नीला घर (The Blue House)

(नोबल पुरस्कार विजेता टोमास ट्रांसट्रोमर की कविता The Blue House का हिंदी अनुवाद)

(अनुवाद – अभिषेक अवतंस)

इस रात सूरज की किरणें तेज़ हैं। मैं दरख़्तों के बीच खड़ा होकर धुंधली नीली दीवारों वाले अपने घर की ओर देख रहा हूँ।
ऐसा लगता है कि मैं मर गया हूँ और घर को एक नए नज़रिए से देख रहा हूँ।
यह घर अस्सी से ज़्यादा गर्मियों से यहाँ खड़ा है।
इसकी लकड़ी चार बार खुशियों से और तीन बार दुखों से भरी गई है।
जब इस घर में रहने वाला कोई मरता है तो इसकी दीवारों पर नया रंग आ जाता है।
मरा हुआ आदमी खुद इसे बिना ब्रश के अंदर से रंगता है।
बाहर खुली जगह है। पहले वहाँ बगीचा था और अब जंगल।
झाड़ियों की खामोश लहरें, झाड़ियों के पगोडा, बेजान लिखी इबारतें, झाड़ियों के उपनिषद, झाड़ियों के समुद्री-दस्यु जहाज़, ड्रेगन के सिर वाले, भाले-बरछे, झाड़ियों का साम्राज्य।
बेतरतीब बढ़े हुए इस बगीचे के ऊपर एक बुमेरांग की छाया लहरा रही है जो बार-बार उछाला जा रहा है। यह बुमेरांग उस आदमी का है जो मुझसे से पहले इस घर में बहुत पहले रहा करता था।
लगभग बच्चा था। उसके पास एक आवाज़ आती है, एक विचार, एक सोच: रचना करो, लिखो……समय रहते हुए भाग्य से मुक्त होने के लिए।
यह घर एक बच्चे के बनाए हुए चित्र से कुछ मेल खाता है।
एक उधार में मिला हुआ बचपना क्योंकि किसी ने अपने समय से पहले ही बच्चा बने रहने से इनकार कर दिया था।
दरवाज़ा खोलो…प्रवेश करो…छत पर अशांति और दीवारों पर शांति है।
बिस्तर के ऊपर सत्रह पतवारों वाला जहाज़, अशांत समन्दर, और फ्रेम से बेकाबू हवाओं के साथ एक अनगढ़ तस्वीर लटकी है।
यहाँ हमेशा पूर्वता रहती है, चौराहों के पहले, न वापस होने वाले विकल्पों के काफी पहले।
मैं जिन्दगी का शुक्रिया अदा करता हूँ। फिर भी मैं विकल्पों की कमी महसूस करता हूँ।
सभी चित्रों को असली होना चाहिए था।
कहीं दूर पानी की मोटर गर्मी की रात की लंबाई को और लंबा कर रही है।
ओस की बूंदों के आतशी शीशे में खुशियाँ और गम दोनों बढ़ जाते हैं।
हम इसे नही जानते हैं, पर हम इसे महसूस कर सकते हैं, हमारी जिन्दगी के पास एक और सगा-जहाज़ होता है जो सर्वथा अलग ही रास्ते पर चलता है।
जबकि सूरज किन्ही द्वीपों के पीछे जल रहा होता है।

 

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