Boats

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The Taoists have a famous teaching about an empty boat that rams into your boat in the middle of a river. While you probably wouldn’t be angry at an empty boat, you might well become enraged if someone were at its helm. The point of the story is that the parents who didn’t take care of you, the other kids who teased and bullied you as a child, the driver who aggressively tailgated you yesterday – are all in fact empty, rudderless boats. They were compulsively driven to act as they did by their own un-examined wounds, therefore they did not know what they were doing and had little control over it. Just as an empty boat that rams into us isn’t targeting us, so too people who act unkindly are driven along by the unconscious force of their own wounding and pain.
Until we realize this, we will remain prisoners of our grievance, our past, and our victim identity, all of which keep us from opening to the more powerful currents of life and love that are always flowing through the present moment.
#Taoism

ओला डायरी # 1

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सुबह के ठीक साढ़े आठ बज रहे हैं। मैसूरू जानेवाली 11 बजे की शताब्दी एक्सप्रेस लेने के लिए हमने सुबह थोड़ा जल्दी ही निकलने का फ़ैसला किया है। बंगलुरू के ट्रैफ़िक और बसों की हड़ताल का असर सड़कों पर दिखने का अंदेशा है। ओला वालों को उनके एप पर जे.पी. नगर आने का संदेश दे दिया है। मकान से बाहर निकलते देखा कि बाहर ओला टैक्सी हमारा इंतज़ार कर रही है। गाड़ी कोई ख़ास बड़ी नहीं है – इंडिका – वी 2 है।  बहन टैक्सी वाले से कन्नड़ में कुछ कहती है। शायद यह कि हमें कहाँ जाना है, और ट्रेन का समय वग़ैरह। हम लोग टैक्सी में बैठते। बच्चे अपनी माँ के साथ पीछे बैठे हैं और मैं ड्राइवर के साथवाली सीट पर। ड्राइवर मुझसे हिन्दी में पूछता है – आपको मैजिस्टिक जाना है सर? मैंने कहा – जी हाँ – वहीं बैंगलोर सिटी रेलवे स्टेशन। मैसूरु जानेवाली शताब्दी पकड़नी है।

कुछ दूर आगे बढ़ते ही बड़े अपार्टमेन्ट कॉमप्लेक्सों के अहाते से बाहर की दुनिया दिखाई दे रही। लोग चाय-नाश्ते की दुकानों पर खड़े हैं। आज रविवार है ऐसा लग नहीं रहा, सड़क पर काफ़ी भीड़ है। सड़कों के किनारे कचरा फैल रहा है। खाली पड़ी ज़मीन पर लोगों ने कचरे का अंबार लगा दिया है। मैं मन ही मन सोचता हूँ – भारत की तथाकथित सिलिकॉन वैली बैंगलोर में भी वही हाल है कचरे का – स्वच्छ भारत अभियान गया तेल लेने। पत्नी को कहता हूँ – look,  that is the main difference between ‘’here’’ and ‘’there’’.

मैं खिड़की से बाहर देख ही रहा हूँ कि अचानक मेरे कानों में कुछ अलग-सा सुनाई देता है – “तुमी कि कोरी आसे। मोइ ना जानू….

देखा तो ड्राइवर महोदय अपने इयरफ़ोन के द्वारा किसी से से फ़ोन पर बात कर रहे हैं। कुछ देर मैं बातचीत ख़त्म हो जाती है।

मैं पूछता हूँ – भैया आप आसाम से हैं?

ओला ड्राइवर – जी, आपको कैसे मालूम?

मैं कहता हूँ – भाल आसु भाईटी? आजिर बोतोर भाल आसे। हा हा हा, (हँसते हुए) आप फ़ोन पर अहोमिया में बात कर रहे थे न, इसलिए। और यहाँ डैशबोर्ड आपकी आईडी पर भी लिखा है – राज बोड़ो। आप बोड़ोलैंड से हैं। कोकराझार?

ओला ड्राइवर – आप अहोमिया समझते हैं? आपको तो आसाम के बारे में बहुत कुछ मालूम है सर। आप वहाँ गए हैं? मेरा घर कोकराझार के पास है ही है। मेरे मदर-फ़ादर और भाई लोग वहीं रहते हैं।

मैं कहता हूँ – हाँ दो-तीन बार गया हूँ – नोर्थ-ईस्ट के मेरे कई दोस्त रहे हैं। जब दिल्ली में पढ़ता था तब। शिलांग भी आना जाना लगा रहता है। मैं दो बार नागालैंड भी गया हूँ। आप यहाँ बैंगलोर कैसे आए?

ओला ड्राइवर – मेरी बड़ी बहन यहाँ रहती है। उसके पास 7 साल पहले यहाँ आया था। फिर कुछ दिन बाद गाड़ी चलाना सीख लिया। और अब अपनी गाड़ी ले ली। ये गाड़ी अपनी है। दो साल पहले ख़रीदी है। यहाँ नोर्थ ईस्ट के बहुत लोग रहते हैं। ड्राइविंग लाइन में बहुत कम हैं। बोड़ो में मैं शायद अकेला हूँ। मणिपुर के लोग होटेलिंग में बहुत काम करते हैं। ड्राइविंग में लोकल और तमिल ज़्यादा हैं।

मैं: बहुत बढ़िया, अच्छा काम किया। आप गाड़ी सिर्फ़ ओला के लिए चलाते हैं?

ओला ड्राइवर: नहीं नहीं – ओला का काम मैं सिर्फ़ सुबह या रात को लेता हूँ। बाक़ी टाइम में बी.एस.एन.एल के लिए काम करता हूँ। 11 बजे से काम शुरू होता है। मेरा ऑफ़िस मैंजिस्टिक के पास ही है, इसलिए ओला से आपकी भी सवारी ले ली।

मैं: आप बी.एस.एन.एल के दफ़्तर में काम करते हैं? क्या काम करते हैं?

ओला ड्राइवर: नहीं गाड़ी ही चलाता हूँ। बी.एस.एन.एल. को ये गाड़ी लीज़ पर दी है। हर दिन उनके इंजीनियर को लेकर जाना होता है।

मैं: अच्छा यह बहुत बढ़िया है। काफ़ी पैसे मिलते होंगे। इंजीनियर लोग कहाँ जाते हैं?

ओला ड्राइवर: यही टावर –बावर को देखने जाते हैं। कोई प्रोब्लेम होने से जाते हैं। एक दिन एक टावर तो देखते ही हैं। एक महीना का बीस हज़ार देते हैं। गाड़ी और डीज़ल मेरे अपने हैं। ओला और बी.एस.एन.एल जोड़कर एक महीने में 30-32 कमा लेता हूँ।

मैं: यह बहुत अच्छी बात है। आप यंग हैं और बहुत मेहनती हैं। और आप हिन्दी भी बहुत अच्छी बोलते हैं।

ओला ड्राइवर: बी.एस.एन.एल का काम मेरा तीन बजे तक ख़त्म हो जाता है। इंजीनियर लोग एक दिन में एक ही कंप्लेन देखते हैं। वहाँ से आने के बाद छुट्टी। चार बजे तक मैं घर वापिस आ जाता हूँ।

मैं: बहुत लंबा जाना पड़ता होगा आपको? इसमें तो बहुत डीज़ल जाएगा।

ओला ड्राइवर: नहीं बहुत लंबा नहीं। हर ऑफ़िस का अपना सर्किल है। उसी में जाना होता है। वैसे बंगलोर बहुत बड़ा शहर है। लंबा जाने से मुश्किल हो जाएगी।

मैं: अच्छा-अच्छा यह ठीक है। आप कन्नड़ बोल लेते हैं? मैंने सुना आप कन्नड़ बोल रहे थे?

ओला ड्राइवर: जी बोलता हूँ। यहाँ काम करने के लिए लैंग्वेज सीखना ज़रूरी है।

मैं: कन्नड़ कहाँ सीखी आपने?

ओला ड्राइवर: वो पहले जो मेरा मकान मालिक था ना, उन लोगों ने सिखाया मुझे। उसकी फ़ैमिली में सब लोग सिर्फ़ कन्नड़ और तेलुगु ही बोलते-समझते थे। इसलिए बोल-बोल के सीख गया। दो साल तक मेरे मकान मालिक ने मुझसे सिर्फ़ कन्नड़ में बात किया, फिर मैं सीख गया। अब बोल लेता हूँ।

मैं: यह तो कमाल की बात है। बहुत अच्छा। अभी कुछ साल पहले यहाँ लफ़ड़ा हुआ था ना, सब नोर्थ ईस्ट वालों को बैंगलोर से भागना पड़ा था। कुछ ख़ून-खराबा हुआ था। मुझे साल याद नहीं है।

ओला ड्राइवर: ये केस अगस्त 2012  का है सर। सब लोगों को यहाँ से भागना पड़ा था। लेकिन मैं नहीं गया। मेरा पुलिस में एक लोकल दोस्त है। उसने मुझे अपना नंबर देकर कहा कि कोई प्रोब्लेम होने पर फ़ोन करना। मैं वापस नहीं गया लेकिन बहुत सारे लोग भाग गए थे। सबके फ़ोन पर मैसेज आया था कि यहाँ रहने वाले नौर्थ ईस्ट के लोगों को मारना है। रेलवे ने स्पेशल ट्रेन भी चलवाई थी। कुछ मारपीट हुई थी लेकिन ज़्यादा लोग डर गए थे।

मैं: कौन मारना चाहता था?

ओला ड्राइवर : यहाँ के कुछ लोकल मोहम्मडन लोग। वहाँ आसाम में कोकराझार में दंगा हुआ। उसी का बदला यहाँ लेने का बात कर रहे थे। लेकिन ज़्यादा कुछ नहीं हुआ। यहाँ के लोकल कन्नडिगा और पुलिस ने बहुत कंट्रोल किया।  

मैं: चलिए अच्छी बात है। आप सब लोग सेफ़ है यहाँ पर।

ओला ड्राइवर: आप यहाँ घूमने आए हैं सर? कहाँ रहते हैं?

मैं: मेरी बहन यहाँ रहती है। हमलोग उसी से मिलने आए हैं। फ़िलहाल फ़ौरेन में रहते हैं।

ओला ड्राइवर : लीजिए आपका मैजिस्टिक आ गया।

मैं: कितने पैसे हुए? थैंक यू।

 

 

 

 

 

Poems from Punjab

इक कुड़ी जिदा नाम मोहब्बत, गुम है, गुम है, गुम है।
“A girl whose name is love, is missing, is missing, is missing”
Shiv Kumar Batalvi ((23 July 1936 – 7 May 1973)
A famous Punjabi language poet with a folk consciousness and modern sensibility, Shiv Kumar excelled with a freshness of vocabulary, diction, imagery and rhythmic flow of words which remain unparalleled in Punjabi poetry. Shiv was born in a village near Sialkot (Pakistan). His family moved to Batala, Gurdaspur (India) after Indian partition in 1947. The pangs of this separation are recurrent themes of this great poet of the land. One of my current favorites composed by Shiv Kumar Batalvi is ”ik kudi jida naam mohabbat, gum hai gum hai” sung by Shahid Mallya in his beautiful voice. From the soundtrack of Udta Punjab (2016)

Bhojpuri Translation of Basava Anthology

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Pleased to know that Bhojpuri Translation of Basava Vachanamrutha (poems composed by Lord Basaveshwara in Kannada) is recently published by Basava Samithi, Bengaluru. The multilingual translation project was steered under the leadership of late Dr. M.M. Kulburgi. The principal editor of the Bhojpuri version is Prof. dr. B.S. Tiwary (my father).
Lord Basava was a 12th-century Indian philosopher, statesman, Kannada poet, and was the founding saint of the Lingayat-Shaivism sect of Hinduism in Karnataka. Basava staunchly believed in a caste-less society where each individual had equal opportunity to rise up in life. The Website of Basava Samithi from where you can order the book is here

http://www.basavasamithi.org/

 

अब्दुल करीम जिन्होंने महारानी विक्टोरिया को उर्दू-हिंदी सिखाई

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ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया के शासन की स्वर्ण जयंती 1887 में मनाई जा रही थी। इसी के जश्न के मौके पर उन्हें भारत से दो अदद नौकर तोहफ़े में मिले। उन्हीं दो हिन्दुस्तानियों में से एक थे मुहम्मद अब्दुल करीम। अब्दुल करीम झांसी के पास ललितपुर के रहने वाले थे। उस समय अब्दुल करीम की उम्र लगभग 24 साल थी। बकिंघम महल जाने के कुछ ही महीनों के बाद अब्दुल करीम महारानी विक्टोरिया के निकट सहयोगी बन गए। उन्होंने करीम को मुंशी का ओहदा दिया और अपना भारत सचिव बनाया। अब्दुल करीम महारानी के साथ 15 बरस रहे। इस दौरान करीम ने रानी को उर्दू और हिंदी पढ़ना-लिखना सिखाया। रानी की मौत के बाद करीम आगरा आ गए जहां उनका इंतकाल हुआ। 

महारानी विक्टोरिया और अब्दुल करीम के रोचक रिश्ते पर शरबानी बसु ने एक किताब लिखी है। किताब लिखने के दौरान लेखिका को अब्दुल करीम की वो पुरानी डायरी मिली जिसमें उन्होंने महारानी विक्टोरिया के साथ अपने प्रगाढ़ संबंधों के बारे में लिखा था। यह डायरी कराची में उनके किसी वारिस के पास से मिली थी।

Victoria & Abdul: The True Story Of The Queen’s Closest Confidant (2011, History Press, London)

किताब के बारे में आप यहाँ जान सकते हैं
https://www.amazon.co.uk/Victoria-amp-Abdul-Closest-Confidant/dp/0752458531

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Temple of the Sun

About this massive monument, the great poet Rabindranath Tagore said –  “here the language of stone surpasses the language of man”. Situated at the eastern coast of India, the Konark Sun Temple was built by King Narsimhadeva I of Ganga dynasty in the 13th century. It was designed in the form of a gorgeously decorated chariot of Sun god mounted on 24 wheels , each about 10 feet in diameter, and drawn by 7 mighty horses. Sun temple of Konark is a masterpiece of Orissa’s medieval architecture. It is a UNESCO world hertiage monument.

Trivia

  • The Konark temple is also known for its erotic sculptures of maithunas.
  • In one of the panels at the temple, there is a depiction of giraffe being gifted by West Asian traders to the king of Odisha. It shows Odisha’s long history of trade with Africa and Arabia. Some other experts believe that this animal is Okapi or Dromedary (Arabian camel). 
  • In another panel, there is lady wearing Japanese style sandals (Geta Sandals), proving the maritime relation of Odisha with east & south-east Asia.
  • At present it is located two kilometers from the sea, but originally the ocean came almost up to its base. Until fairly recent times, the temple was close enough to the shore to be used as a navigational point by European sailors, who referred to it as the ‘Black Pagoda’.

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Temple is open for public from sunrise to sunset

Entrance Fees are as follows:

Citizens of India and visitors of SAARC (Bangladesh, Nepal, Bhutan, Sri Lanka, Pakistan, Maldives and Afghanistan) and BIMSTEC Countries (Bangladesh, Nepal, Bhutan, Sri Lanka, Thailand and Myanmar) – INR. 30 per head.

Citizen of other countries: US $ 5 or INR. 500/- per head

(children up to 15 years enter free)

How to reach?

Konark is connected by good all weather motorable roads. Regular Bus services are operating from Puri and Bhubaneswar. Besides Public transport Private tourist bus services and taxis are also available from Puri and Bhubaneswar.

 

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कुछ बोध कथाएँ

अपनी झोली

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दो आदमी यात्रा पर निकले। दोनों की मुलाकात हुई। दोनों यात्रा में एक साथ जाने लगे। दस दिनों के बाद दोनों के अलग होने का समय आया तो एक ने कहा, ‘भाईसाहब! एक दस दिनों तक हम दोनों साथ रहे। क्या आपने मुझे पहचाना?’ दूसरे ने कहा, ‘नहीं, मैंने तो नहीं पहचाना।’ वह बोला, ‘माफ़ करें मैं एक नामी ठग हूं। लेकिन आप तो महाठग हैं। आप मेरे भी उस्ताद निकले।’

‘कैसे?’ ‘कुछ पाने की आशा में मैंने निरंतर दस दिनों तक आपकी तलाशी ली, मुझे कुछ भी नहीं मिला। इतनी बड़ी यात्रा पर निकले हैं तो क्या आपके पास कुछ भी नहीं है? आप बिल्कुल ख़ाली हाथ हैं?’

‘नहीं, मेरे पास एक बहुत क़ीमती हीरा है और एक सोने का कंगन है ।’

‘तो फिर इतनी कोशिश के बावजूद वह मुझे मिले क्यों नहीं?’

‘बहुत सीधा और सरल उपाय मैंने काम में लिया। मैं जब भी बाहर जाता, वह हीरा और सोने का कंगन तुम्हारी पोटली में रख देता था। तुम सात दिनों तक मेरी झोली टटोलते रहे। अपनी पोटली संभालने की जरूरत ही नहीं समझी। तुम्हें मिलता कहाँ से?’

कहने का मतलब यह कि हम अपनी गठरी संभालने की ज़रूरत नहीं समझते। हमारी निगाह तो दूसरों की झोली पर रहती है। यही हमारी सबसे बड़ी समस्या है। अपनी गठरी टटोलें, अपने आप पर दृष्टिपात करें तो अपनी कमी समझ में आ जाएगी।

 सीमा

Old Woman India

सड़क किनारे एक बुढ़िया अपना ढाबा चलाती थी। एक यात्री आया। दिन भर का थका, उसने विश्राम करने की सोची। बुढिया से कहा, ‘क्या रात के लिए यहाँ आश्रय मिल सकेगा?’ बुढिया ने कहा, क्यों नहीं, आराम से यहां रात भर सो सकते हो।’

यात्री ने पास में पड़ी चारपाइयों की ओर संकेत कर कहा, ‘इस पर सोने का क्या चार्ज लगेगा?’ बुढ़िया ने कहा, ‘चारपाई पर सोने के लिए दस रूपए लगेंगे।’ यात्री ने सोचा रात भर की ही तो बात है। बेकार में दस रूपए क्यों खर्च की जाए। आंगन में काफी जगह है, वहीं सो जाऊंगा।

यह सोचकर उसने फिर कहा, ‘और अगर चारपाई पर न सोकर आंगन की ज़मीन पर ही रात काट लूँ तो क्या लगेगा?’ ‘फिर पूरे सौ रूपए लगेंगे -‘ बुढ़िया ने कहा।

बुढ़िया की बात सुन यात्री को उसके दिमाग पर संदेह हुआ। चारपाई पर सोने के दस रूपए और भूमि पर चादर बिछाकर सोने के लिए सौ रूपए – यह तो बड़ी विचित्र बात है। उसने बुढिया से पूछा, ‘ ऐसा क्यों?’

बुढ़िया ने कहा, ‘चारपाई की सीमा है। तीन फुट चौड़ी, छह फुट लंबी जगह ही घेरोगे। बिना चारपाई सोओगे तो पता नहीं कितनी जगह घेर लो।’ सीमा में रहना ही ठीक है। असीम की बात समस्या पैदा करती है।

भारतीय नरक

indian hell

एक बार एक भारतीय व्यक्ति मरकर नरक में पहुँचा,
तो वहाँ उसने देखा कि प्रत्येक व्यक्ति को किसी भी देश के नरक में जाने की छूट है ।
उसने सोचा, चलो अमेरिकावासियों के नरक में जाकर देखें, जब वह वहाँ पहुँचा तो द्वार पर पहरेदार से उसने पूछा – क्यों भाई अमेरिकी नरक में क्या- क्या होता है ? पहरेदार बोला – कुछ खास नहीं, सबसे पहले आपको एक इलेक्ट्रिक चेयर पर एक घंटा बैठाकर करंट दिया जायेगा, फ़िर एक कीलों के बिस्तर पर आपको एक घंटे लिटाया जायेगा, उसके बाद एक यमदूत आकर आपकी जख्मी पीठ पर पचास कोड़े बरसायेगा…
बस! यह सुनकर वह व्यक्ति बहुत घबराया औरउसने रूस के नरक की ओर रुख किया, और वहाँ के पहरेदार से भी वही पूछा, रूस के पहरेदार ने भी लगभग वही वाकया सुनाया जो वह अमेरिका के नरक में सुनकर आया था । फ़िर वह व्यक्ति एक- एक करके सभी देशों के नर्कों के दरवाजे जाकर आया, सभी जगह उसे एक से बढकर एक भयानक किस्से सुनने को मिले । अन्त में थक- हार कर जब वह एक जगह पहुँचा, देखा तो दरवाजे पर लिखा था “भारतीय नरक” और उस दरवाजे के बाहर उस नरक में जाने के लिये लम्बी लाईन लगी थी, लोग भारतीय नरक में जाने को उतावले हो रहे थे, उसने सोचा कि जरूर यहाँ सजा कम मिलती होगी…
तत्काल उसने पहरेदार से पूछा कि यहाँ के नरक में सजा की क्या व्यवस्था है ? पहरेदार ने कहा – कुछ खास नहीं…सबसे पहले आपको एक इलेक्ट्रिक चेयर पर एकघंटा बैठाकर करंट दिया जायेगा, फ़िर एक कीलों के बिस्तर पर आपको एक घंटे लिटाया जायेगा, उसके बाद एक यमदूत आकर आपकी जख्मी पीठ पर पचास कोड़े बरसायेगा… बस !

चकराये हुए व्यक्ति ने उससे पूछा – यही सब तो बाकी देशों के नरक में भी हो रहा है, फ़िर यहाँ इतनी भीड क्यों है ? पहरेदार बोला – इलेक्ट्रिक चेयर तो वही है, लेकिन बिजली नहीं है, कीलों वाले बिस्तर में से कीलें कोई निकाल ले गया है, और कोड़े मारने वाला यमदूत सरकारी कर्मचारी है, आता है, दस्तखत करता है और चाय-नाश्ता करने चला जाता है…औरकभी गलती से जल्दी वापस आ भी गया तो एक-दो कोड़े मारता है और पचास लिख देता है…चलो आ जाओ अन्दर !!