Temple of the Sun

About this massive monument, the great poet Rabindranath Tagore said –  “here the language of stone surpasses the language of man”. Situated at the eastern coast of India, the Konark Sun Temple was built by King Narsimhadeva I of Ganga dynasty in the 13th century. It was designed in the form of a gorgeously decorated chariot of Sun god mounted on 24 wheels , each about 10 feet in diameter, and drawn by 7 mighty horses. Sun temple of Konark is a masterpiece of Orissa’s medieval architecture. It is a UNESCO world hertiage monument.

Trivia

  • The Konark temple is also known for its erotic sculptures of maithunas.
  • In one of the panels at the temple, there is a depiction of giraffe being gifted by West Asian traders to the king of Odisha. It shows Odisha’s long history of trade with Africa and Arabia. Some other experts believe that this animal is Okapi or Dromedary (Arabian camel). 
  • In another panel, there is lady wearing Japanese style sandals (Geta Sandals), proving the maritime relation of Odisha with east & south-east Asia.
  • At present it is located two kilometers from the sea, but originally the ocean came almost up to its base. Until fairly recent times, the temple was close enough to the shore to be used as a navigational point by European sailors, who referred to it as the ‘Black Pagoda’.

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Temple is open for public from sunrise to sunset

Entrance Fees are as follows:

Citizens of India and visitors of SAARC (Bangladesh, Nepal, Bhutan, Sri Lanka, Pakistan, Maldives and Afghanistan) and BIMSTEC Countries (Bangladesh, Nepal, Bhutan, Sri Lanka, Thailand and Myanmar) – INR. 30 per head.

Citizen of other countries: US $ 5 or INR. 500/- per head

(children up to 15 years enter free)

How to reach?

Konark is connected by good all weather motorable roads. Regular Bus services are operating from Puri and Bhubaneswar. Besides Public transport Private tourist bus services and taxis are also available from Puri and Bhubaneswar.

 

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कुछ बोध कथाएँ

अपनी झोली

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दो आदमी यात्रा पर निकले। दोनों की मुलाकात हुई। दोनों यात्रा में एक साथ जाने लगे। दस दिनों के बाद दोनों के अलग होने का समय आया तो एक ने कहा, ‘भाईसाहब! एक दस दिनों तक हम दोनों साथ रहे। क्या आपने मुझे पहचाना?’ दूसरे ने कहा, ‘नहीं, मैंने तो नहीं पहचाना।’ वह बोला, ‘माफ़ करें मैं एक नामी ठग हूं। लेकिन आप तो महाठग हैं। आप मेरे भी उस्ताद निकले।’

‘कैसे?’ ‘कुछ पाने की आशा में मैंने निरंतर दस दिनों तक आपकी तलाशी ली, मुझे कुछ भी नहीं मिला। इतनी बड़ी यात्रा पर निकले हैं तो क्या आपके पास कुछ भी नहीं है? आप बिल्कुल ख़ाली हाथ हैं?’

‘नहीं, मेरे पास एक बहुत क़ीमती हीरा है और एक सोने का कंगन है ।’

‘तो फिर इतनी कोशिश के बावजूद वह मुझे मिले क्यों नहीं?’

‘बहुत सीधा और सरल उपाय मैंने काम में लिया। मैं जब भी बाहर जाता, वह हीरा और सोने का कंगन तुम्हारी पोटली में रख देता था। तुम सात दिनों तक मेरी झोली टटोलते रहे। अपनी पोटली संभालने की जरूरत ही नहीं समझी। तुम्हें मिलता कहाँ से?’

कहने का मतलब यह कि हम अपनी गठरी संभालने की ज़रूरत नहीं समझते। हमारी निगाह तो दूसरों की झोली पर रहती है। यही हमारी सबसे बड़ी समस्या है। अपनी गठरी टटोलें, अपने आप पर दृष्टिपात करें तो अपनी कमी समझ में आ जाएगी।

 सीमा

Old Woman India

सड़क किनारे एक बुढ़िया अपना ढाबा चलाती थी। एक यात्री आया। दिन भर का थका, उसने विश्राम करने की सोची। बुढिया से कहा, ‘क्या रात के लिए यहाँ आश्रय मिल सकेगा?’ बुढिया ने कहा, क्यों नहीं, आराम से यहां रात भर सो सकते हो।’

यात्री ने पास में पड़ी चारपाइयों की ओर संकेत कर कहा, ‘इस पर सोने का क्या चार्ज लगेगा?’ बुढ़िया ने कहा, ‘चारपाई पर सोने के लिए दस रूपए लगेंगे।’ यात्री ने सोचा रात भर की ही तो बात है। बेकार में दस रूपए क्यों खर्च की जाए। आंगन में काफी जगह है, वहीं सो जाऊंगा।

यह सोचकर उसने फिर कहा, ‘और अगर चारपाई पर न सोकर आंगन की ज़मीन पर ही रात काट लूँ तो क्या लगेगा?’ ‘फिर पूरे सौ रूपए लगेंगे -‘ बुढ़िया ने कहा।

बुढ़िया की बात सुन यात्री को उसके दिमाग पर संदेह हुआ। चारपाई पर सोने के दस रूपए और भूमि पर चादर बिछाकर सोने के लिए सौ रूपए – यह तो बड़ी विचित्र बात है। उसने बुढिया से पूछा, ‘ ऐसा क्यों?’

बुढ़िया ने कहा, ‘चारपाई की सीमा है। तीन फुट चौड़ी, छह फुट लंबी जगह ही घेरोगे। बिना चारपाई सोओगे तो पता नहीं कितनी जगह घेर लो।’ सीमा में रहना ही ठीक है। असीम की बात समस्या पैदा करती है।

भारतीय नरक

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एक बार एक भारतीय व्यक्ति मरकर नरक में पहुँचा,
तो वहाँ उसने देखा कि प्रत्येक व्यक्ति को किसी भी देश के नरक में जाने की छूट है ।
उसने सोचा, चलो अमेरिकावासियों के नरक में जाकर देखें, जब वह वहाँ पहुँचा तो द्वार पर पहरेदार से उसने पूछा – क्यों भाई अमेरिकी नरक में क्या- क्या होता है ? पहरेदार बोला – कुछ खास नहीं, सबसे पहले आपको एक इलेक्ट्रिक चेयर पर एक घंटा बैठाकर करंट दिया जायेगा, फ़िर एक कीलों के बिस्तर पर आपको एक घंटे लिटाया जायेगा, उसके बाद एक यमदूत आकर आपकी जख्मी पीठ पर पचास कोड़े बरसायेगा…
बस! यह सुनकर वह व्यक्ति बहुत घबराया औरउसने रूस के नरक की ओर रुख किया, और वहाँ के पहरेदार से भी वही पूछा, रूस के पहरेदार ने भी लगभग वही वाकया सुनाया जो वह अमेरिका के नरक में सुनकर आया था । फ़िर वह व्यक्ति एक- एक करके सभी देशों के नर्कों के दरवाजे जाकर आया, सभी जगह उसे एक से बढकर एक भयानक किस्से सुनने को मिले । अन्त में थक- हार कर जब वह एक जगह पहुँचा, देखा तो दरवाजे पर लिखा था “भारतीय नरक” और उस दरवाजे के बाहर उस नरक में जाने के लिये लम्बी लाईन लगी थी, लोग भारतीय नरक में जाने को उतावले हो रहे थे, उसने सोचा कि जरूर यहाँ सजा कम मिलती होगी…
तत्काल उसने पहरेदार से पूछा कि यहाँ के नरक में सजा की क्या व्यवस्था है ? पहरेदार ने कहा – कुछ खास नहीं…सबसे पहले आपको एक इलेक्ट्रिक चेयर पर एकघंटा बैठाकर करंट दिया जायेगा, फ़िर एक कीलों के बिस्तर पर आपको एक घंटे लिटाया जायेगा, उसके बाद एक यमदूत आकर आपकी जख्मी पीठ पर पचास कोड़े बरसायेगा… बस !

चकराये हुए व्यक्ति ने उससे पूछा – यही सब तो बाकी देशों के नरक में भी हो रहा है, फ़िर यहाँ इतनी भीड क्यों है ? पहरेदार बोला – इलेक्ट्रिक चेयर तो वही है, लेकिन बिजली नहीं है, कीलों वाले बिस्तर में से कीलें कोई निकाल ले गया है, और कोड़े मारने वाला यमदूत सरकारी कर्मचारी है, आता है, दस्तखत करता है और चाय-नाश्ता करने चला जाता है…औरकभी गलती से जल्दी वापस आ भी गया तो एक-दो कोड़े मारता है और पचास लिख देता है…चलो आ जाओ अन्दर !!

 

Survival Phrases in Telugu Language

telugu

Hyderabad is a melting pot of cultures. Since Hyderabad was ruled by Nizams for a long time, the native language here was originally Dakhini / Urdu. Today there are four major languages spoken in Hyderabad –  Telugu, Urdu, Hindi & English.

Telugu is a Dravidian language native to India. It stands alongside Hindi, English and Bengali as one of the few languages that predominate in more than one Indian state; it is the primary language in the states of Andhra Pradesh and Telangana. It is one of six languages designated as a classical language of India by the Government of India. Telugu is written in Telugu script [ Telugu lipi in Telugu].

ST Graphics -new Andhra Pradesh capital

Some common phrases in Telugu are given below :

English – Hindi – Telugu ( in Roman and Devanagari Script)

English – Hindi – Telugu ( in Roman and Devanagari Script)

Some Common Phrases

English Hindi Hindi in Roman Telugu (in Devanagari) Telugu (in script) Telugu in Roman
Hello नमस्ते namaste नमस्ते / नमस्कारम నమస్తే / నమస్కారం namaste / namaskaaram
Good अच्छा achchha मेलू మేలు meloo
Thanks धन्यवाद / शुक्रिया dhanyavaad / shukriya दन्यवादालु ధన్యవాదాలు danyavaadaalu
Excuse me माफ़ कीजिए maaf keejie नन्नु क्षमीणचंडी క్షమించండి nannu kshameenachandi
I am fine मैं ठीक हूँ। main theek hooein. नेनु बागुन्नानु నేను బాగున్నాను nenu baagunnaanu
And you? और आप? Aur aap? मारि मीरु? మరియు మీరు maari meeru
What is your name? आपका नाम क्या है? Aapaka naam kya hai? मी पेरू एमिटी? నీ పేరు ఏమిటి ? mi peroo emiti?
My name is Lucas. मेरा नाम लुकास है। mera naam lukaas hai. ना पेरु लुकास నా పేరు లుకాస్ na peru lukaas
I am from Holland मैं हॉलैंड से हूँ। main haulaind se hooein. नेनु हौलैंड नुंडी वच्चावु నేను హాలండ్ నుండి వచ్చి nenu haulaind nundi vachchaavu
I don’t  speak Telugu. मैं तेलुगु नहीं बोलता / बोलती। main telugu naheen bolata / bolati. नेनु तेलुगु माटलाडनु నేను తెలుగు మాట్లాడుతారు nenu telugu maatalaadanu
Where are you from? आप कहाँ से हैं? Aap kahaan se hain? मीरू एक्कड़ा नुंची वच्चावु। మీరు ఎక్కడ నుంచి వచ్చావు meeroo ekkarha nunchi vachchaavu.
Who are you? आप कौन हैं? Aap kaun hain? नुव्वू यवरु నువ్వు ఎవరు nuvvoo yavaru
Nice to meet you. आपसे मिलकर अच्छा लगा aapase milakar achchha laga मिम्मलिनी कलावटम संतोषमुगा उंडी మిమ్మల్ని కలవటం సంతోషముగా ఉంది mimmalini kalaavatam santoshamuga undi
Please come आइए aaie रंडी రండి randi
Please go जाइए jaaie वेल्लंडी వెళ్ళండి vellandi
Please sit बैठिए baithie कुरचंडी కూర్చోండి kurachandi
Please give दीजिए deejie इवंडी ఇవ్వాడి ivandi
Please stop ठहरिए thaharie आगंडी ఆగండి aagandi
It’s Good / okay. अच्छा / ठीक है। achchha / theek hai. मंची మంచి manchi
How much is this? यह कितने का है? Yah kitane ka hai? इदि इन्ता ఇది ఎంత ? idi inta
This is a dog. यह कुत्ता है। yah kutta hai. इदि कुक्क ఇది కుక్క idi kukk
How much is that? वह कितने का है? Vah kitane ka hai? अदि इन्ता ఎంత? Adi intaa
I need ………. मुझे …….चाहिए mujhe …….chaahie नाकु कावालि …… నాకు కావాలి naaku kaavaali …..
I don’t want anything मुझे कुछ नहीं चाहिए। mujhe kuchh naheen chaahie नाकु एमि वद्‍दु నాకు ఏమివద్దు naaku emi vad‍du
See you later फिर मिलेंगे phir milenge वेल्लीरेंडी / वेल्लीवस्तानु లోపలికి రండి velleerendi / velleevastaanu
Please come inside अंदर आइए andar aaie लोपलिकीरंडी ధన్యవాదాలు lopalikeerandi
Happy Birthday जन्मदिन की शुभकामनाएँ janmadin ki shubhakaamanaaeein पुत्तिनरोजु शुभाकांक्षलू పుట్టిన రోజు శుభాకాంక్షలు puttinaroju shubhaakaankshaloo
I will call the police मैं पुलिस बुलाऊँगी main pulis bulaaooeingi नेनु पुलिस नि पिलुस्तानु నేను పోలీసు చేస్తుంది nenu pulis ni pilustaanu
Stop! Thief! रोको, चोर roko, chora अपंडी, डोंगा దొంగ ఆపడానికి apandi, donga

Some Basic Vocabulary

Yes जी हाँ ji haan अवनु అవును avanu
No जी नहीं ji naheen कादु కాదు kaadu
There वहाँ vahaan अक्कड़ा అక్కడ akkarha
Here यहाँ yahaan इक्कड़ा ఇక్కడ ikkarha
Where कहाँ kahaan एक्कड़ा ఎక్కడ ekkarha
When कब kab यप्पड़ु ఎప్పుడు yapparhu
Who कौन kaun यवरु ఎవరు yavaru
What क्या kya यमी ఏమి yami

 

Some Food Related Vocabulary

English Hindi Hindi in Roman Telugu (in Devanagari) Telugu (in script) Telugu in Roman
Meat मांस / गोश्त maans / gosht मांसमु మాంసము maansmu
Drinking  Water पीने का पानी peene ka paani मंची नीरू (good water) మంచి నీరు manchi neeroo (good water)
Meal खाना khaana भोजनम భోజనం bhojanam
Milk दूध doodh पालू పాల paaloo
Yoghurt दही dahii पेरुगु పెరుగు perugu
Butter milk मट्ठा mattha मज्जिग మజ్జిగ majjiga
Lentils दाल daal पप्पु పప్పు pappu
Cooked rice भात bhaat अन्नमु అన్నం annamu
Salt नमक namak उप्पु ఉప్పు uppu
Sugar चीनी / शक्कर chiinii / shakkar चक्केर చక్కెర cakkera
Oil तेल tel नुने నూనె nune
Sauce / chutney चटनी chatanii पच्चड़ी పచ్చడి pacchadii
Tomato टमाटर tamaatar टमोटा టమోటా tamota
Vegetable Curry सब्ज़ी / तरकारी sabzii / tarkaarii कूर కూర koora
Vada वड़ा Vada गारेलु గారెలు gaarelu

Numbers : 1 to 10

one एक ek ओकटी ఒకటి okati
two दो do रेन्डु రెండు rendu
three तीन teen मूडु మూడు moodu
four चार chaar नालुगु నాలుగు naalugu
five पाँच paanch आइदु అయిదు aaidu
six छह chhah आरु ఆరు aaru
seven सात saat येडु ఏడు yedu
eight आठ aath येनिमिदि ఎనిమిది yenimidi
nine नौ nau तोम्मिदि తొమ్మిది tommidi
ten दस das पदि పది padi

 

लोग कहते हैं मेरी आँखें मेरी माँ जैसी हैं।

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19 मई 2013 की वह सुबह याद करके आज भी मन सिहर उठता है। आज फिर वह दिन है। मम्मी को गए हुए आज पूरे तीन साल हो गए। कितना कुछ तुम छोड़ गई। मेरी पत्नी मुझसे हमेशा पूछती है कि तुम हमेशा फोन करके यह क्यों पूछते हो कि खाना खाया कि नहीं, इलिका-औरस ने कुछ खाया कि नहीं? मैं उससे कहता हूँ – मेरी माँ भी मुझसे यही सवाल कई बार पूछती थी। अपनापन है, प्यार है इसमें।

जब आगरे से सीधा विदेश में रहने आया तो कई बार फ़ोन पर पूछती कि रात का खाना खाया कि नहीं, मैं कहता – अरे नहीं मम्मी अभी तो यहाँ तो दोपहर के तीन बज रहे हैं। फिर कहती ऐसा …तुम तो दूसरी दुनिया में चले गए। फिर बोलती कि कुछ खा लेना ठीक। बारहवीं के पश्चात घर से बाहर निकल दिल्ली आने के बाद माँ से बातचीत फ़ोन पर और साथ रहना विश्वविद्यालय की छुट्टियों में ही हो पाता था। एस.टी.डी करने के लिए पैसे भी कम थे और शायद वह समय भी ऐसा था जब अल्हड़पन का ज्वर अपने उफान पर था। जब आगरे में नौकरी करनी शुरू की तब मैं काफ़ी गंभीर और संयमित हो चला था। बाद में ईश्वरीय संयोग (अस्वस्थता) से आगरे में माँ का सानिध्य भरपूर मिला। कई-कई महीने हम लोग साथ रहे। मैंने खाना पकाना माँ से वहीं सीखा (जो आज बहुत मददगार साबित हो रहा है)। और चाय के साथ घंटों बातचीत – दफ़्तर से जुड़ी बातें, किस्से-कहानियाँ , चुटकुले, मेरे विश्वविद्यालय के दिनों की घटनाएँ, अंदमान की स्मृतियाँ, वृंदावन के मेरे अनुभव, मेरी प्रेम गाथाएँ और बहुत कुछ। इन सबके बीच एक बेहतरीन श्रोता और फ़ीडबैक देने के लिए मौज़ूद थी माँ।

उन दिनों मैं हिन्दी संस्थान के भोजपुरी-हिन्दी-अंग्रेज़ी शब्दकोश पर काम भी कर रहा था। हर दिन कुछ अनोखे शब्द मिलते और हमारी बातचीत उनके सही मतलब और प्रयोग पर होती रहती। मैंने पाया कि माँ पिताजी से कहीं ज़्यादा प्रभावशाली भोजपुरी जानती थी। शायद यह उनकी ठेठ ग्रामीण पॄष्ठभूमि से भी वास्ता रखता था जबकि पिताजी सदैव राजधानी में ही रहे थे। आगरे में हमारे निवास की बालकोनी में सूखने के लिए फैलाईं साड़ियाँ देखकर सब मुहल्ले वाले समझ जाते थे कि अभिषेक की माताजी आ गईं है, फिर लोगों का आना शुरू होता। सबलोगों से मिलना और उन्हें चाय पिए बगैर न जाने देने की रस्म निभाई जाती।

माँ को आगरा बहुत रास आता था, कभी-कभी अस्वस्थ रहती थी, लेकिन आगरे का ठेठ देसीपना उन्हें बहुत भाता था। दिन बीतते देर न लगी। फिर मैं विदेश आ गया, माँ अस्वस्थ रहती थी, मेरा भारत आना-जाना हर छह महीनों में लगा रहता था। जनवरी 2013 में जब आखिरी बार मिला तो माँ ने आँसुओं से भरी आँखों से मुझे विदाई दी। ठीक पाँच महीनों में वे चली गईं। मैं असहाय यहीं पड़ा रहा। माँ ने उसके पिछले हफ़्ते ही मुझसे फ़ोन पर कहा था कि बेटा मैं अब तुमसे नहीं मिल पाऊँगी, कुछ खा लेना। 19 मई की उस सुबह मैं परदेश में ही था, जब यह ख़बर मुझे मिली कि वह सच कह रही थी। जाने किस जल्दी में थी। लोग कहते हैं मेरी आँखें मेरी माँ जैसी हैं, यूँ ही भरी हैं पानी से मगर तुम्हारी राह देखती हैं।

यूरोप का बग़ीचा – केइकॉन्हॉफ़

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कामकाजी व्यस्तताओं के बीच ज़्यादा कहीं आना-जाना हो नहीं पाता लेकिन साल में एक बार हम  नीदरलैण्ड के केइकॉन्हॉफ़ बाग़ जाना नहीं भूलते। पिछली 19 अप्रैल 2015 को हमलोग केइकॉन्हॉफ़ (Keukenhof) गए। ककेइकॉन्हॉफ़ क्या है और कहाँ है? कुछ जानकारी –

दक्षिण हॉलैण्ड प्रदेश में लिसअ नाम की एक जगह है। लिसअ में फूलों का बहुत बड़ा बाग़ केइकॉन्हॉफ़ है जिसे यूरोप का बग़ीचा भी कहा जाता है। वसंत के मौसम में हर साल मार्च से मई (सिर्फ़ आठ हफ़्ते) तक आम लोगों के लिए खुलने वाले इस बग़ीचे को लिसअ शहर की नगरपालिका ने 1949 में स्थापित किया था। डच भाषा में केइकॉन्हॉफ़ का मतलब – ’रसोई का बग़ीचा’ है। यह बाग़ मुख्य रूप से अपने ट्यूलिप के फूलों के लिए प्रसिद्ध है। 79 एकड़ के इलाके में फ़ैले इस बाग़ में हर साल लगभग 70 लाख ट्यूलिप फूलों के कंद (बल्ब) रोपे जाते हैं। ट्यूलिप शब्द मूल रूप से फ़ारसी भाषा के शब्द दुलबन्द (यानी पगड़ी) से बरास्ते फ़्रांसीसी आया है। ऐसा इसलिए कि ट्यूलिप के फूल को उलटने पर वह एक पगड़ी की तरह दिखाई देता है। प्राकृतिक रूप से ट्यूलिप के फूल मध्य एशिया, तुर्की, मंगोलिया और तिन शियान हिमालय की पहाड़ियों में पाए जाते हैं। सत्रहवीं शताब्दी में ट्यूलिप फूलों का यूरोप में प्रवेश हुआ। 1636-1637 के दौरान यह फूल नीदरलैण्ड में इतना लोकप्रिय हुआ कि इन फूलों की ख़रीद-बिक्री पर सट्टेबाज़ी होने लगी। इसे ट्यूलिप मैनिया यानी ट्यूलिप पागलपन कहा जाता है। नीदरलैण्ड के साथ ट्यूलिप की कहानी इतनी ही पुरानी है। ग़ौरतलब यह भी है कि आज नीदरलैण्ड दुनिया में ट्यूलिप फूलों का सबसे बड़ा निर्यातक देश है।

केइकॉन्हॉफ़ में प्रवेश शुल्क एक व्यक्ति के लिए लगभग 1100 ₹ ( यानी 16 €) है। तीन साल से कम उम्र के बच्चे बाग में मुफ़्त जा सकते हैं। वरिष्ठ नागरिकों के लिए प्रवेश शुल्क में कोई रियायत नहीं है।

कुछ चित्र –

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द शॉप ऑन द मेन स्ट्रीट (1989)

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अभी कुछ दिन हुए मैंने  एक चेक-स्लोवाक भाषा में बनी फ़िल्म देखी – Obchod na Korze  यानी अंग्रेज़ी में ‘द शॉप ऑन द मेन स्ट्रीट (The Shop on the Main Street)’। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान स्लोवाकिया के एक छोटे-से शहर के जीवन पर आधारित यह फ़िल्म ऑस्कर जीतने वाली पहली चेक और स्लोवाक फ़िल्म थी।  इस श्वेत-श्याम फ़िल्म  की कहानी वर्ष 1942 की है जब स्लोवाकिया पर नात्सी जर्मनी की कठपुतली और तानाशाही सरकार का शासन था। फ़िल्म का मुख्य किरदार टोनो ब्रत्को  एक सीधा-सादा बढ़ई है। ब्रत्को को उसका फ़ासीवादी साढ़ू जो कि एक पुलिस अधिकारी है, चालबाज़ी से एक बूढ़ी और ऊँचा सुनने वाली यहूदी महिला श्रीमती लाउटमान की बटनों की दूकान का आर्य स्वामी बनवा देता है। ज्ञात हो कि नात्सी शासन के दौरान जर्मनी, पोलैण्ड, चेकोस्लोवाकिया, ऑस्ट्रिया समेत यूरोप के कई देशों में एक क़ानून के तहत यहूदी व्यापारिक प्रतिष्ठानों का मलिकाना हक़ स्थानीय (तथाकथित) आर्य समुदाय के चुने हुए लोगों को सौंप दिया गया था। इसका मतलब था कि नात्सी शासन के क़ानून के मुताबिक हर यहूदी दूकान मालिक के लिए एक आर्य स्वामी का होना अनिवार्य था।  टोनो एक जिंदादिल इंसान है जो उसके देश में हो रही फ़ासीवादी क्रांति से सहमत नहीं है। टोनो का साढ़ू जब उसके घर महँगी शराब लिए रात के खाने पर आता है, तो टोनो शराब के नशे में अडोल्फ़ हिटलर की नकलकर उसका मखौल उड़ाता है। फ़िल्म का यह दृश्य अपने-आप में अनोखा –

 

फ़िल्म में शहर की मुख्य सड़क पर विधवा महिला श्रीमती लाउटमान की बटन व लेस की एक पुरानी दूकान है।  यह बात उस समय से कुछ ही पहले की है जब नात्सी शासन द्वारा यहूदी मूल के लोगों को यूरोप भर से जबरन यातना शिविरों में भेजना शुरू हुआ था। भोलाभोला टोनो जब पहली बार श्रीमती लाउटमान की दुकान पर अपना कब्जा लेने आता है तो वृद्ध महिला पहले उसे ग्राहक समझती, फिर टैक्स जमा करने वाला और अंत में एक बेरोज़गार आदमी। इस दौरान टोनो उन्हें समझाने कि कई दफ़ा कोशिश करता है कि वह दुकान का आर्य स्वामी। पर बुढ़िया समझे तब तो बात आगे बढ़े। अगले दिन से टोनो श्रीमती लाउटमान के पुराने जर्जर हो चुके फ़र्नीचर को दुरुस्त करने में लग जाता है। दरअसल फ़िल्म उस मानवीय रिश्ते की दास्तान है जो टोनो ब्रत्को और श्रीमती लाउटमान के मध्य विकसित होता है। मानवीय संबंध किस प्रकार इन अमानवीय, क्रूर और कठिन परिस्थितियों  में विकसित होते हैं। एक सीधा-सादा आदमी अपने आप को कैसे इन परिस्थितियों में अपने-आपको बेबस पाता है, यह आप इस मर्मस्पर्शी फ़िल्म में देख सकते हैं।

फ़िल्म में मुख्य भूमिकाएँ निभाई हैं – इदा कमिन्स्का (श्रीमती लाउटमान), जोज़ेफ़ क्रोनर (टोनो ब्रत्को) और हाना सिल्व्कोवा ( टोनो की पत्नी)।

फ़िल्म के निर्देशक हैं – यान क़ादर

इंटरनेट पर हिंदी भविष्य

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भारत की सबसे बड़ी प्रिंट मीडिया कंपनी दैनिक भास्कर और प्रसिद्ध फूड ब्लॉगर निशा मधुलिका की सफलता का ताला एक ही चाबी से खुला है। और वह चाबी हिंदी-उर्दू ज़बान की है। शौकिया तौर पर हिंदी में फूड ब्लॉग शुरू करने वाली निशा के आज यू-ट्यूब पर 3,80,000 से ज़्यादा सब्सक्राइबर हैं। दूसरी ओर दैनिक भास्कर समूह के सी.ई.ओ ज्ञान गुप्ता बताते हैं कि ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट की बढ़ती पहुँच से स्थानीय भाषा में इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों की संख्या 47 % की दर से बढ़ रही है। यह बात अलग है कि मातृभाषा के रूप में हिंदी बोलने वाले 26 करोड़ भारतीयों के लिए इंटरनेट पर केवल 0.04 % वेबसाइटें हिंदी में उपलब्ध है। गूगल इस परेशानी को कैसे दूर कर रहा है। इस मसले पर रौशनी डालता यह आलेख।
http://apac.thinkwithgoogle.com/articles/hindi-matters-digital-age.html