Image

Imageमध्य युरोप और भूमध्य सागर के बीचो-बीच बसा देश क्रोएशिया अपने लंबे समुद्र तटों के लिए विश्व प्रसिद्ध है। गले में पहनी जाने वाली टाई और हवा में तैरने वाले पैराशूट के आविष्कारक देश क्रोएशिया में 1000 से ज़्यादा द्वीप हैं जिनमें केवल 50 में ही लोग रहते हैं और इसलिए यह देश युरोपीय पर्यटकों के बीच ख़ासा लोकप्रिय है । क्रोएशिया की राजधानी ज़गरेब है जो पश्चिमी और पूर्वी युरोपीय स्थापत्य और वास्तुकला के अनोखे समिश्रण का एक बेजोड़ नमूना है। यहाँ की मुद्रा ’कुना’ है जो लगभग 11 भारतीय रुपयों के बराबर है। यहाँ के लोग ख़रवास्की भाषा बोलते हैं।  क्रोएशिया जुलाई 2013 से युरोपीय संघ का सद्स्य राष्ट्र भी है। वर्ष 2009 से क्रोएशिया के ज़गरेब विश्वविद्यालय के भारतविद्या विभाग (Indology Department) में भारत सरकार एवं क्रोएशिया सरकार के सहयोग से हिन्दी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति के पठन-पाठन के लिए भारतीय विद्वान आचार्यों को प्रतिनियुक्त किया जा रहा है।

वर्तमान में ज़गरेब विश्वविद्यालय के भारतविद्या विभाग में विज़िटिंग प्रोफ़ेसर और हिन्दी शिक्षण और भाषा विज्ञान के लब्धप्रतिष्ठ आचार्य प्रो. भरत सिंह (केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा) ने पिछले महीने  13 दिसंबर 2013 को क्रोएशिया वासियों को भारतीयता और भारतीय संस्कृति से रूबरू करवाया। अवसर था अमेरिका के हारवर्ड विश्वविद्यालय की प्रोफ़ेसर डायना एल. एक की पुस्तक ‘India: a Sacred Geography’ के ख़रवास्की (क्रोएशियन) अनुवाद Indija Sveta Geographija के भव्य लोकार्पण का। पुस्तक का लोकार्पण समारोह  पुस्तक प्रकाशक डबल रेनबो प्रकाशन द्वारा विश्वविद्यालय के विशाल सभागार में आयोजित किया गया था। समारोह में बीज वक्तव्य प्रो भरत सिंह द्वारा ’भारतीय संस्कृति’ विषय पर दिया गया। क्रोएशिया की दिसंबर की भीषण सर्दी में भी सभागार में लगभग छ: सौ लोगों की उपस्थिति थी। इन सब क्रोएशियाई विद्वानों और सुधी-जनों के बीच प्रो. भरत सिंह ने अपने निराले अंदाज़ में लोगों को भारतीयता का पाठ पढ़ाया। हिन्दी भाषा में दिए गए उनके  बीज भाषण का समांतर भाषांतरण क्रोएशिया की राष्ट्रभाषा ख़रवास्की में किया जा रहा था। अपने भाषण की शुरूवात करते हुए प्रो. भरत सिंह ने बताया कि भारत एक जादुई बग़ीचा है जहाँ विश्व भर के मौसम, आबो-हवा, खान-पान, भाषाओं, संस्कृतियों, जातियों, धर्मों आदि के दर्शन एक साथ हो सकते हैं।

bharat singh_1

हिन्दू शब्द की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि हिन्दू नाम का संबंध धर्म से नहीं है बल्कि यह उस पूरी संस्कृति का नाम है जो इस देश में आकर बसने वाली द्रविड़, आर्य, हून, आभीर, निग्रो, शक, ऑस्ट्रिक, युची, मंगोल, युनानी, तुर्क आदि जातियों ने हज़ारो सालों में तैयार की है। इन सबसे मिलकर बनी खिचड़ी मुग़लों के आने से पहले ही तैयार हो गई थी जिसमें विभिन्न तत्व इस तरह से रच-बस गए थे कि उनका स्वाद हिन्दू कहलाता था। इस संस्कृति से विकसित होकर जो संस्कृति आज फल-फूल रही है वही है हिन्दू संस्कृति।

जब उन्होंने  महान हिन्दी-उर्दू शायर इकबाल की लिखी यह पंक्तिया पढ़ी तो समूचा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।

“यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रूमा, सब मिट गए जहाँ से ।

अब तक मगर है बाक़ी, नाम-ओ-निशाँ हमारा ।

कुछ बात है कि हस्ती, मिटती नहीं हमारी ।

सदियों रहा है दुश्मन, दौर-ए-ज़माँ हमारा ।”

प्रो सिंह ने फिर विस्तार से बताया कि जहाँ एक तरफ़ दुनिया की अधिकांश प्राचीन संस्कृतियाँ ऐतिहासिक घटनाओं से लुप्त हो गई वहीं, प्रतिकूल परिस्थितियों में भी भारतीय संस्कृति जीवित रही और आज तक विश्व के लिए आदर्श बनी हुई है। भारतीय संस्कृति की जीवंतता का एक बड़ा कारण, इसकी आध्यात्मिकता है जिसने इसे अपने आधार से डिगने नहीं दिया। भारतीय संस्कृति में लौकिक सुखों को जीवन का परम लक्ष्य कभी नहीं समझा गया है, इसलिए बिना एक पैसे के भी संत और साधु मात्र एक लंगोट में महाराज और स्वामी जी की संज्ञा पाते हैं। भारत की आतिथ्य संस्कृति पर बोलते हुए प्रो. सिंह ने कहा कि भारतीय संस्कृति में अतिथि देवताओं के समान है, इसलिए हमेशा इस संस्कृति में बाहर से आनेवालों का न केवल स्वागत किया बल्कि उन्हें आत्मसात कर लिया। अतिथि देव: भव: की भावना इस संस्कृति के हृदय में है। भारतीय जीवन दर्शन पर प्रकाश डालते हुए आचार्य भरत सिंह ने बतलाया कि पुरूषार्थ निरंतर कर्मशील रहते हुए धर्मपरायणता के साथ आशावादी होकर जीवनपथ पर आगे बढ़ते रहने का पाठ भारतीय संस्कृति ने  ही दुनिया को सिखलाया। अंत में मंत्रमुग्ध श्रोताओं को धन्यवाद ज्ञापन करते हुए प्रो सिंह ने अपना भाषण समाप्त किया। प्रश्नोत्तर सत्र में कई क्रोएशियाई विद्वानों ने विभिन्न रोचक प्रश्न पूछ्कर भारतीय संस्कृति के प्रति अपनी रुचि दिखलाई और प्रो भरत सिंह के वक्तव्य की सराहना की। आशा है कि प्रो. सिंह का यह सूत्रपात क्रोएशियाई जनता के बीच भारत की छवि को और अधिक सुदृढ़ बनाएगा।

रिपोर्ट: अभिषेक अवतंस, वरीय प्राध्यापक (हिन्दी भाषा एवं साहित्य), लायडन विश्वविद्यालय, नीदरलैण्ड 

Advertisements