे। हर महीने एजेन्सी का कमीशन देने के बाद आबिद के पास $ 600 डॉलर बचते थे। जो शख़्स उनसे हर महीने एजेन्सी का कमीशन लेने आता था, उससे आबिद की दोस्ती हो गई। जिसके ज़रिए आबिद उन लोगों से मिले जो कोरिया में मानव तस्करी का काम करते थे।

कोरिया में दो साल काम करने के बाद उन्होंने एजेन्सी के लोगों को इस बात पर राज़ी किया कि यदि वे उनके पाकिस्तान लौटने का इंतज़ाम करें तो वापिस लौटकर वे लाहौर में एजेन्सी का काम चालू कर सकते हैं। पाकिस्तान लौटकर आबिद ने एजेन्सी का काम शुरू किया और तब से वह हर साल लगभग 80-90 लोगों को कोरिया भिजवाते हैं। इसके लिए प्रत्येक कामगार से वे आमतौर पर $ 17,000 अमेरिकी डॉलर की रकम वसूलते हैं।

आबिद बताते हैं इस रकम का बड़ा हिस्सा कोरिया और पाकिस्तान में स्थित आव्रजन अधिकारियों, एम्बेसी और एजेन्सी के लोगों और स्थानीय पुलिस आदि को जाता है। फिर उनके अपने लिए मुनासिब रकम ही बच पाती है। हाल ही में लाहौर के एक महँगे इलाके में उन्होंने एक फ़्लैट ख़रीदा है। लाहौर में उनका धंधा जम रहा है क्योंकि कोरिया में कामगारों की मांग ज़्यादा है लेकिन जानेवाले लोग कम हैं। इस मांग की वज़ह यह है कि कोरियाई लोग अब नीचे दर्ज़े के घटिया या कमरतोड़ काम नहीं करना चाहते। पाकिस्तान में कई लोग उनके माध्यम से कोरिया जाना चाहते हैं क्योंकि आबिद का व्यवहार अच्छा है और बाज़ार में उनकी काफ़ी इज़्ज़त है। साथ ही वह 1% कमीशन पर कोरिया से पाकिस्तान पैसे भिजवाने की भी सुविधा मुहैया करवाते हैं।

[ 2014 में बासेल (स्वीटज़रलैंण्ड)  में आबिद (नाम बदला हुआ है) से बातचीत पर आधारित]

 

 

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