स्नेह का बोझ

Farmers carrying their produce

एक आदमी अपने सिर पर अपने खाने के लिए अनाज की गठरी ले कर जा रहा था। दूसरे आदमी के सिर पर उससे चार गुनी बड़ी गठरी थी। लेकिन पहला आदमी गठरी के बोझ से दबा जा रहा था, जबकि दूसरा मस्ती से गीत गाता जा रहा था।
दूसरा बोला, “तुम्हारे सिर पर अपने खाने का बोझ है, मेरे सिर पर परिवार को खिलाकर खाने का। स्वार्थ के बोझ से स्नेह का बोझ हल्का होता है।”

Photo – Muhammed Dobibar Rahman (foreground) and Jinnat carry rice in the fields of the village of Jogahat, Chunamonhathi, Jessore, Bangladesh. by Jim Richardson

कटोरी नहीं झील

Bowl & Lake

एक बार एक आदमी किसी साधू के पास पहुँचा।

‘गुरू जी, मैं अपनी ज़िंदगी से बहुत परेशान हूँ, कृपया इस परेशानी से निकलने का तरीका बताएँ’, आदमी बोला।

साधू बोले, ‘पानी की कटोरी में एक मुट्ठी नमक डालो और उसे पियो।’

आदमी ने ऐसा ही किया।

‘इसका स्वाद कैसा लगा?’, साधू ने पूछा।

‘बहुत ही खराब… एकदम खारा,’  आदमी थूकते हुए बोला।

साधू मुस्कुराते हुए बोले, ‘एक बार फिर अपने हाथ में एक मुट्ठी नमक ले लो और मेरे पीछे-पीछे आओ।’

दोनों धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे और थोड़ी दूर जाकर साफ़ पानी से बनी एक झील के सामने रुक गए।

‘चलो, अब इस नमक को पानी में डाल दो’, साधू ने आदेश दिया।

आदमी ने ऐसा ही किया।

‘अब इस झील का पानी पियो’, साधू बोले।

आदमी पानी पीने लगा।

एक बार फिर साधू ने पूछा, ‘बताओ इसका स्वाद कैसा है, क्या अब भी तुम्हें ये खारा लग रहा है?’

‘नहीं, ये तो मीठा है, बहुत अच्छा है’, आदमी बोला।

साधू आदमी के बगल में बैठ गए और उसका हाथ थामते हुए बोले, ‘जीवन के दु:ख बिलकुल नमक की तरह हैं, न इससे कम न ज्यादा। जीवन में दुख की मात्रा वही रहती है, बिलकुल वही लेकिन हम कितने दुख का स्वाद लेते हैं यह इस पर निर्भर करता है कि हम उसे किस बरतन में डाल रहे हैं। इसलिए जब तुम दुखी हो तो सिर्फ इतना कर सकते हो कि खुद को बड़ा कर लो… कटोरी मत बने रहो,  झील बन जाओ।

क्या बांग्लादेश में हिन्दी-उर्दू बोली जाती है?

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हाल ही में अख़बारों में बांग्ला देश से जुड़ी एक ख़बर आई कि बांग्लादेश के सिनेमाघरों ने वहाँ के सबसे बड़े फ़िल्म स्टार शकीब ख़ान की फ़िल्मों के बहिष्कार की घोषणा की है। मामला यह था कि पिछले साल लगभग पचास सालों के बाद बांग्लादेश की एक अदालत ने बांग्लादेश में हिन्दी फ़िल्मों के प्रदर्शन पर लगी रोक हटा ली थी। जिसके बाद बांग्लादेशी सेंसर बोर्ड ने बॉलीवुड स्टार सलमान ख़ान की फ़िल्म ’वान्टेड’ को हरी झंडी दिखाई। और यह फ़िल्म जनवरी 2015 के दूसरे हफ़्ते में बड़ी धूमधाम के साथ 45 बांग्लादेशी सिनेमाघरों में रिलीज़ हुई। इस फ़िल्म के प्रदर्शन को रोकने के लिए अभिनेता शकीब ख़ान के नेतृत्व में एक भीड़ ने सिनेमाघरों में तोड़-फोड़ की। इसके बाद सिनेमाघरों ने मिलकर शकीब ख़ान की फ़िल्मों को न दिखाने का फ़ैसला किया।

यह बात अलग है कि बम्बईया फ़िल्मों की बांग्लादेश में जबर्दस्त मांग है, और ज़्यादातर लोग नकल की हुई डीवीडी या वीसीडी पर घर बैठे आराम से फ़िल्में देखते है। सिनेमाघरों में लोगों का जाना  काफ़ी कम हुआ है, और इस वज़ह से सिनेमाघरों के मालिक हिन्दी फ़िल्मों पर से हटी रोक को अपने कारोबार के लिए बहुत अच्छा मानते हैं। ग़ौर फ़रमाएँ तो आप पाएँगे की हिन्दी फ़िल्मों की अधिकांश पायरेटड प्रतियाँ विदेशी वेबाइटों से ही मयस्सर हो रही हैं जिनमें सबसे अधिक लोकप्रिय पाकिस्तानी वेबसाइटें हैं। दूसरी ओर हिन्दी टी.वी. शो और सीरियल बांग्लादेशी घरों में ख़ासे लोकप्रिय हैं। 

इससे से कुछ हटकर एक वाक्या मुझे भी बरास्ता हुआ। कुछ दिनों पहले यहाँ हॉलैण्ड में टहलते हुए सामने से एक भारतीय-सा दिखने वाला जवान जोड़ा दिखाई दिया। मैं उनको देखकर मुस्कुरा दिया, तो वे भी मुस्कुराए।

मैंने पूछा – इंडिया ? वे बोले – नहीं हम लोग बांग्लादेश से हैं।
मैंने कहा – अच्छा, यहाँ कैसे आना हुआ? उस बांग्लादेशी जोड़े ने खाटी हिन्दी-उर्दू में मुझे बताया कि वे लोग यहाँ दो महीनों के लिए आए हुए हैं, और एक जहाज़ बनाने वाली कंपनी में इन्टर्नशीप कर रहे हैं।
मैंने कहा – आप लोग बहुत अच्छी हिन्दी बोलते हैं, आपने हिन्दी कहाँ सीखी?
वे बोले – बम्बईया फ़िल्मों से सीखी, पर हमारी हिन्दी कोई ख़ास नहीं है। यहाँ देखने के लिए कौन-कौन सी जगहे हैं?
मैंने कहा – नहीं आप बहुत अच्छी हिन्दी बोल रहे हैं, और  हमें आप पर नाज़ है। मैं बंगाली आराम से समझ लेता हूँ। और मैंने फ़ौरन कहा – केमोन आछिस, तोमार नाम की?
फिर मैंने उनको विस्तार से यहाँ शहर की देखने लायक चीज़ों का ब्यौरा दिया और हिन्दी में ही दिया।

एक और छोटी मगर अहम बात – मेरे प्रिय गुरु और दोस्त प्रोफ़ेसर भरत सिंह जी ने बताया कि वे जब फ़्रांस की राजधानी पेरिस गए, तब उन्होंने पाया कि वहाँ रहने वाले अधिकांश दक्षिण एशियाई कामगार लोग (यानी पाकिस्तानी, बांग्लादेशी, भारतीय, नेपाली आदि मेहनतकश लोग) आपस में एक विचित्र प्रकार की भाषा में एक-दूसरे से बात करते हैं। वह ज़ुबान फ़्रांसीसी नहीं बल्की फ़्रांसीसी मिली हुई एक अलग किस्म की हिन्दी-उर्दू है। हिन्दी-उर्दू का यह क्रियोल रूप फ़्रांस में भी अपनी जगह बना रहा है।

अब मेरी समझ में आया कि भाषाएँ सरहदें और संकीर्ण मानसिकताओं से कहीं ऊपर उड़ती हुई लोगों को जोड़ती हैं। लोग मादरी ज़ुबानों का कितना भी विरोध कर लें, भाषाएँ लोगों को मिला कर ही रहेंगी।

Photo Credits: Samaa.Tv

In the Music Dreamland of South Asia – Part 1

After living quite sometime away from my homeland (India), I have lately come to realize how much we Indians, Pakistanis, Afghans, Bangladeshis, and Nepalese share in our way of life, music, history, food and love. And one of the most amazing gift which we all share is the south Asian music.

South Asian music ?

Music connects south Asia in a magical way. Have you tried drinking a cold glass of water after a long walk in a hot summer afternoon? That is the kind of sweetness which south Asian music gives to your ear. With the diverse heritage we share in south Asia, it is not surprising that south Asian music is so refreshing.

Despite all the bad press about the country, the kind of music Pakistani musicians make is amazingly fresh as well as fully grounded in our rich south Asian heritage.

Sample this spiritual song (dama dam mast kalander) in Punjabi which was originally composed by Sufi saint Bulle Shah. This version is from the Hindi-Urdu film David (2013)

 

Contrast this with ‘Sahanaa Vavatu’ a classic Sanskrit chant of India composed by Pandit Ravi Shankar. Used as an audio in this documentary on Khadi (traditional Indian cloth)

 

Another good sample is Chal Diye by Zeb & Haniya with Javed Bashir. The raga of this song is called Yaman Kalyan. Javed Bashir is a well-known Hindustani classical vocalist.

Listen to the sweetness of Sajjad Ali’s voice in Tum Naraz ho. This song is reproduced by Coke Studio (Pakistan) in their seventh season. Sajjad Ali has a kind of innocence in his voice which is seldom found in singers of all generations.

 Danah pe Danah is a Balochi folk song in which a shepherd introduces his beloved to the wonders of his land, invoking famous rivers and mountains of Balochistan. Here in this rendition, Akhtar Chanal and Komal Rizvi lend their powerful voice to this folk song.

Another notable music is coming not from Bollywood films but a widely viewed and Amir Khan hosted TV talk show ‘Satyameva Jayate’. Ram Sampath is the composer for ‘Satyameva Jayate, who has sung and composed for this TV show. One of my favorite is Dheere Dheere Haule Halue (slowly slowly, quietly quietly) which was composed for the TV episode on Child sexual abuse.

And here is Mahesh Vinaykam singing all famous Sanskrit shloka ‘Gurur Brahma Gurur Vishnu Gurudevo Maheshwara’

Another gem by Shruti box of Shankar Tucker ‘O re piya’ sung by Rohan Kaimal ft Shankar Tucker

And some Bollywood gems in semi-classical genre – 
Ye tune kya kiya (what have you done?) sung by Javed Bashir

Maula Mere Maula by Roop Kumar Rathod

आम काटने का तरीका

कभी – कभी जाने-अनजाने हम स्वयं अपने कौशलों (skills) को नहीं पहचानते हैं। फलों के राजा आम को काटने को ही लीजिए। बचपन से आम की ख़ुराक पर बड़े हुए हम जैसे लोगों के लिए आम काटना तो बाँए हाथ का खेल हैं, लेकिन उन लोगों के लिए जिन्होंने आम कभी खाया नहीं है, आम को सलीके से काटना और खाना उसी तरह का पेचीदा काम है जिस तरह से मेरे लिए एवोकैडो को पहली बार खाना था। आम काटने और बिना आम काटे खाने का गुर मैंने अपने पिताजी से सीखा है। आम खाना एक कला है जो ही गाहे-बगाहे नहीं आ जाती है। सीखना पड़ता है। देखना पड़ता है। पहले आम को डेढ़-दो घंटे पानी में डालिए ताकि आम की तासीर ठंडी हो (आम गर्मी के मौसम का फल और अंदर से गरम होता है)। फिर आम को पानी से बाहर निकालिए। सबसे पहले आम के फलों के सिरे से निकले रस यानी चोप को निकालना ज़रूरी है। इसके लिए आप चाहें तो सिरे को थोड़ा सा काटें या हाथ से दबा-दबा कर चोप को बाहर निकाल दें। जो बच्चे या वयस्क लोग इस चोप को बिना निकाले आम खा डालते हैं, उनके मुँह/होठों के घाव इसकी गवाही ख़ुद-ब-ख़ुद देते हैं। अच्छा, अब आम को सीधा लिटाते हुए, गुठली (बीज) की दोनों तरफ, दोनों तरफ़ बराबर काटिए। इससे आपको मिलेंगे आम के तीन हिस्से। जिन्हे अब आप आसानी से खा सकते हैं। ये सब मैं इसलिए लिख रहा हूँ कि दो दिन पहले एक आम के नाम पर कलंक का घर पर आना हुआ। नाम था – नन्द और ठिकाना – ब्रज़ील। इतना बेकार आम मुद्दतों बाद खाया। दिखने में लाल- सुन्दर था, लेकिन स्वाद जैसे इमली का सौतेला भाई हो।

 

अपने पुरखों के लिए

Banaras Ganga Ghat

Banaras Ganga Ghat

नोट – यह संस्मरण मूलत: लीलावती सृजन फ़ाउंडेशन की स्मारिका [May 2014] में छपा था।

अभिषेक अवतंस (लायडन, नीदरलैण्ड)

2008 मई की तपतपाती सुबह मैं कृष्ण भक्तों के बुलावे पर बरास्ते मथुरा वृंदावन जा रहा था। वृंदावन जाने का आशय यह था कि वहाँ मुझे कुछ विदेशी कृष्णभक्तों को हिन्दी बोलना-लिखना सिखाना था। सनातन परंपरा में तीर्थों का बड़ा महत्व है और इसी कारणवश बस के मथुरा में प्रवेश करते ही मुझे अपनी माँ की बताई वह बात याद आ गई कि हमारी ’आजी’ यानी मेरी परदादी ने भी मेरे जन्म से कुछ महीने पहले इसी तरह काशी की ओर प्रस्थान किया था और वहीं वे स्वर्गवासी हुईं थी और इसलिए अपनी ’आजी’ से मैं कभी नहीं मिल पाया। लेकिन फिर भी मेरा मन उनकी आस्था की सुगंध से सराबोर था। वृंदावन की उस संकरी पर बेहद शीतल ’सेवाकुंज गली’ से गुज़रते हुए मैं वापस लोहानीपुर (कदमकुआँ, पटना) में अपने परदादा स्वर्गीय श्री रामदास तिवारी (जिनको हम सब लोग प्यार से ’बाबा’ कहते थे) के बनाए मकान में पहुँच गया था जहाँ न जाने कितनी गर्मी की छुट्टियाँ हमने परिवार के साथ बिताई थीं। हमारे बाबा वहाँ हमारी माई के साथ रहते थे। माई यानी हमारी दादी अर्थात हमारे बाबा की बहू। सफ़ेद साड़ी पहनने वाली गोरी-सी सुन्दर सी दादी। हम सब माई को पापा (प्रो. बालेन्दु शेखर तिवारी) के पीछे-पीछे माई (भोजपुरी में माँ) ही बुलाते थे।

माई का पूरा नाम श्रीमती लीलावती देवी’ था। माई दिखने में जितनी सुन्दर-अद्भुत थी उतनी ही फ़ुर्तीली-चुस्त भी। लोहानीपुर में सुबह हम लोगों हम आँख मलते हुए उठते तो देखते कि माई नहा-धोकर मंदिर से पूजा कर आई, और हमारे लिए मिठाईवाले की दुकान से ताज़े रसगुल्ले भी साथ लेती आई। क्षण-भर में माई नीचे कमरे में होती थी तो क्षण-भर में छत पर आम-आँवला के अचार के बौयामों (खड़ी बोली हिन्दी में – मर्तबानों) को धूप दिखा रही होती थी। माई को मैंने कभी झुककर चलते हुए नहीं देखा। इतनी सहनशक्ति और जीजिविषा बिरले ही लोगों को मिलती है। लोहानीपुर में मैं हमेशा माई के साथ ही सोता था। सोचता था कि दुनिया की सबसे अच्छी दादी मेरी माई ही है। स्कूलों के खुलने पर जब हम लोग वापस राँची चले आते तो कुछ दिनों में माई और बाबा का लिखा अंतरदेशीय पत्र आता। यह एक अलग किस्म की लिखावट होती थी जिसके हर अक्षर से स्नेह की बूंदे हमारे लिए टपक रही होती थी। हमारे बाबा की इबारत ऐसी होती थी कि उसे पढ़ने के लिए हम बच्चे हँसी-ठिठोली करते थे। लगता था जैसे रेत पर छोटी-छोटी उंगलियों के निशान हों या मुर्गियों ने कोई कहानी लिख दी हो। जहाँ बाबा एक ओर अनुशासनप्रिय और गंभीर थे तो माई उतनी ही सरल और ममतामयी थी। पास में ही हमलोगों का स्कूल चाचा नेहरू विद्यापीठ (डिप्टीपाड़ा, करमटोली राँची) था। माई रोज़ मुझे छोड़ने-लेने आती, साथ में मुझे पिलाने के लिए गाय का गरम दूध भी लिवा लाती । कहीं भी जाने के लिए हमेशा तैयार और वो भी पैदल। थकान का नामोनिशान नहीं। बड़ा हुआ पता चला मेरी इस अलबेली माई जो युवावस्था में ही विधवा हो गई थी, न जाने कितने जतन से अपनी संतानों (यानी मेरे पापा और उनकी दो बहनों) का लालन-पोषण किया था। 1991 में बाबा के गुज़रने के बाद माई ने पटना में अकेले ही रहने का निश्चय किया। मैंने पूछा माई तुम राँची हमारे साथ क्यों नहीं रहती हो, तब माई ने अपनी ठेठ भोजपुरी में जवाब दिया – लोहानीपुर के घर के टोंटी में गंगाजी आवेली। हमरा इनके भिरी रहे में सुखबा। हम तहरा के देखे आइब बबुआ, तू घबड़हिअ  मत । मैं मन-ही-मन उदास होता रहता कि माई हमसे क्यों दूर रहती है। माई का राँची आना-जाना लगा रहता। कुछ ही दिनों में मुहल्ले (मोराबादी, राँची) भर के लोगों से माई की पहचान बन जाती और लोग माई से मिलने आते रहते। लेकिन जैसे-जैसे माई के वापसे जाने की घड़ी नज़दीक आती, मेरी बैचेनी बढ़ती जाती। अन्तिम दिन तो हालत इतनी पतली हो जाती कि माई के स्टेशन ले जाने रिक्शे में बैठने तक मैं अपने आँसुओं को नहीं रोक पाता। यह मेरा दुर्भाग्य ही है जब हमारी प्यारी माई की मृत्यु 2004 में राँची में हुई तब मैं उनके करीब नहीं था।

हमारे दादाजी यथा स्वर्गीय सिद्धिनाथ तिवारी (पूर्व प्रोफ़ेसर हिन्दी, बी.एन.कॉलेज़, पटना) जिनको साक्षात देखने का सौभाग्य मुझे नहीं मिला। दादा जी की याद मुझे उस समय सबसे ज़्यादा आई जब राँची मैंने अपनी बेटी इलिका को पापा की गोद में बैठकर ’गुड़ की लाई’ खाते हुए देखा । दादा की गोद  में होने का सुख क्या होता है मैं इसे कभी महसूस नहीं कर पाया। पर इसे मैं अपनी बेटी की आँखों से महसूस कर रहा था।

किस्सागोई का शौक मुझे पापा से मिला है, आजतक मैंने सबसे अधिक किस्से अपनी माँ (स्वर्गीय विद्या तिवारी) को ही सुनाए हैं। कभी-कभी अहसास नहीं होता कि सुबह-सुबह खूब सारी चाय पिलाने वाली, मेरी हर चर्चा को चाव से सुनने वाली, मुझे दो मर्तबे ज़िन्दगी देने वाली, मेरे हर सवाल पर राय देने वाली, हमेशा खानाखइलऽबबुआ ?, पूछने वाली प्यार की नदी जैसी मेरी माँ अब बहकर बहुत दूर चली गई है।

 

आज कई साल गुज़र गए हैं, आजी, माई, बाबा, दादा और हमारी प्यारी माँ श्रीमती विद्या तिवारी सब-के-सब अब इस दुनिया में नहीं रहे लेकिन उनकी यादें और उनका प्यार विस्मृत नहीं हुआ है। ये किस मिट्टी के लोग थे। ऐसे अद्भुत लोग अब बिरले ही मिलते हैं। ये हिन्दी लोग थे। हिन्दी संस्कृति की आत्मीय सुगंध से आच्छादित। जिनकी बोली में हिन्दीपना था।

हमारे परिवार का हिन्दी भाषा और साहित्य से अटूट रिश्ता है। यह वह परिवार जहाँ बैठकखाने से ही किताबों का अंबार लगना शुरू हो जाता है। पुस्तकों का संग्रह इतना बड़ा है कि दो बड़ी-बड़ी लाइब्रेरियाँ बन जाएँ। जब दो साल पहले मैं नीदरलैंड के लायडन विश्वविद्यालय के हिन्दी व्याख्याता पद का साक्षात्कार देने आया, तो मुझसे पूछा गया था कि आप हिन्दी क्यों पढ़ाना-सिखाना चाहते हैं, इसके जवाब में मैंने कहा था कि मैं अपने खानदान में तीसरी पीढ़ी का हिन्दी अध्यापक हूँ। मेरे दादा और पिता के बाद मेरी बड़ी दीदी (डॉ. संपदा पाण्डेय) और मैं हिन्दी भाषा के पठन-अध्यापन के क्षेत्र में ही कार्यरत हैं। हिन्दी हमारी रग-रग में बसी। जिस तरह मछली जन्म लेने के साथ ही जल में गोते लगाने लगती है उसी तरह हमने भी हिन्दी के इस महाकुंड में तैरना सीखा है। यहाँ तक कि मेरे बड़े भाई (श्री अभीक अवतंस) जो कि राज्य सरकार में उच्चाधिकारी हैं, उन्होंने राज्य सिविल परीक्षा भी हिन्दी विषय लेकर ही उतीर्ण की थी। मेरी दूसरी बड़ी बहन (श्रीमती अंगदा पाण्डेय, एम.एससी) भी भारत के सूदूर दक्षिण में रहते हुए भी हिन्दी की पताका लहरा रही है। वे न सिर्फ़ बंगलूरू के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में जैवविज्ञान की प्राध्यापिका हैं बल्कि अपने बच्चों को हिन्दी-कन्नड़-भोजपुरी-अंग्रेज़ी का समेकित ज्ञान भी दे रहीं हैं।

बढ़ते परायेपन के इस ज़माने में परिवार की स्मृतियों को अशेष रखने का अनुष्ठान है – लीलावती सूजन फाउंडेशन, जिसकी परिकल्पना पापा ने गत वर्ष सोची थी। इसके अंतर्गत हमारे प्रपितामाह स्वर्गीय रामदास तिवारी की स्मृति में ’रामदास सृजन सम्मान’, हमारे पितामह स्वर्गीय डॉ सिद्धिनाथ तिवारी की स्मृति में ’सिद्धिनाथ तिवारी व्यंग्यश्री सम्मान’ और हमारी माँ स्वर्गीय विद्या तिवारी की स्मृति में ’विद्या तिवारी वामाश्री सम्मान’ की स्थापना की गई है। ये पुरस्कार प्रत्येक वर्ष हिन्दी भाषा और साहित्य के क्षेत्र में सुजन-शोध लगे विद्वानों को दिए जाएँगे। भारतीय संस्कृति ही एक अकेली संस्कृति है जिसमें पुरखों के लिए एक पक्ष निर्धारित है, कोई समाज अपने पितरों को इस तरह स्मरण नहीं करता जैसे हम करते हैं। इसी कड़ी में लीलावती सृजन फाउंडेशन भी है। 

बेटियों के लिए लोरियाँ

छोटे बच्चों को सुलाने के लिए गाए जाने वाले गानों को लोरी कहा जाता है। इन्हें आमतौर पर माताएँ गाती हैं , लेकिन इन्हें पिता भी  गाते हैं। सरलता और मधुरता से भरे हुए ये गीत न सिर्फ़ बच्चों को शान्ति से सोने में मदद करते हैं, बल्कि उन्हें यह भी अहसास दिलाती हैं कि उनके माँ-बाप उनके करीब हैं और उन्हें प्यार करते हैं। सैकड़ों वर्षों से  दुनिया की लगभग सभी भाषाओं में लोरियाँ गाईं जाती हैं। ज़्यादातर लोरियाँ लोकगीत हैं, जिनके रचयिता का नाम अज्ञात है। कई बार इन्हें गाने वाली माँएं इनमें अपनी मर्ज़ी से शब्दों को जोड़ती-घटाती है, इस वज़ह से लोरियाँ भी हमेशा विकसित होती रहती हैं। हिन्दी और उसकी लोकभाषाओं में भी लोरियों का बाहुल्य है। लेकिन लोरियों को असली लोकप्रियता और टिकाऊपना हिन्दी फ़िल्मों ने ही दिलवाया है। आज हिन्दी फ़िल्मों में गाई गईं अनेक लोरियाँ लोगों को मुँहज़ुबानी याद हैं, इन लोरियों को अलग-अलग नामी गीतकारों ने कलमबद्ध किया है। लेकिन इन सभी लोरियों को उनके लय की सरलता और मधुरता जोड़ती है।

बेटियों के लिए गाई गईं  हिन्दी की  कुछ लोरियाँ आप यहाँ सुन सकते हैं –

लल्ला-लल्ला लोरी दूध की कटोरी

चाँदनी रे झूम

नन्ही कली सोने चली

सुरमयी अंखियों में

 

ना रो मुन्नी

 

धीरे से आ जा  अँखियन में

मैं गाऊँ तुम सो जाओ

 

 दो नैना एक कहानी, थोड़ा सा बादल, थोड़ा सा पानी

 

सो जा राजकुमारी, सो जा