सचमुच वर्ष 2011 के लंदन के दंगे निन्दनीय हैं। लूटपाट और हिंसा को कभी भी सही नहीं ठहराया जा सकता है परन्तु पूरे प्रकरण को आपराधिक अवसरवादिता करार देने से मुझे इनकार है। लंदन के दंगों से जुड़े कुछ पहलू पेश हैं:

 १. अप्रैल 2011 में अश्वेत रैप गायक स्माइली कल्चर की पुलिस के हाथों मौत के बाद 2000 से अधिक अश्वेत लोगों की हिस्सेदारी में एक बहुत बड़ा अहिंसक और शांतिपूर्ण प्रदर्शन स्कॉटलैंड यार्ड में आयोजित किया गया था पर जिसे शायद ही किसी ने गंभीरता से लिया था। यहाँ देखें http://tinyurl.com/3qptxkj

 २. दक्षिणी लंदन की अश्वेत जनता IPCC (Independent Police Complaint Commission) पर भरोसा नहीं करती और पुलिस के स्टॉप एण्ड सर्च कार्यक्रमों से नाखुश है। यहा देखें http://tinyurl.com/3vw7ds3

 ३. टॉटनहम जहाँ दंगों की शुरूवात हुई थी, वहाँ बाल गरीबी के आँकड़े पूरे लंदन में चौथे स्थान पर हैं और वयस्क बेरोजगारी राष्ट्रीय औसत से दोगुनी है। देखें यहाँ http://tinyurl.com/3khht7g

 ४. OECD के अनुसार यू.के. में सामाजिक गतिशीलता अन्य समृद्ध विकसित देशों के मुकाबले कम है यानी गरीब घरों के बच्चे आमतौर पर अंतत: गरीब ही रह जाते हैं। देखें यहाँ रिपोर्ट http://tinyurl.com/y9ojpab

 ५. उपभोक्तावादी संस्कृति के प्रभाव से लूट्पाट का मुख्य निशाना मुख्य रूप से बड़े स्टोर थे और लूटपाट को अंजाम देने वालों वयस्कों और किशोरों का सारा ध्यान महंगे फैशनेबल कपड़ों, जूतों, स्मार्टफोन, लैपटॉप, फ्लैटस्क्रीन टी.वी. आदि पर था। उनके लूटपाट का मकसद पेट भरना या पैसे कमाना न हो कर हर कीमत पर ब्रांडेड उपभोक्ता उत्पादों को हासिल कर उच्चतर प्रतिष्ठा प्राप्त करना था। देखें यह खबर http://tinyurl.com/3mazhep

 ६. भविष्य के प्रति निराशावादिता और अपने हमउम्रों के सामने इज्जत पाने की होड़ में कई युवा और किशोर दंगों में शामिल हुए थे। देखे http://tinyurl.com/43lxn6k

 कुल मिलाकर कहा जाए तो लंदन में दंगे क्यूँ हुए इसका जवाब इतना सरल नहीं है जैसा कि यूके के प्रधानमंत्री डेविड केमरोन कह रहें हैं। गौर करने की बात यह है कि भारत में भी दंगे मूलत: आर्थिक कारणों से ही होते है, नाम चाहे धर्म का हॊ।

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