एदुआर्दो गालेआनो की लघुकथा ’ खजाना’


[दक्षिणी अमेरिका के सबसे महत्वपूर्ण लेखको में गिने जाने वाले एदुआर्दो गालेआनो (Eduardo Galeano) का जन्म उरुग्वे के मोन्तेविदेओ (Montevideo) नामक शहर में 1940 में हुआ था। वे स्पेनी भाषा में लिखते हैं। अपने समाज का सच्चाई और सूक्ष्मता के साथ वर्णन करने के लिए प्रसिद्ध एदुआर्दो के साहित्य में इतिहास, गल्प, पत्रकारिता और राजनीतिक विश्लेषण का अद्भूत मेल देखने को मिलता है। एक पत्रकार के रूप में अपनी पेशेवर जिन्दगी की शुरूवात करने वाले एदुआर्दो को अपने सैन्य सत्ताविरोधी और प्रगतिशील लेखन के कारण 1973 में उरुग्वे से निर्वासित कर दिया गया। जिसके बाद उन्होंने अर्जेण्टीना में शरण ली जहाँ उन्होंने ’क्राइसिस’ (Crisis) नामक सांस्कृतिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया। 31 वर्ष की उम्र में एदुआर्दो ने अपनी विश्व प्रसिद्ध किताब ’ओपन वीन्स ऑफ लैटिन अमेरिका’ (Open Veins of Latin America) लिखी जिसका विश्व की 20 से अधिक भाषाओं में अनुवाद हुआ। दक्षिण और उत्तर अमेरिका के संपूर्ण इतिहास पर तीन खंडो में उनकी किताब ’मेमोरी ऑफ फ़ायर’ (Memory of Fire) 1982 से 1986 के बीच प्रकाशित हुई। बचपन में एदुआर्दो फुटबॉल खिलाड़ी बनना चाहते थे। इसी वजह से उन्होंने फुटबॉल के इतिहास के ऊपर ’सॉकर इन सन एण्ड शैडो’ (Soccer in Sun and Shadow) लिखी। उनके द्वारा लिखी गई कहानियों का संकलन ’दि बुक ऑफ इम्ब्रेसेस’ (The Book of Embraces) 1989  में प्रकाशित हुआ। बाद में एदुआर्दो अपने देश वापस लौट आए और फिलहाल मोन्तेविदेओ शहर में रहते हैं।]

प्रस्तुत कहानी उनकी किताब ’दि बुक ऑफ इम्ब्रेसेस’ (The Book of Embraces) में संकलित है।

खजाना

बहुत पुरानी बात है एक शहर में एक बूढ़ा आदमी अकेला रहता था। वह अपने दिन बिस्तर में पड़े-पड़े गुजार रहा था। शहर में यह अफवाह गर्म थी कि उसने अपने घर में खजाना छिपाया हुआ है। एक रात कुछ चोरों ने बूढ़े आदमी के घर में सेंधमारी कर दी। उन्होंने खजाने को हर जगह ढूंढा। अंत में उन्हें एक बक्सा तहखाने में पड़ा मिला। वे उस बक्से को अपने साथ ले आए। उन्होंने जब अगली सुबह उस बक्से को खोला तो देखा कि उसमें पुरानी चिठ्ठियों के सिवा कुछ भी नहीं था। ये चिठ्ठियाँ उस बूढ़े को मिले प्रेमपत्र थे जिन्हें ताउम्र उसने अपनी प्रेमिकाओं से पाया था। चोर उन चिट्टियों को जलाने जा रहे थे। पर वे रुक गए। उन्होंने इस पर बातचीत की और अंत में यह निश्चय किया कि वे उन्हें बूढ़े को लौटा देंगे।

पर हर हफ्ते सिर्फ एक चिठ्ठी ही लौटाना तय हुआ।

उसके बाद प्रत्येक सोमवार की दोपहर वह बूढ़ा अपने घर के बरामदे में डाकिये का इंतजार करता मिलता। जैसे ही वह डाकिये को आता देखता, वह उसकी ओर हँसते हुए दौड़ पड़ता। और डाकिया क्यूँकि सबकुछ जानता था, अपने हाथ में उस बूढ़े की चिठ्ठी लिए खड़ा हो जाता। और शायद फरिश्ते भी उस बूढ़े दिल की धड़कन सुन सकते थे, जो किसी औरत की चिठ्ठी मिलने की खुशी में बावरा हो जाता था। 

हिंदी अनुवाद: अभिषेक अवतंस

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