Confessions of a Linguist!

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Awadhi Language

August 22, 2009 · Leave a Comment

tulsidas

Awadhi is an Indo-Aryan language spoken in northern India and is grouped under Purvi Hindi Branch of Hindi (hence classified as a variety of Hindi). Awadhi is primarily spoken in Awadh (Oudh) region but it is also spoken outside Awadh e.g. Fatehpur, Allahabad, Jaunpur and Mirzapur districts of Utter Pradesh (UP) state of India. It is also known as Kausali and Bainswadi.  To the east of west of it Kannoji and Bundeli is spoken and towrds the east Bhojpuri is usesd. Indian census of 2001 enumerates 422,048,642 speakers of this language. It is believed that Awadhi has its origin in Ardha Magadhi Prakrut.

Grierson’s Linguistic survey of India provides this brief grammatical description of Awadhi

Awadhi_Grammar

A tentaive list of publications on Awadhi language

1. अवधी शब्दकोश – सूर्यप्रकाश दीक्षित व सजीवनलाल यादव, विश्वविद्यालय प्रकाशन, लखनऊ, 1996

2. वाचिक कविता: अवधी – विद्यानिवास मिश्र, भारतीय ज्ञानपीठ, 2005

3. अवधी लोक कथाएँ – जगदीश पीयूष, लोकभारती प्रकाशन, 2004

4. प्रारंभिक अवधी – विश्वनाथ त्रिपाठी, राधाकृष्ण प्रकाशन, 1975

5. अवधी का विकास – बाबूराम सक्सेना, हिन्दूस्तान एकेडेमी, इलाहाबाद, 1972

6. अवधी बृहत लोकोक्ति कोश – कमला शुक्ल, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ, 2002

7. अवधी लोकगीत: समीक्षात्मक अध्ययन – विद्याविंदू सिंह, परिमल प्रकाशन, 1983

8. अवधी लोकगीत और परम्परा – इन्दूप्रकाश पाण्डेय, प्रवीण प्रकाशन, दिल्ली, 1988

9. लोकगीतों में राम-कथा : अवधी – किरण मराली, साहित्य भवन, 1986

10. अवधी का विकासबाबूराम सक्सेना, हिन्दूस्तानी अकादमी, इलाहाबाद, 1972

11. Evolution of Awadhi- Baburam Saksena, Motilal Banarsidas Publishers, 1971

12. अवधी कोशरामज्ञ द्विवेदी, हिन्दूस्तानी अकादमी, इलाहाबाद, 1955

13. पूर्वी अवधी: ग्राम्य शब्दावली - आत्माराम त्रिपाठी, आलोक प्रकाशन, इलाहाबाद, 2007

14. अवधी शब्द संपदा - हरदेव बाहरी, भारती प्रेस, इलाहाबाद, 1982

1. अवधी शब्दकोश – सूर्यप्रकाश दीक्षित व सजीवनलाल यादव, विश्वविद्यालय प्रकाशन, लखनऊ, 1996

2. वाचिक कविता: अवधी – विद्यानिवास मिश्र, भारतीय ज्ञानपीठ, 2005

3. अवधी लोक कथाएँ – जगदीश पीयूष, लोकभारती प्रकाशन, 2004

4. प्रारंभिक अवधी – विश्वनाथ त्रिपाठी, राधाकृष्ण प्रकाशन, ?

5. अवधी का विकास – बाबूराम सक्सेना, हिन्दूस्तान एकेडेमी, इलाहाबाद, 1972

6. अवधी बृहत लोकोक्ति कोश – कमला शुक्ल, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ, 2002

7. अवधी लोकगीत: समीक्षात्मक अध्ययन – विद्याविंदू सिंह, परिमल प्रकाशन, 1983

8. अवधी लोकगीत और परम्परा – इन्दूप्रकाश पाण्डेय, प्रवीण प्रकाशन, दिल्ली, 1988

9. लोकगीतों में राम-कथा : अवधी – किरण मराली, साहित्य भवन, 1986

10. अवधी का विकासबाबूराम सक्सेना, हिन्दूस्तानी अकादमी, इलाहाबाद, 1972

11. Evolution of Awadhi- Baburam Saksena, Motilal Banarsidas Publishers, 1971

12. अवधी कोशरामज्ञ द्विवेदी, हिन्दूस्तानी अकादमी, इलाहाबाद, 1955

13. पूर्वी अवधी: ग्राम्य शब्दावली - आत्माराम त्रिपाठी, आलोक प्रकाशन, इलाहाबाद, 2007

14. अवधी शब्द संपदा - हरदेव बाहरी, भारती प्रेस, इलाहाबाद, 1982

15. प्रारंभिक अवधीविश्वनाथ त्रिपाठी, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 1975

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भोजपुरी का पहला त्रिभाषी शब्दकोश केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा द्वारा प्रकाशित

July 15, 2009 · Leave a Comment

केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा, की महत्त्वाकांक्षी हिंदी लोक शब्दकोश परियोजना की पहली प्रस्तुति है:

भोजपुरी-हिंदी-इंग्लिश लोक शब्दकोश, वर्ष- 2009, मूल्य – 275/- रुपए मात्र

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परियोजना का उद्देश्य है सुसंगिठत संस्थागत स्तर पर हिंदी परिवार की 48 भाषाओं की शब्द संपदा को सुरक्षित करना और भावी विकास के लिए आधुनिक आधार उपकरण तैयार करना। इतने विशद स्तर पर ऐसा कोई प्रयास देश में पहली बार हो रहा है। ये सभी भाषाएँ भारतीय जनगणना 1991 की रिपोर्ट भाषाएँ: भारत और राज्य 1997 (Language: India and States, 1997) में परिगणित हैं। इस परियोजना के अंतर्गत हिंदी परिवार की 48 बोलियों/भाषाओं/उपभाषाओं के (भारतीय जनगणना 1991 की रिपोर्ट: भाषाएँ: भारत और राज्य 1997 के आधार पर) लोक शब्दकोशों का निर्माण 48 खंडो में करने की योजना है। हिंदी की कई बोलियाँ/भाषाएं/उपभाषाएं संकटग्रस्त और विलुप्त-सी हो रही हैं और इनके साथ अद्भुत नाद और अर्थ सौंदर्य वाले शब्द भी खो रहे हैं। यदि आगामी 10-15 वर्षों में सुधि नहीं ली गई तो हम उन्हें पूर्णत: खो देंगे। लोकभाषाओं की इस महत्ता को ध्यान में रखते हुए हिंदी लोक शब्दकोश परियोजना के अंतर्गत कतिपय बोलियों/भाषाओं/उपभाषाओं के लोक शब्दकोशों के प्रकाशन, डिजिटलीकरण एवं इंटरनेट पर उपलब्ध करवाने की योजना है जिससे न केवल एक विशाल शब्द भंडार का संरक्षण होगा, बल्कि हिंदी की सांस्कृतिक जड़ों में भी पुष्टता आएगी और देश-विदेश के हिंदी पाठक लाभान्वित होंगे। परियोजना के प्रथम चरण में कुल सात बोलियों/भाषाओं/उपभाषाओं (भोजपुरी,ब्रजभाषा, राजस्थानी, बुन्देली, अवधी, छ्त्तीसगढ़ी और मालवी) पर कार्य चल रहा है।

भोजपुरी-हिंदी-इंग्लिश लोक शब्दकोश की विशिष्टताएँ –

• भोजपुरी की कुल 4221 प्रविष्टियाँ •

भोजपुरी शब्दो का हारवर्ड-क्योटो प्रोटोकॉल के तहत रोमनीकरण

• सभी भोजपुरी प्रविष्टियों का हिंदी एवं अंग्रेजी में अर्थ अथवा व्याख्या

• सभी भोजपुरी शब्दों के अर्थपूर्ण प्रयोग-उदाहरण

• भोजपुरी व्याकरण और शब्दावली पर परिशिष्ट खंड के अंतर्गत बहुउपयोगी सामग्री

• पूर्णत: वैज्ञानिक और नवीनतम भाषावैज्ञानिक प्रविधियों द्वारा शब्दकोश हेतु शब्दावली संकलन

प्रधान संपाद्क श्री अरविंद कुमार

प्रधान संपाद्क श्री अरविंद कुमार

भोजपुरी-हिंदी-इंग्लिश लोक शब्दकोश की निर्माण समिति के सदस्य निम्नलिखित हैं: दिशा-निर्देश एवं परामर्श – रामवीर सिंह शंभुनाथ ,प्रधान संपादक- अरविंद कुमार,  समन्वयक- मीरा सरीन परमलाल अहिरवाल, भाषा संपादक – राजेंद्र प्रसाद सिंह ,संयोजक संपादक व परियोजना प्रभारी – अभिषेक अवतंस कोशकर्मी- जितेंद्र वर्मा, दिग्विजय शर्मा सुरेशचंद मीणा, शैलेंद्र कुमार सिंह,  तकनीकी सहयोग -राहुल देवरानी, गिरधर सिंह

शब्दकोश खरीदने के लिए संपर्क करें: प्रकाशन विभाग केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा -282005 दूरभाष : 0562-2530683 निदेशक सचिवालय : 0562-2530684 वेबसाईट – www.hindisansthan.org → वी.पी.पी. द्वारा पुस्तकें नहीं भेजी जाती। पुस्तकें मँगाने के लिए अग्रिम धनराशि डाक खर्च सहित ‘सचिव, केंद्रीय हिंदी शिक्षण मंडल, आगरा’ के नाम ड्राफ्ट द्वारा भेंजें। डाक खर्च के लिए पुस्तक के मूल्य के साथ 100/- रुपए अलग से जोड़ें।

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दक्षिण एशिया में भाषाएँ

April 21, 2009 · Leave a Comment

Daughters of Brahmi Script

Daughters of Brahmi Script

लैंग्वेज़ इन साउथ एशिया

संपादक – ब्रज काचरू, यमुना काचरू व एस.एन. श्रीधर

केंब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, वर्ष 2008, पृष्ठ – 632

दक्षिण एशिया क्षेत्र न सिर्फ एक बड़े बाज़ार के रूप में विकसित हुआ है बल्की एक समृद्ध भाषाई क्षेत्र के रूप में भी इसका नाम सुपरिचित है। दक्षिण एशिया में कुल 5 पाँच भाषा परिवारों की अनेक भाषाऎं एक विशाल जनसमुदाय द्वारा बोली जाती है। इन भाषाओं के माध्यम से ही जाति, वर्ग, व्यवसाय, क्षेत्र और धर्म से जुड़ी अस्मिताओं की पहचान होती है। दक्षिण एशियाई उपमहाद्वीप की इन्हीं विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए इस भाषाई क्षेत्र की भाषाई स्थिती पर नए सिरे से प्रकाश डालने का कार्य ’ लैंग्वेज़ इन साउथ एशिया’ ने किया है। संपादित पुस्तक में दक्षिण एशिया की भाषाओं पर भाषावैज्ञानिक, ऎतिहासिक, समाजभाषावैज्ञानिक दृष्टि से जायजा लेने की कोशिश की गई है। पुस्तक कुल दस भागों में विभाजित है जिनमें अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विद्वानों द्वारा लिखे गए 25 विभिन्न शोधपरक आलेखों को संग्रहित किया गया है।

दक्षिण एशिया की भाषाओं की क्रियाशील भाषाई प्रक्रियाओं, भाषाई विवादों, भाषा-आधुनिकीकरण के प्रभावों, न्यायिक तंत्र, मीडिया, सिनेमा, धर्म आदि में भाषाओं की भूमिकाओं, भाषाई राजनीति, संस्कृत की शिक्षण परंपरा से लेकर जनजातीय व अल्पसंख्यक समुदायों की भाषाओं पर विस्तार से चर्चा हुई है। दक्षिण एशियाई भाषाओं से जुड़े अंत:विषयात्मक शोध के लिए पुस्तक में पर्याप्त और बहुउपयोगी सामाग्री का संकलन हुआ है। जँहा एक ओर हिंदी की स्थिती पर यमुना काचरू का ’हिंदी-उर्दू-हिंदुस्तानी’ शीर्षक आलेख तो दूसरी ओर जनजातीय भाषाओं पर अन्विता अब्बी का आलेख सुपाठ्य है। करुमुरी वी. सुब्बाराव ने अपने आलेख में दक्षिण एशियाई भाषाओं की प्ररुप-वैज्ञानिक विशिष्टताओं को आरेखित किया है।

भाषा और युवा संस्कृति पर रुक्मिणी भाया नायर का आलेख भी अपनी अलग पहचान बनाता। भाषा-नियोजन, बहुभाषिकता, समाजभाषाविज्ञान और दक्षिण एशियाई अध्ययन के शोधार्थियों के लिए यह पुस्तक निसंदेह बहुउपयोगी व संग्रहणीय साबित होगी।

Daughters of Brahmi courtesy http://www.geocities.com/athens/academy/9594/

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