यूरोप का बग़ीचा – केइकॉन्हॉफ़

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कामकाजी व्यस्तताओं के बीच ज़्यादा कहीं आना-जाना हो नहीं पाता लेकिन साल में एक बार हम  नीदरलैण्ड के केइकॉन्हॉफ़ बाग़ जाना नहीं भूलते। पिछली 19 अप्रैल 2015 को हमलोग केइकॉन्हॉफ़ (Keukenhof) गए। ककेइकॉन्हॉफ़ क्या है और कहाँ है? कुछ जानकारी –

दक्षिण हॉलैण्ड प्रदेश में लिसअ नाम की एक जगह है। लिसअ में फूलों का बहुत बड़ा बाग़ केइकॉन्हॉफ़ है जिसे यूरोप का बग़ीचा भी कहा जाता है। वसंत के मौसम में हर साल मार्च से मई (सिर्फ़ आठ हफ़्ते) तक आम लोगों के लिए खुलने वाले इस बग़ीचे को लिसअ शहर की नगरपालिका ने 1949 में स्थापित किया था। डच भाषा में केइकॉन्हॉफ़ का मतलब – ’रसोई का बग़ीचा’ है। यह बाग़ मुख्य रूप से अपने ट्यूलिप के फूलों के लिए प्रसिद्ध है। 79 एकड़ के इलाके में फ़ैले इस बाग़ में हर साल लगभग 70 लाख ट्यूलिप फूलों के कंद (बल्ब) रोपे जाते हैं। ट्यूलिप शब्द मूल रूप से फ़ारसी भाषा के शब्द दुलबन्द (यानी पगड़ी) से बरास्ते फ़्रांसीसी आया है। ऐसा इसलिए कि ट्यूलिप के फूल को उलटने पर वह एक पगड़ी की तरह दिखाई देता है। प्राकृतिक रूप से ट्यूलिप के फूल मध्य एशिया, तुर्की, मंगोलिया और तिन शियान हिमालय की पहाड़ियों में पाए जाते हैं। सत्रहवीं शताब्दी में ट्यूलिप फूलों का यूरोप में प्रवेश हुआ। 1636-1637 के दौरान यह फूल नीदरलैण्ड में इतना लोकप्रिय हुआ कि इन फूलों की ख़रीद-बिक्री पर सट्टेबाज़ी होने लगी। इसे ट्यूलिप मैनिया यानी ट्यूलिप पागलपन कहा जाता है। नीदरलैण्ड के साथ ट्यूलिप की कहानी इतनी ही पुरानी है। ग़ौरतलब यह भी है कि आज नीदरलैण्ड दुनिया में ट्यूलिप फूलों का सबसे बड़ा निर्यातक देश है।

केइकॉन्हॉफ़ में प्रवेश शुल्क एक व्यक्ति के लिए लगभग 1100 ₹ ( यानी 16 €) है। तीन साल से कम उम्र के बच्चे बाग में मुफ़्त जा सकते हैं। वरिष्ठ नागरिकों के लिए प्रवेश शुल्क में कोई रियायत नहीं है।

कुछ चित्र –

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द शॉप ऑन द मेन स्ट्रीट (1989)

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अभी कुछ दिन हुए मैंने  एक चेक-स्लोवाक भाषा में बनी फ़िल्म देखी – Obchod na Korze  यानी अंग्रेज़ी में ‘द शॉप ऑन द मेन स्ट्रीट (The Shop on the Main Street)’। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान स्लोवाकिया के एक छोटे-से शहर के जीवन पर आधारित यह फ़िल्म ऑस्कर जीतने वाली पहली चेक और स्लोवाक फ़िल्म थी।  इस श्वेत-श्याम फ़िल्म  की कहानी वर्ष 1942 की है जब स्लोवाकिया पर नात्सी जर्मनी की कठपुतली और तानाशाही सरकार का शासन था। फ़िल्म का मुख्य किरदार टोनो ब्रत्को  एक सीधा-सादा बढ़ई है। ब्रत्को को उसका फ़ासीवादी साढ़ू जो कि एक पुलिस अधिकारी है, चालबाज़ी से एक बूढ़ी और ऊँचा सुनने वाली यहूदी महिला श्रीमती लाउटमान की बटनों की दूकान का आर्य स्वामी बनवा देता है। ज्ञात हो कि नात्सी शासन के दौरान जर्मनी, पोलैण्ड, चेकोस्लोवाकिया, ऑस्ट्रिया समेत यूरोप के कई देशों में एक क़ानून के तहत यहूदी व्यापारिक प्रतिष्ठानों का मलिकाना हक़ स्थानीय (तथाकथित) आर्य समुदाय के चुने हुए लोगों को सौंप दिया गया था। इसका मतलब था कि नात्सी शासन के क़ानून के मुताबिक हर यहूदी दूकान मालिक के लिए एक आर्य स्वामी का होना अनिवार्य था।  टोनो एक जिंदादिल इंसान है जो उसके देश में हो रही फ़ासीवादी क्रांति से सहमत नहीं है। टोनो का साढ़ू जब उसके घर महँगी शराब लिए रात के खाने पर आता है, तो टोनो शराब के नशे में अडोल्फ़ हिटलर की नकलकर उसका मखौल उड़ाता है। फ़िल्म का यह दृश्य अपने-आप में अनोखा –

 

फ़िल्म में शहर की मुख्य सड़क पर विधवा महिला श्रीमती लाउटमान की बटन व लेस की एक पुरानी दूकान है।  यह बात उस समय से कुछ ही पहले की है जब नात्सी शासन द्वारा यहूदी मूल के लोगों को यूरोप भर से जबरन यातना शिविरों में भेजना शुरू हुआ था। भोलाभोला टोनो जब पहली बार श्रीमती लाउटमान की दुकान पर अपना कब्जा लेने आता है तो वृद्ध महिला पहले उसे ग्राहक समझती, फिर टैक्स जमा करने वाला और अंत में एक बेरोज़गार आदमी। इस दौरान टोनो उन्हें समझाने कि कई दफ़ा कोशिश करता है कि वह दुकान का आर्य स्वामी। पर बुढ़िया समझे तब तो बात आगे बढ़े। अगले दिन से टोनो श्रीमती लाउटमान के पुराने जर्जर हो चुके फ़र्नीचर को दुरुस्त करने में लग जाता है। दरअसल फ़िल्म उस मानवीय रिश्ते की दास्तान है जो टोनो ब्रत्को और श्रीमती लाउटमान के मध्य विकसित होता है। मानवीय संबंध किस प्रकार इन अमानवीय, क्रूर और कठिन परिस्थितियों  में विकसित होते हैं। एक सीधा-सादा आदमी अपने आप को कैसे इन परिस्थितियों में अपने-आपको बेबस पाता है, यह आप इस मर्मस्पर्शी फ़िल्म में देख सकते हैं।

फ़िल्म में मुख्य भूमिकाएँ निभाई हैं – इदा कमिन्स्का (श्रीमती लाउटमान), जोज़ेफ़ क्रोनर (टोनो ब्रत्को) और हाना सिल्व्कोवा ( टोनो की पत्नी)।

फ़िल्म के निर्देशक हैं – यान क़ादर

इंटरनेट पर हिंदी भविष्य

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भारत की सबसे बड़ी प्रिंट मीडिया कंपनी दैनिक भास्कर और प्रसिद्ध फूड ब्लॉगर निशा मधुलिका की सफलता का ताला एक ही चाबी से खुला है। और वह चाबी हिंदी-उर्दू ज़बान की है। शौकिया तौर पर हिंदी में फूड ब्लॉग शुरू करने वाली निशा के आज यू-ट्यूब पर 3,80,000 से ज़्यादा सब्सक्राइबर हैं। दूसरी ओर दैनिक भास्कर समूह के सी.ई.ओ ज्ञान गुप्ता बताते हैं कि ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट की बढ़ती पहुँच से स्थानीय भाषा में इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों की संख्या 47 % की दर से बढ़ रही है। यह बात अलग है कि मातृभाषा के रूप में हिंदी बोलने वाले 26 करोड़ भारतीयों के लिए इंटरनेट पर केवल 0.04 % वेबसाइटें हिंदी में उपलब्ध है। गूगल इस परेशानी को कैसे दूर कर रहा है। इस मसले पर रौशनी डालता यह आलेख।
http://apac.thinkwithgoogle.com/articles/hindi-matters-digital-age.html

 

वीज़ा की आउटसोर्सिंग की दुनिया

 

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सेवाओं की आउटसोर्सिंग की दुनिया में भारत एक अग्रणी देश है। चाहे वह सूचना प्रोद्योगिकी का क्षेत्र हो या वित्त या ग्राहक सेवा का, भारत की कंपनियों ने इसमें अच्छा मुनाफ़ा और नाम कमाया है। लेकिन कुछ भारत स्थित कंपनियाँ हैं जिन्होंने आउटसोर्सिंग के जगत में नवीनतम अवधारणाएँ प्रस्तुत की हैं। इनमें से एक है – वी.एफ़.एस. ग्लोबल (VFS Global)। वी.एफ़.एस. ग्लोबल की मातृ कपंनी कुओनी समूह है जिसका मुख्यालय ज़्यूरिख़ (स्वीट्ज़रलैंड) में स्थित है। लंबे समय तक मुंबई (भारत) से संचालित होने के बाद अब वी.एफ़.एस. ग्लोबल का मुख्यालय भी ज़्यूरिख़ (स्वीट्ज़रलैंड) में बनाया गया है।  

 

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आमतौर पर वीज़ा का ख़्याल आते ही राजदूतावासों और उनके केन्द्रों की मनोहारी तस्वीर ज़ेहन में उतरती है। लेकिन आज आप भारत से  दुनिया के अधिकतर बड़े देशों की यात्रा पर जाना चाहते हैं तो उनके राजदूतावासों को देखने का ख़्याल अपने दिमाग से निकाल दीजिए। क्योंकि आप वहाँ शायद ही जाएँ। ऐसा इसलिए कि चाणक्यपुरी  के राजदूतावासों के गेटों के बाहर सिख-पंजाबी एवं मलयाली भाइयों और बहनों की बढ़ती भीड़ के मद्देनज़र इन राजदूतावासों  ने अपने अधिकांश जनता से जुड़ने वाले काम वी.एफ़.एस. ग्लोबल नामक कंपनी को सौंप दिए हैं। शायद इन राजदूतावासों में काम करने वाले फ़िरंगी अधिकारी दूर पंजाब और केरल के गाँवों से आने वाली पसीने से लथपथ और विदेश जाने के लिए बेचैन  भीड़ से पीछा छुड़ाना चाहते थे। विदेश जाने के लिए वीज़ा आवेदनकर्ताओं की बढ़ती भीड़ के दो और मुख्य कारण भारतीयों की बढ़ती समृद्धि और भारतीय सूचना टेक्नोलॉजी कंपनियों का भूमंडलीकरण भी थे। वी.एफ़.एस. का मतलब है Visa Facilitation Service.

इसलिए आज यदि आप भारत में रहते हैं और संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, यू.के., चीन या शेनगन क्षेत्र के किसी यूरोपीय देश का पर्यटक या व्यापारिक वीज़ा लेना चाहते हैं तो आपका वास्ता वी.एफ़.एस. ग्लोबल  से ज़रूर पड़ेगा। दिल्ली में इसका दफ़्तर कनॉट प्लेस में है। पता यहाँ उपलब्ध है –

वीएफ़एस दिल्ली

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दरअसल वी.एफ़.एस. ग्लोबल वह कंपनी है जिसे इन देशों की सरकारों ने अपने राजदूतावासों के वीज़ा संबंधी कागज़ी प्रक्रिया (जैसे वीज़ा आवेदन लेना, जाँचना, आवेदक को जानकारी उपलब्ध करवाना, वीज़ा आवेदन को राजदूतावास भेजना, वीज़ा निर्गत होने पर वीज़ा लगे पासपोर्ट को आवेदक को लौटाना, आदि) को पूरा करवाने का ज़िम्मा दिया है। वी.एफ़.एस. ग्लोबल की स्थापना 2001 में मुम्बई में ज़ुबिन करकारिया ने की थी। वर्तमान में करकारिया कुओनी समूह के सी.ई.ओ हैं। करकारिया ने ही 2001 में Front office outsourcing for Visa processing का आविष्कार किया था। वर्तमान में वी.एफ़.एस. ग्लोबल कुल 48 देशों की सरकारों को वीज़ा संबंधी कार्यों में मदद करती है। इसके 140 आवेदन केन्द्र 124 देशों में स्थित हैं। ग़ौरतलब यह है भारत से शुरु हुई यह आउटसोर्सिंग आज दुनिया के लगभग हर कोने में वी.एफ़.एस. ग्लोबल द्वारा की जा रही है। कह सकते हैं कि इस क्षेत्र में इस कंपनी का एकाधिकार है।

Genitive Case in World Languages

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This map shows the distribution of genitive case in world language with respect to order of genitive or possessor noun phrase in relation to the head noun.

For example – in English language ‘Pablo’s  carPablo’s is the genitive noun phrase, and car is the head noun . 

or in Hindi-Urdu language

Pablo kI kAr (पाब्लो की कार)Pablo kI  is the genitive noun phrase, and kAr is the head noun.

In the map above Red dots mark the languages with Head Noun-Genitive order, while Blue dots mark languages with Genitive-Head Noun Order. The grey  ones are those which follow no particular order. That means – 

  • In Europe if you speak, Finnish, Hungarian, Swedish, Danish, Latvian, Lithuanian, Estonian , Basque & Turkish, then you will have no problem forming  Genitive-Head Noun phrases like Hindi-Urdu, because they all do the same.
  • In Asia, if you speak Japanese, Chinese, Korean, Mongolian, Armenian, Korean, Georgian, Pashto,  Burmese,Nepali, Tamil, Telegu, Kannada, Malayalam, Bengali, Sinhala  & Tibetan, then you would definitely know how to form Genitive-Head Noun phrases like Hindi-Urdu.
  • In Africa & south America, there are many smaller languages which follow the order of Genitive-Head Noun phrases like Hindi-Urdu.

Source – WALS online

Postpositions in World Languages

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Blue dots represent languages using ‘postpositions’ and Red dots mark languages with Prepositions. While Yellow ones are with inpositions. Grey ones follow no particular order and Whites one mark languages without adpositions.

  • If you speak Basque or Finnish or Hungarian or Turkish in Europe, Hindi-Urdu postpositions will come naturally to you.
  • If you speak Japanese, Korean, Mongolian, Sinhala, Nepali, Bengali, Pashto, Armenian, Tamil, Telugu, Punjabi, Malayalam, Kannada  & Tibetan in Asia, then Hindi-Urdu postpositions are easier for you 
  • In Africa & south America, there are many smaller languages which use postpositions. 

 

 

 

Source : WALS Online

 

Sadhus of Ayodhya (India)

Sadhu from Ayodhya

Ayodhya (Ayodhyā), also known as Saket, is an ancient city of India, believed to be the birthplace of lord Rama. and setting of the epic Ramayana. It is adjacent to Faizabad city at the south end in the Indian state of Uttar Pradesh. Ayodhya used to be the capital of the ancient Kosala Kingdom. I visited this holy city between 27 July to 5 August 2011 for our fieldwork on Awadhi variety of Hindi (for Hindi Dialects Dictionaries Project of Central Institute of Hindi, Agra). In Ayodhya, I had met several holy men (Sadhus) living or transiting through the city. They were from all around the country. Some from as far as Assam and Maharashtra. Apart from the wealth of information, we gained by talking with them, here are some pictures, I clicked of the Sadhus I met in this holy city.

Look at the styles of markings on forehead (known as ‘Tilak’) of each Sadhu. Sadhus distinguish among themselves by their special style of markings adopted by their respective schools.This Tilak is traditionally done with sandalwood paste and turmeric, lauded in Hindu texts for their purity and cooling nature.

All images copyright – A. Avtans

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Sadhu from Ayodhya

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