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हाल ही में अख़बारों में बांग्ला देश से जुड़ी एक ख़बर आई कि बांग्लादेश के सिनेमाघरों ने वहाँ के सबसे बड़े फ़िल्म स्टार शकीब ख़ान की फ़िल्मों के बहिष्कार की घोषणा की है। मामला यह था कि पिछले साल लगभग पचास सालों के बाद बांग्लादेश की एक अदालत ने बांग्लादेश में हिन्दी फ़िल्मों के प्रदर्शन पर लगी रोक हटा ली थी। जिसके बाद बांग्लादेशी सेंसर बोर्ड ने बॉलीवुड स्टार सलमान ख़ान की फ़िल्म ’वान्टेड’ को हरी झंडी दिखाई। और यह फ़िल्म जनवरी 2015 के दूसरे हफ़्ते में बड़ी धूमधाम के साथ 45 बांग्लादेशी सिनेमाघरों में रिलीज़ हुई। इस फ़िल्म के प्रदर्शन को रोकने के लिए अभिनेता शकीब ख़ान के नेतृत्व में एक भीड़ ने सिनेमाघरों में तोड़-फोड़ की। इसके बाद सिनेमाघरों ने मिलकर शकीब ख़ान की फ़िल्मों को न दिखाने का फ़ैसला किया।

यह बात अलग है कि बम्बईया फ़िल्मों की बांग्लादेश में जबर्दस्त मांग है, और ज़्यादातर लोग नकल की हुई डीवीडी या वीसीडी पर घर बैठे आराम से फ़िल्में देखते है। सिनेमाघरों में लोगों का जाना  काफ़ी कम हुआ है, और इस वज़ह से सिनेमाघरों के मालिक हिन्दी फ़िल्मों पर से हटी रोक को अपने कारोबार के लिए बहुत अच्छा मानते हैं। ग़ौर फ़रमाएँ तो आप पाएँगे की हिन्दी फ़िल्मों की अधिकांश पायरेटड प्रतियाँ विदेशी वेबाइटों से ही मयस्सर हो रही हैं जिनमें सबसे अधिक लोकप्रिय पाकिस्तानी वेबसाइटें हैं। दूसरी ओर हिन्दी टी.वी. शो और सीरियल बांग्लादेशी घरों में ख़ासे लोकप्रिय हैं। 

इससे से कुछ हटकर एक वाक्या मुझे भी बरास्ता हुआ। कुछ दिनों पहले यहाँ हॉलैण्ड में टहलते हुए सामने से एक भारतीय-सा दिखने वाला जवान जोड़ा दिखाई दिया। मैं उनको देखकर मुस्कुरा दिया, तो वे भी मुस्कुराए।

मैंने पूछा – इंडिया ? वे बोले – नहीं हम लोग बांग्लादेश से हैं।
मैंने कहा – अच्छा, यहाँ कैसे आना हुआ? उस बांग्लादेशी जोड़े ने खाटी हिन्दी-उर्दू में मुझे बताया कि वे लोग यहाँ दो महीनों के लिए आए हुए हैं, और एक जहाज़ बनाने वाली कंपनी में इन्टर्नशीप कर रहे हैं।
मैंने कहा – आप लोग बहुत अच्छी हिन्दी बोलते हैं, आपने हिन्दी कहाँ सीखी?
वे बोले – बम्बईया फ़िल्मों से सीखी, पर हमारी हिन्दी कोई ख़ास नहीं है। यहाँ देखने के लिए कौन-कौन सी जगहे हैं?
मैंने कहा – नहीं आप बहुत अच्छी हिन्दी बोल रहे हैं, और  हमें आप पर नाज़ है। मैं बंगाली आराम से समझ लेता हूँ। और मैंने फ़ौरन कहा – केमोन आछिस, तोमार नाम की?
फिर मैंने उनको विस्तार से यहाँ शहर की देखने लायक चीज़ों का ब्यौरा दिया और हिन्दी में ही दिया।

एक और छोटी मगर अहम बात – मेरे प्रिय गुरु और दोस्त प्रोफ़ेसर भरत सिंह जी ने बताया कि वे जब फ़्रांस की राजधानी पेरिस गए, तब उन्होंने पाया कि वहाँ रहने वाले अधिकांश दक्षिण एशियाई कामगार लोग (यानी पाकिस्तानी, बांग्लादेशी, भारतीय, नेपाली आदि मेहनतकश लोग) आपस में एक विचित्र प्रकार की भाषा में एक-दूसरे से बात करते हैं। वह ज़ुबान फ़्रांसीसी नहीं बल्की फ़्रांसीसी मिली हुई एक अलग किस्म की हिन्दी-उर्दू है। हिन्दी-उर्दू का यह क्रियोल रूप फ़्रांस में भी अपनी जगह बना रहा है।

अब मेरी समझ में आया कि भाषाएँ सरहदें और संकीर्ण मानसिकताओं से कहीं ऊपर उड़ती हुई लोगों को जोड़ती हैं। लोग मादरी ज़ुबानों का कितना भी विरोध कर लें, भाषाएँ लोगों को मिला कर ही रहेंगी।

Photo Credits: Samaa.Tv

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